वीर सावरकर: इतिहास की धारा मोड़ने वाले ‘स्वातंत्र्य समर’ के महानायक
लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’
भारतीय इतिहास के आकाश में विनायक दामोदर सावरकर एक ऐसे ध्रुवतारे की भांति हैं, जिसकी चमक ने न केवल स्वाधीनता सेनानियों का मार्ग प्रशस्त किया, बल्कि पराधीन भारत की सोई हुई चेतना को भी झकझोर कर जगा दिया। आज 28 मई को उनकी जयंती पर जब हम उनके व्यक्तित्व का विश्लेषण करते हैं, तो हमारे सामने एक क्रांतिकारी, एक कवि, एक समाज सुधारक और सबसे बढ़कर एक ‘क्रांतिकारी इतिहासकार’ की छवि उभरती है।
इतिहास लेखन की क्रांति: ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’
सावरकर जी ने जब कलम उठाई, तो उनका उद्देश्य केवल कागजों को रंगना नहीं था। उन्होंने देखा कि ब्रिटिश इतिहासकार 1857 की उस महान क्रांति को ‘सिपाही विद्रोह’ या ‘गदर’ कहकर अपमानित कर रहे थे। सावरकर के मन में कुछ सुलगते हुए प्रश्न थे:
क्या वह वास्तव में मात्र एक आकस्मिक विद्रोह था?
क्या मंगल पांडे, झांसी की रानी और तात्या टोपे केवल अपने निजी स्वार्थों के लिए लड़ रहे थे?
क्या 1857 की वह ज्वाला भविष्य के लिए कोई जीवंत संदेश दे रही थी?
इन प्रश्नों के उत्तर खोजने के लिए सावरकर ने लंदन के ‘इण्डिया ऑफिस’ पुस्तकालय में महीनों तक शोध किया और वर्ष 1908 में मूलतः मराठी में ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ पूर्ण की।
प्रतिबंधों का गौरव और विश्वव्यापी यात्रा
यह विश्व इतिहास की संभवतः पहली ऐसी पुस्तक थी, जिसे उसके प्रकाशन से पूर्व ही ब्रिटिश सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया। लेकिन सत्य को दबाना असंभव था। सावरकर की इस कृति ने गुप्त रास्तों से पूरी दुनिया का सफर तय किया:
मुद्रण का संघर्ष: इंग्लैंड और जर्मनी में मुद्रण असफल होने के बाद, यह पुस्तक अंततः 1909 में हॉलैंड से प्रकाशित हुई।
संस्कारणों की गौरव गाथा: इसका द्वितीय संस्करण लाला हरदयाल ने ‘गदर पार्टी’ के लिए अमेरिका में निकाला। तृतीय संस्करण स्वयं सरदार भगत सिंह ने प्रकाशित करवाया और चतुर्थ संस्करण नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने सुदूर-पूर्व में जारी किया।
पांडुलिपि का संरक्षण: मैडम भीकाजी कामा और डॉ. क्यूतिन्हो ने इस पवित्र ग्रंथ की भांति 40 वर्षों तक सुरक्षित रखा।
आजाद हिंद फौज और रानी झांसी रेजिमेंट की प्रेरणा
सावरकर की इस पुस्तक ने केवल 1914 के गदर आंदोलन को ही नहीं, बल्कि 1943-45 की आजाद हिंद फौज (INA) को भी प्राणवायु दी। के.एफ. नरीमन ने ‘फ्री हिन्दुस्तान’ (मई 1946) में स्वीकार किया कि आजाद हिंद फौज की कल्पना और ‘रानी झांसी रेजिमेंट’ का नामकरण सावरकर की इसी रचना से प्रेरित था। जी.वी. सुब्बाराव ने सत्य ही लिखा था— “यदि सावरकर ने हस्तक्षेप न किया होता, तो आज ‘गदर’ शब्द का अर्थ ही कुछ और होता।”
आजादी के बाद का संघर्ष: एक विचार की जेल
अश्विनी राय ‘अरुण’ के रूप में मेरा यह प्रश्न आज भी खड़ा है कि जो व्यक्ति आजीवन देश की अखंडता के लिए लड़ता रहा, उसे आजादी के बाद भी मात्र ‘संदेह’ के आधार पर जेल की कालकोठरी देखनी पड़ी। यह विडंबना ही है कि जिस सरकार ने 1946 में इस पुस्तक से प्रतिबंध हटाया, उसी स्वतंत्र भारत की व्यवस्था ने वीर सावरकर के साथ न्याय करने में संकोच किया।
निष्कर्ष: अश्विनी राय ‘अरुण’ का वंदन
मेरी दृष्टि में वीर सावरकर एक ऐसे महान स्वतंत्रता सेनानी थे और सदा रहेंगे, जिन्होंने अंडमान की सेल्युलर जेल की दीवारों पर काँटों से इतिहास लिखा। उनका जन्म 28 मई, 1883 को नासिक के भागुर में हुआ था, लेकिन उनके विचार आज हर उस भारतीय के हृदय में जन्म लेते हैं जो राष्ट्र को सर्वोपरि मानता है।
सावरकर केवल एक नाम नहीं, वे स्वाभिमान का मंत्र हैं। ऐसे महान राष्ट्रभक्त को मेरा कोटि-कोटि वंदन।
धन्यवाद!
बाबाराव सावरकर: अभिनव भारत के संचालक और आरएसएस के सह-संस्थापक | अश्विनी राय ‘अरुण’
अमर वीर सावरकर जी को कोटि-कोटि नमन।
आज अति आवश्यक है कि हमारी नवीन पीढ़ी महान विभूति बारे में जाने और इतिहास के पन्नों से अपने वजूद को तलाश करें। इन्होंने देश के लिए बहुत ही यातनाएं सहे। हम लोग इस त्याग के फल स्वरुप आजाद है।
ओजस्वी लिखें की प्रस्तुति के लिए लेखक अश्विनी राय जी को भी आभार एवं नमस्कार।