April 4, 2025

काशी की बसावट के लिहाज से शहर के उत्तरी छोर से गंगा की विपरीत धारा की ओर चलें तो आदिकेशव घाट व राजघाट के बाद पंचगंगा घाट प्रमुख घाट आता है। पंचगंगा घाट को पंचगंगा इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह घाट पांच नदियों – गंगा, सरस्वती (कहीं कहीं विशाखा), धूतपापा, यमुना और किरना के संगम पर बसा है। इन पांच नदियों में से सिर्फ गंगा ही एक ऐसी नदी है, जिसे देखा जा सकता है, बाकी की चार नदियां पृथ्‍वी में समा गईं।

परिचय…

धार्मिकता-अध्यात्मिकता के स्तर पर इस घाट की काशी के पंच तीर्थों में मान्यता है तो इसे पंचनद तीर्थ भी कहा जाता है। कार्तिक मास में गंगा के विभिन्न घाट व सरोवरों पर कार्तिकी डुबकी के लिए श्रद्धालु उमड़ते हैं लेकिन पंचनदतीर्थ (पंचगंगा) स्नान की विशेष महत्ता है। ऐसे में यहां स्नान से हर तरह के पापों का शमन होता है। पुराणों में भी वर्णन है कि पंचनद तीर्थ में स्वयं तीर्थराज प्रयाग भी कार्तिक मास में स्नान करते हैं।

पंचगंगा घाट तीन प्रसिद्ध ऐतिहासिक कारण…

१. संत तुलसी दास, जिन्‍होने प्रसिद्ध धार्मिक ग्रंथ रामायण को रचा था, उन्‍होने अपनी खास रचना विनायक पत्रिका को इसी स्‍थान पर बैठ कर लिखा था।

२. वेदों के महान ज्ञाता और शिक्षक स्‍वामी रामानंद अपने शिष्‍यों को यहीं शिक्षा दिया करते थे।

३. मुगल शासक औरंगजेब ने यहां स्थित विष्‍णु मंदिर को नष्‍ट कर दिया था, जिसे मराठा सरदार बेनी मधुर राव सिंधिया ने बनवाया था और इसके स्‍थान पर औरंगजेब ने आलमगीर मस्जिद का निर्माण करा दिया था।

मान्यता…

मान्यताओं के आधार पर भगवान शिव की प्राचीन नगरी काशी में कार्तिक माह श्री विष्णु के नाम होता है। शरद पूर्णिमा की रात वैभव लक्ष्मी की आराधना से शुरू स्नान उत्सव पूरे माह चलता है। स्नान के बाद पंचगंगा घाट पर श्रीहरि स्वरूप बिंदु माधव के दर्शन का विधान है।

पितरों की राह आलोकित करने के लिए कार्तिक के पहले ही दिन से लेकर आखिरी दिन तक आकाशदीप जलाए जाते हैं। पंचगंगा घाट पर इनकी आभा निराली होती है। इसकी प्राचीनता का अंदाज श्रीमठ में स्थापित हजारे से लगाया जा सकता है। इंदौर की महारानी अहिल्याबाई ने वर्ष १७८० में लाल पत्थरों से इसका निर्माण कराया था।

विशेष…

काशी के इस क्षेत्र को अवस्थित सप्तपुरियों में कांचीपुरी क्षेत्र माना गया है। १४वीं -१५वीं शताब्दी में वैष्णव संत रामानंद इस घाट पर ही निवास करते थे। गंगा के इस तट से ही उन्होंने काशी में रिम भक्ति को आंदोलन का रुप दिया। घाट की पथरीली सीढियों पर कबीर को गुरु मंत्र प्रदान किया और रामभक्ति की सगुण के साथ ही निर्गुण धारा को प्रवाह दे दिया। घाट पर आज भी रामानंद संप्रदाय की मूल पीठ श्रीमठ स्थित है। खास यह की इस मठ के श्री-आशीषों से सींच कर ही बनारस को देव दीपावली महोत्सव सौगात में मिला। इसकी शुरूआत कार्तिक के पहले दिन आकाशदीप प्रज्जवलन से होती है।

इतिहास…

ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार रघुनाथ टण्डन ने वर्ष १५८० में इस घाट का पक्का निर्माण कराया। सत्रहवीं शताब्दी के प्रारंभ में आमेर के राजा मान सिंह ने भगवान बिंदु माधव मंदिर का निर्माण कराया था। इसे बाद में औरंगजेब द्वारा नष्ट कर आलमगीर मस्जिद का रूप दे दिया गया और तब से घाट का नाम पंचगंगा कहा जाने लगा। घाट के महात्म्य को देखते हुए वर्ष १९६५ में सरकार ने निचले भाग को भी पक्का कर दिया।

मठ और मंदिर…

श्रीमठ के साथ ही तैलंग स्वामी मठ का भी नाम आता है। उन्नीसवीं शताब्दी में महान संत तैलंग स्वामी यहां निवास करते थे। मठ में उनके हाथों स्थापित लगभग पचास मन भार का शिवलिंग आज भी पूजित है। घाट पर बिंदु विनायक, राम मंदिर (कंगन वाली हवेली), राम मंदिर (गोकर्ण मठ), रामानंद मंदिर, धूतपापेश्वर (शिव), रेवेन्तेश्वर (शिव) मंदिर आदि प्रमुख हैं। 

स्नान और मेला…

घाट पर कार्तिक शुल्क एकादशी से पूर्णिमा तक पंचगंगा स्नान का मेला लगता है। स्नानोपरांत श्रद्धालु जन मिट्टी से निर्मित भीष्म प्रतिमा का पूजन करते हैं।

 

मणिकर्णिका घाट 

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