द्विवेदी युग के अप्रतिम पुरोधा: पंडित लोचन प्रसाद पाण्डेय का साहित्यिक एवं पुरातात्त्विक अवदान
लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’
प्रस्तावना: बहुभाषी और बहुआयामी व्यक्तित्व
पंडित लोचन प्रसाद पाण्डेय हिंदी साहित्य के उन विरल आचार्यों में से हैं, जिन्होंने द्विवेदी युग के शक्ति-संचय काल में अपनी लेखनी से राष्ट्रीय चेतना और लोक-कल्याण को नए आयाम दिए। वे केवल एक भाषा के साधक नहीं थे; उन्होंने हिंदी एवं उड़िया, दोनों ही समृद्ध भाषाओं में उच्च कोटि की काव्य रचनाएँ कीं। सन १९०५ से ही उनकी उत्कृष्ट कविताएँ तत्कालीन साहित्याकाश के सूर्य ‘सरस्वती’ तथा अन्य प्रतिष्ठित मासिक पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित होने लगी थीं।
लोचन प्रसाद जी की रचनाओं में जहाँ एक ओर कथा-प्रबंध का सुव्यवस्थित ढांचा दिखाई देता है, वहीं दूसरी ओर फुटकर (स्फुट) कविताओं में समाज-सुधार की छटपटाहट मिलती है। वे सुप्रसिद्ध ‘भारतेन्दु साहित्य समिति’ के सक्रिय और सम्मानित सदस्य थे। तत्कालीन मध्य प्रदेश (और वर्तमान छत्तीसगढ़) के अग्रणी साहित्यकारों में उनकी असाधारण प्रतिष्ठा थी और आज भी उनका नाम संपूर्ण हिंदी जगत् में बड़े आदर व श्रद्धा के साथ लिया जाता है।
जन्म, संस्कार और विराट परिवार
लोचन प्रसाद पाण्डेय जी का जन्म ४ जनवरी, सन १८८७ ई. को मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक बिलासपुर ज़िले (जो वर्तमान में छत्तीसगढ़ राज्य का गौरवशाली हिस्सा है) के ‘बालपुर’ नामक ग्राम में हुआ था। उनके पिता पंडित चिंतामणि पाण्डेय परम विद्याव्यसनी और उदार हृदय के धनी थे। शिक्षा के प्रति अगाध प्रेम के कारण उन्होंने अपने गाँव में बालकों की शिक्षा-दीक्षा के लिए एक निजी पाठशाला खुलवाई थी। यही संस्कार लोचन प्रसाद जी को विरासत में मिले।
पंडित चिंतामणि जी का परिवार अत्यंत विशाल और सुशिक्षित था। लोचन प्रसाद जी अपने पिता के चतुर्थ आत्मज थे। वे कुल आठ भाई थे—पुरुषोत्तम प्रसाद, पदमलोचन, चन्द्रशेखर, लोचन प्रसाद, विद्याधर, वंशीधर, मुरलीधर और मुकुटधर (जिन्हें हिंदी में छायावाद का आदि प्रवर्तक माना जाता है)। इसके साथ ही चंदन कुमारी, यज्ञ कुमारी, सूर्य कुमारी और आनंद कुमारी नाम की उनकी चार बहनें थीं। इस भरे-पूरे सुसंस्कृत परिवार ने उनके भीतर साहित्यिक चेतना के बीज बोए।
शिक्षा, भ्रमण और इतिहास-पुरातत्त्व अन्वेषण
पाण्डेय जी की प्रारंभिक शिक्षा उनके पिता द्वारा स्थापित बालपुर की उसी निजी पाठशाला में हुई। कुशाग्र बुद्धि के धनी लोचन प्रसाद ने सन १९०२ में मिडिल स्कूल की परीक्षा संबलपुर से उत्तीर्ण की। इसके पश्चात उच्च शिक्षा के लिए वे उस दौर के बौद्धिक केंद्र कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) चले गए, जहाँ से सन १९०५ में उन्होंने इंटरमीडिएट की परीक्षा ससम्मान पास की। कलकत्ता के बाद वे बनारस (काशी) गए, जहाँ उनका संपर्क तत्कालीन अनेक साहित्योपासकों और मनीषि विद्वानों से हुआ।
