न्याय और संविधान के रक्षक न्यायमूर्ति एम. पतंजलि शास्त्री: आज़ाद भारत के द्वितीय मुख्य न्यायाधीश
लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’
प्रस्तावना: भारतीय न्यायपालिका के शुरुआती शिल्पी
स्वाधीन भारत के न्यायिक इतिहास में न्यायमूर्ति एम. पतंजलि शास्त्री का नाम अत्यंत आदर के साथ लिया जाता है। वे स्वतंत्र भारत के दूसरे मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice of India – CJI) थे। सर्वोच्च न्यायालय के शुरुआती और संकटपूर्ण दौर में उन्होंने ७ नवम्बर, १९५१ से ३ जनवरी, १९५४ तक देश के मुख्य न्यायाधीश के पद को सुशोभित किया। अपने कार्यकाल में उन्होंने कानून के शासन (Rule of Law) और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की जो सुदृढ़ नींव रखी, वह आज भी भारतीय लोकतंत्र का आधार स्तंभ है।
जन्म, पारिवारिक पृष्ठभूमि और विधिक शिक्षा
जस्टिस एम. पतंजलि शास्त्री का जन्म एक सुविज्ञ और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध परिवार में हुआ था।
पारिवारिक विरासत: वे मद्रास के प्रसिद्ध पचैयप्पा कॉलेज (Pachaiyappa’s College) के वरिष्ठ संस्कृत पंडित कृष्ण शास्त्री जी के सुपुत्र थे। पिता की विद्वता और भाषाई शुचिता का प्रभाव पतंजलि शास्त्री जी के व्यक्तित्व और उनके आगे के विधिक निर्णयों पर साफ दिखाई देता था।
शिक्षा की राह: उन्होंने अपनी प्रारंभिक उच्च शिक्षा के अंतर्गत कला स्नातक (B.A.) की उपाधि प्राप्त की। इसके पश्चात, उन्होंने मद्रास विश्वविद्यालय (University of Madras) से कानून की पढ़ाई पूरी कर एलएलबी (LL.B.) की डिग्री हासिल की और विधिक क्षेत्र में कदम रखा।
विधिक कॅरियर: कर कानून के विशेषज्ञ से बेंच तक का सफर
सन १९१४ में एम. पतंजलि शास्त्री ने मद्रास उच्च न्यायालय (Madras High Court) में एक वकील के रूप में अपने ऐतिहासिक कॅरियर का श्रीगणेश किया।
कर कानून में विशेषज्ञता: अपनी कुशाग्र बुद्धि और गहन तार्किक क्षमता के बल पर उन्होंने जल्द ही कर कानून (Tax Law) के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट ख्याति अर्जित की। विशेषकर चेट्टियार (Chettiar) समुदाय के ग्राहकों के व्यापारिक और कर संबंधी जटिल मामलों में उनकी विशेषज्ञता बेजोड़ मानी जाती थी।
आयकर आयुक्त के सलाहकार: उनकी इस विधिक प्रतिभा को देखते हुए सन १९२२ में उन्हें आयकर आयुक्त (Commissioner of Income Tax) का स्थायी सलाहकार नियुक्त किया गया। इस महत्वपूर्ण पद पर रहते हुए उन्होंने अपनी कानूनी कौशल का लोहा मनवाया।
न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति: लगभग सत्रह वर्षों की सफल वकालत और विधिक सेवा के बाद, १५ मार्च, १९३९ को वे मद्रास उच्च न्यायालय की खंडपीठ (Bench) में न्यायाधीश के रूप में नियुक्त हुए। न्यायाधीश के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने सर सिडनी वाड्सवर्थ (Sir Sidney Wadsworth) के साथ मिलकर मद्रास के ‘कृषक ऋण मुक्ति अधिनियम’ (Agriculturists Relief Act) के पारित होने के बाद उसके क्रियान्वयन पर ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण कार्य किया, जिसने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बड़ी राहत दी।
संघीय न्यायालय से देश के सर्वोच्च न्यायाधीश तक का सफर
जस्टिस पतंजलि शास्त्री का न्याय के प्रति समर्पण उन्हें प्रांतीय न्यायालय से देश के सर्वोच्च विधिक मंच तक ले गया:
संघीय न्यायालय (Federal Court) में आगमन: ६ दिसंबर, १९४७ को, मद्रास उच्च न्यायालय में वरिष्ठता सूची में तीसरे स्थान पर होने के बावजूद, उनकी असाधारण योग्यता को देखते हुए उन्हें देश के ‘संघीय न्यायालय’ का न्यायाधीश बनाया गया। यही संघीय न्यायालय २६ जनवरी, १९५० को भारत का ‘सर्वोच्च न्यायालय’ (Supreme Court) बना।
आकस्मिक संकट और देश का सारथ्य: स्वतंत्र भारत के प्रथम मुख्य न्यायाधीश सर एच. जे. कनिया का ७ नवंबर, १९५१ को अचानक हृदय गति रुकने से असामयिक निधन हो गया। इस अप्रत्याशित और शोकपूर्ण परिस्थिति में, सर्वोच्च न्यायालय के सबसे वरिष्ठ सहयोगी न्यायमूर्ति होने के नाते ७ नवंबर, १९५१ को एम. पतंजलि शास्त्री को भारत का दूसरा मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया।
सेवानिवृत्ति: उन्होंने ३ जनवरी, १९५४ को अपनी सेवानिवृत्ति की आयु पूरी होने तक इस गरिमापूर्ण पद की मर्यादा को शीर्ष पर बनाए रखा और देश को कई ऐतिहासिक संवैधानिक फैसले दिए।