Bageshri-Chakradhar

साहित्य और शास्त्रीय संगीत का अनूठा संगम: डॉ. बागेश्री चक्रधर का जीवन और अवदान

​लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘ अरुण’

 

​प्रस्तावना: सरस्वती और संगीत की युगल साधिका

​आधुनिक हिंदी साहित्य और शास्त्रीय संगीत के पटल पर डॉ. बागेश्री चक्रधर एक ऐसा सम्मानित नाम हैं, जिन्होंने अपनी बहुमुखी प्रतिभा से शिक्षा, आलोचना और लोक-संवेदनाओं को एक नया क्षितिज दिया है। वे एक साथ शब्द और स्वर दोनों की साधिका हैं। जहाँ एक ओर हिंदी आलोचना की व्यावहारिक समीक्षा में उनका शोधकार्य मील का पत्थर माना जाता है, वहीं दूसरी ओर शास्त्रीय गायन के क्षेत्र में उनकी कलात्मक पकड़ उनके गहरे रचनात्मक व्यक्तित्व को दर्शाती है।

जन्म, संस्कार और पारिवारिक पृष्ठभूमि

​डॉ. बागेश्री चक्रधर जी का जन्म ३ जनवरी, सन १९५४ को उत्तर प्रदेश के सांस्कृतिक और साहित्यिक रूप से अत्यंत समृद्ध ज़िले ‘हाथरस’ में हुआ था। हाथरस की माटी से मिले काव्य और संगीत के संस्कारों को उन्होंने अपने जीवन का ध्येय बना लिया।

​पारिवारिक और वैवाहिक जीवन की बात करें, तो उनका विवाह हिंदी जगत् के शीर्षस्थ हस्ताक्षर, मूर्धन्य कवि और हास्य विधा के अंतरराष्ट्रीय पुरोधा प्रो. अशोक चक्रधर जी के साथ हुआ। साहित्यिक अभिरुचि वाले इस सुविख्यात परिवार में डॉ. बागेश्री जी ने न केवल अपने स्वतंत्र रचनात्मक अस्तित्व को चमकाया, बल्कि नई पीढ़ी को भी ऊंचे संस्कार दिए। उनकी दो संतानें हैं—पुत्र अनुराग चक्रधर और पुत्री स्नेहा चक्रधर (जो स्वयं एक ख्यातिप्राप्त ओडिसी नृत्यांगना हैं), जो अपनी माता की इस सांस्कृतिक विरासत को निरंतर आगे बढ़ा रहे हैं।

 

​उच्च शिक्षा और अकादमिक उपलब्धियाँ

​डॉ. बागेश्री जी की शैक्षणिक यात्रा अत्यंत गौरवमयी और अनुकरणीय रही है। उन्होंने हिंदी साहित्य के प्रति अगाध प्रेम के कारण हिंदी विषय से स्नातकोत्तर (M.A.) की उपाधि प्राप्त की। इसके पश्चात उन्होंने शिक्षा जगत में अपनी सार्थकता सिद्ध करने के लिए बी.एड. (B.Ed.) किया। साहित्य की गहराइयों में जाकर उन्होंने अपनी उत्कृष्ट शोध दृष्टि का परिचय देते हुए पी-एच.डी. (Ph.D.) की गरिमापूर्ण डिग्री हासिल की।

​साहित्य के समानांतर ही उनकी संगीत साधना भी चलती रही, जिसके अंतर्गत उन्होंने शास्त्रीय गायन में ‘संगीत प्रभाकर’ की प्रतिष्ठित उपाधि अर्जित की। स्वर और शब्द का यही दुर्लभ समन्वय उनकी रचनात्मकता को अन्य समकालीन लेखकों से अलग और विशिष्ट बनाता है।

 

​सम्प्रति: शिक्षा और कला जगत में कुशल नेतृत्व

​डॉ. बागेश्री चक्रधर वर्तमान में देश के कई प्रतिष्ठित शैक्षणिक और सांस्कृतिक संस्थानों में अत्यंत महत्वपूर्ण प्रशासनिक एवं अकादमिक पदों की ज़िम्मेदारी संभाल रही हैं:

​प्रधानाचार्या: ‘जयजयवंती संगीत संस्थान’ (जहाँ वे भारतीय शास्त्रीय संगीत के संरक्षण और संवर्धन के लिए नई पीढ़ी को तैयार कर रही हैं)।