वे एक जन्मजात अध्येता थे। उन्होंने बिना किसी औपचारिक संस्थान के, केवल अपने व्यक्तिगत प्रयत्नों से उड़िया, बंगला और संस्कृत भाषाओं का गूढ़ ज्ञान प्राप्त किया। लोचन प्रसाद जी केवल पुस्तकालयों के लेखक नहीं थे; उन्होंने अपने जीवन काल में देश के अनेक सुदूर अंचलों का भ्रमण किया। साहित्यिक गोष्ठियों, सम्मेलनों, कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशनों और इतिहास-पुरातत्त्व के खोजी अभियानों में वे सदैव अग्रगामी रहे। उनके इसी अन्वेषणी स्वभाव के कारण छत्तीसगढ़ और मध्य भारत के अनेक प्राचीन गढ़, ऐतिहासिक शिलालेख, ताम्रपत्र और प्रागैतिहासिक गुफाएँ प्रकाश में आ सकीं। इतिहास को प्रामाणिक दस्तावेज देने के उद्देश्य से सन १९२३ में उन्होंने ‘छत्तीसगढ़ गौरव प्रचारक मंडली’ की स्थापना की, जो कालान्तर में ‘महाकौशल इतिहास परिषद’ के रूप में विख्यात हुई। साहित्य, इतिहास और पुरातत्त्व—तीनों ही विधाओं पर उनका समान और अकाट्य अधिकार था।
सरल स्वभाव और सामाजिक उपदेशक का दायित्व
लोचन प्रसाद पाण्डेय स्वभाव से अत्यंत सरल, निश्छल, विनम्र और आत्मीय थे। उनका व्यवहार हर किसी के प्रति अत्यंत अपनापन लिए होता था। उन्होंने अपनी रचनाओं को केवल विलास की वस्तु नहीं बनाया, बल्कि उनके माध्यम से पाठकों के चरित्रोत्थान और नैतिक विकास की प्रेरणा दी। उस दौर में समाज को दिशा देने या उपदेशक का कार्य करना आज के युग की तरह सुगम नहीं था; अतः उन्होंने साहित्य को ही समाज-सुधार का माध्यम बनाया।
उनकी नीतिपरक रचनाओं ने पाठकों के मन में आत्मसंयम और सदाचार के प्रति गहरी रुचि उत्पन्न की। ‘भारतेन्दु साहित्य समिति’ के सम्मानित सदस्य के रूप में उन्होंने हिंदी के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यही कारण है कि संपूर्ण मध्य भारत और छत्तीसगढ़ में उनके प्रति आज भी अगाध आदर, सम्मान और पूज्य भाव विद्यमान है।
साहित्यिक कृतित्व और काव्यगत विशेषताएँ
लोचन प्रसाद पाण्डेय का समग्र साहित्यिक-कृतित्व मानव के चरित्रोत्थान, नीति-पोषण, उपदेश-दान, यथार्थ चित्रण और लोककल्याण के पावन उद्देश्य के लिए ही परिमार्जित (परिसृष्ट) हुआ है। उनके काव्य का वस्तुगत रूपाधार पूरी तरह अभिधामूलक, निश्चित, स्पष्ट और असांकेतिक है। वे किसी रहस्यमयी या उलझी हुई भाषा के बजाय सीधे कथा और ऐतिहासिक घटना का ठोस आधार लेकर वृत्तात्मक (इतिवृत्तात्मक) कविताएँ लिखा करते थे।
सन १९०५ ई. से जब उनकी कविताएँ आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के संपादन में ‘सरस्वती’ में प्रकाशित होनी शुरू हुईं, तब तक भारतेन्दु बाबू का सांस्कृतिक जागरण-तृयं (बिगुल) देश में गूँज चुका था। द्विवेदी युग के इस शक्ति-संचय काल में पाण्डेय जी का साहित्य-पटल पर आगमन एक नई ऊर्जा लेकर आया। उनकी कविताओं में सहृदय सामयिकता, ओज, संतुलित पद-योजना और तत्सम प्रधान पदावली का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है। अमूर्त सांकेतिकता के अभाव में भी हृदय को छू लेने वाले इतिवृत्त के कारण उनकी कविताओं ने पाठकों का ध्यान तीव्रता से अपनी ओर आकृष्ट किया। उनकी प्रसिद्ध कविता ‘मृगी दु:खमोचन’ में न केवल मानव, बल्कि वृक्ष, वनस्पति और पशु-पक्षियों के प्रति भी उनकी अगाध सहृदयता अत्यंत मार्मिक रूप में व्यक्त हुई है। वे निश्चित ही मध्य भारत के अग्रगण्य साहित्य-नेता थे।
कालजयी कृतियों का वृहद् संग्रह (४४ प्रमुख रचनाएँ)
लोचन प्रसाद पाण्डेय जी ने नाटक, काव्य, उपन्यास, अनुवाद और इतिहास जैसी अनेक विधाओं में दो दर्जन से अधिक (लगभग ४४) अमूल्य ग्रंथों की रचना की, जो निम्नलिखित हैं:
१. कलिकाल (ऐतिहासिक छत्तीसगढ़ी नाटक, १९०५)
२. प्रवासी (काव्य संग्रह, १९०६)
३. दो मित्र (सामाजिक उपन्यास, १९०६)
४. बालिका विनोद (१९०९)
५. नीति कविता (१९०९)
६. हिन्दू विवाह और उसके प्रचलित दूषण (सामाजिक विमर्श, १९०९)
७. कविता कुसुममाला (१९०९)
८. कविता कुसुम (उड़ियाँ काव्य संग्रह, १९०९)
९. रोगी रोगन (उड़ियाँ काव्य संग्रह, १९०९)
१०. भुतहा मंडल (१९१०)
११. महानदी (उड़ियाँ काव्य संग्रह, १९१०)
१२. दिल बहलाने की दवा (१९१०)
१३. शोकोच्छवास (१९१०)
१४. लेटर्स टू माई ब्रदर्स (अंग्रेजी पत्र-संग्रह, १९११)
१५. रघुवंश सार (कालिदास कृत रघुवंश का प्रामाणिक अनुवाद, १९११)
१६. भक्ति उपहार (उड़ियाँ धार्मिक रचना, १९११)
१७. सम्राट स्वागत (१९११)
१८. राधानाथ राय : द नेशनल पोएट ऑफ़ ओरिसा (अंग्रेजी आलोचना, १९११)
१९. द वे टू बी हैप्पी एंड गे (१९१२)
२०. भक्ति पुष्पांजलि (१९१२)
२१. त्यागवीर भ्राता लक्ष्मण (चरित्र-काव्य, १९१२)
२२. हमारे पूज्यपाद पिता (संस्मरण/जीवनी, १९१३)
२३. बाल विनोद (बाल साहित्य, १९१३)
२४. साहित्य सेवा (१९१४)
२५. प्रेम प्रशंसा (नाटक, १९१४)
२६. माधव मंजरी (नाटक, १९१४)
२७. आनंद की टोकरी (नाटक, १९१४)
२८. मेवाड़गाथा (ऐतिहासिक नाटक, १९१४)
२९. चरित माला (प्रेरणादायी जीवनी, १९१४)
३०. पद्य पुष्पांजलि (१९१५)
३१. माहो कीड़ा (कृषि विज्ञान पर शोध, १९१५)
३२. छात्र दुर्दशा (समसामयिक नाटक, १९१५)
३३. क्षयरोगी सेवा (चिकित्सा एवं समाज सेवा, १९१५)
३४. उन्नति कहां से होगी (वैचारिक नाटक, १९१५)
३५. ग्राम्य विवाह विधान (नाटक, १९१५)
३६. पुष्पांजलि (संस्कृत काव्य रचना, १९१५)
३७. भर्तृहरि नीति शतक (संस्कृत से पद्यानुवाद, १९१६)
३८. छत्तीसगढ़ भूषण काव्योपाध्याय हीरालाल (प्रामाणिक जीवनी, १९१७)
३९. रायबहादुर हीरालाल (जीवनी, १९show)
४०. महाकोशल हिस्तरिकल सोसायटी पेपर्स (भाग १ एवं २, पुरातात्त्विक शोध)
४१. जीवन ज्योति (१९२०)
४२. महाकोसल प्रशस्ति रत्नमाला (ऐतिहासिक ग्रंथ, १९५६)
४३. कौसल कौमुदी (पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर से प्रकाशित)
४४. समय की शिला पर (गुरू घासीदास विश्वविद्यालय, बिलासपुर द्वारा मरणोपरांत प्रकाशित)
सम्मान एवं महाप्रयाण
साहित्य, इतिहास और पुरातत्त्व के क्षेत्र में उनकी इस अविराम और निःस्वार्थ साधना को सम्मानित करते हुए तत्कालीन विद्वत्-समाजों द्वारा उन्हें ‘काव्य विनोद’ तथा ‘साहित्य-वाचस्पति’ जैसी सर्वोच्च और गरिमामयी उपाधियों से विभूषित किया गया था। माँ भारती का यह अनन्य और निष्काम साधक ८ नवम्बर, सन १९५९ को इस नश्वर संसार को छोड़कर महाप्रयाण कर गया, किंतु अपनी कालजयी कृतियों और पुरातात्त्विक खोजों के रूप में वे इतिहास के पन्नों पर सदा के लिए अमर हो गए।
धन्यवाद!