​प्रबंध निदेशिका: ‘ए.बी.सी. फिल्म्स प्राइवेट लिमिटेड’ (जिसके माध्यम से वे कला और दृश्य-श्रव्य माध्यमों को वैचारिक दिशा दे रही हैं)।

​अतिथि प्रवक्ता (हिंदी): दिल्ली विश्वविद्यालय के अत्यंत ख्यातिप्राप्त ‘शहीद भगतसिंह कॉलेज’, नई दिल्ली में वे हिंदी की अतिथि प्रवक्ता के रूप में युवा विद्यार्थियों में साहित्य के प्रति अभिरुचि जगा रही हैं।

 

​प्रकाशित पुस्तकें एवं शोधपरक कृतित्व

​एक गंभीर समीक्षक और साहित्यकार के रूप में डॉ. बागेश्री जी की प्रकाशित पुस्तकें और लेख हिंदी आलोचना जगत में बड़े आदर के साथ पढ़े जाते हैं। उनकी प्रमुख प्रकाशित कृतियाँ इस प्रकार हैं:

​’हिन्दी कविता की शुक्लपूर्व व्यावहारिक समीक्षा’ (शोधकार्य): इस अत्यंत महत्त्वपूर्ण शोध ग्रंथ में उन्होंने आचार्य रामचंद्र शुक्ल से पूर्व की हिंदी कविता की व्यावहारिक समीक्षा का ऐतिहासिक और वैज्ञानिक मूल्यांकन किया है।

​’तानसेन’: संगीत के महानायक तानसेन के जीवन और संगीत दर्शन पर केंद्रित एक प्रामाणिक पुस्तक।

​’व्यावहारिक समीक्षा का पहला कदम’: आलोचना के क्षेत्र में कदम रखने वाले नए शोधार्थियों के लिए एक व्यावहारिक मार्गदर्शिका।

​’समीक्षा माने ज्ञानराशि’: साहित्य समीक्षा के सैद्धांतिक और व्यावहारिक पक्षों को उजागर करती एक महती कृति।

​’मकरंद ही ठीक है’ (मुक्तक संकलन): उनके भावुक और काव्यात्मक हृदय का परिचायक, जिसमें उनके लिखे उत्कृष्ट मुक्तकों का संग्रह है।

​इसके अतिरिक्त संगीत एवं साहित्य से जुड़े उनके अनगिनत शोध-लेख, पुस्तक समीक्षाएँ और समसामयिक कविताएँ देश की जानी-मानी मुख्य पत्रिका ‘संगीत’ के साथ-साथ अनेक राष्ट्रीय समाचार पत्रों और प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित होते रहे हैं।

 

​काव्यगत संचेतना और प्रमुख रचनाएँ

​एक कवि के रूप में डॉ. बागेश्री चक्रधर की कविताएँ जीवन के यथार्थ, मानवीय रिश्तों के द्वंद्व, व्यवस्था के पाखंड और स्त्री-मन की छटपटाहट को बहुत सहजता और गहराई से बयां करती हैं। उनकी कविताओं में ‘लोकतंत्र’ और ‘जनतंत्र’ पर गहरी चोट है, तो वहीं ‘प्यार’ और ‘मेहनत’ का बेहद कोमल व व्यावहारिक चित्रण भी है। उनकी प्रमुख काव्य रचनाओं की सूची इस प्रकार है:

​१. चुभन

२. तब और अब

३. बताती हूं

४. प्यार क्या है

५. मेहनत का नगीना

६. अपना जनतंत्र

७. लोकतंत्र की खातिर

८. कहेगी दुनिया

९. क्यों

१०. एक सलाह

११. कैसे समझाऊं

१२. उपेक्षा का क्षण

१३. उल्लास के क्षण

१४. क्यों है

१५. क्या करेगा तू

१६. कैसे पिता हो

१७. अब न होगा

१८. स्वर्णमृग

१९. मकरंद ही ठीक है

 

​उपसंहार: कला और वैचारिकता का अमूल्य स्तंभ

​डॉ. बागेश्री चक्रधर का संपूर्ण जीवन और उनका कृतित्व इस बात का साक्ष्य है कि यदि भीतर कला और विद्या की सच्ची तड़प हो, तो प्रशासनिक व्यस्तताओं के बीच भी उत्कृष्ट साहित्य और संगीत को जीवित रखा जा सकता है। एक शिक्षक, समीक्षक, प्रबंधिका और कवि के रूप में उनका यह योगदान आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणास्रोत बना रहेगा।

​धन्यवाद!

 

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