बुंदेलखंड का ‘सर वाल्टर स्कॉट’: बाबू वृंदावनलाल वर्मा का जीवन और कालजयी साहित्य विमर्श
लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’
प्रस्तावना: इतिहास को जीवंत करने वाली कालजयी लेखनी
हिंदी उपन्यास विधा में जब प्रेमचंद समाज के यथार्थ और ग्रामीण जीवन की वेदना को शब्दों में ढाल रहे थे, ठीक उसी समय बुंदेलखंड की वीर प्रसूता भूमि से एक ऐसा मनीषी उभर रहा था, जिसने इतिहास के दबे हुए पन्नों पर जमी धूल को अपनी कल्पना और शोध की फूँक से उड़ा दिया। वे महापुरुष थे—बाबू वृंदावनलाल वर्मा।
वर्मा जी केवल एक कथाकार नहीं थे; वे इतिहास के एक ऐसे खोजी यायावर थे जिन्होंने किलों की ढहती हुई प्राचीरों, बियाबान जंगलों और लोक-किंवदंतियों में दबे पड़े शौर्य को जीवंत पात्रों में बदल दिया। उन्होंने हिंदी साहित्य को उस समय ‘ऐतिहासिक उपन्यास’ की समृद्ध परंपरा से नव-शृंगारित किया, जब इसकी सबसे अधिक आवश्यकता थी। ‘गढ़ कुण्डार’ से लेकर ‘मृगनयनी’ और ‘झाँसी की रानी’ तक की उनकी साहित्यिक यात्रा वास्तव में अतीत के गौरव को वर्तमान के संकल्प से जोड़ने का एक पवित्र सेतु है।
जन्म, परिवेश और संस्कार-भूमि
वृंदावनलाल वर्मा जी का जन्म उत्तर प्रदेश के झाँसी जिले के अंतर्गत आने वाले ऐतिहासिक कस्बे मऊरानीपुर में हुआ था।
पारिवारिक पृष्ठभूमि: इनका जन्म एक अत्यंत सुसंस्कृत परिवार में हुआ। इनके पिता का नाम अयोध्या प्रसाद था, जिन्होंने बाल्यकाल से ही वर्मा जी के भीतर उच्च मानवीय मूल्यों के बीज बोए।
विद्या-गुरु का प्रभाव: वर्मा जी के व्यक्तित्व और उनकी बौद्धिक चेतना को तराशने का श्रेय उनके विद्या-गुरु स्वर्गीय पण्डित विद्याधर दीक्षित को जाता है। दीक्षित जी के सानिध्य में ही वर्मा जी ने भारतीय संस्कृति, पुराणों और इतिहास के प्रति अपनी बुनियादी समझ को पुख्ता किया।
शिक्षा, विधिक करियर और प्रारंभिक लेखन का अंकुरण
वर्मा जी की प्रारंभिक शिक्षा अलग-अलग स्थानों पर हुई, जिससे उन्हें विभिन्न क्षेत्रों की संस्कृति को निकट से देखने का अवसर मिला।
कानून की पढ़ाई और वकालत: बी.ए. की उपाधि प्राप्त करने के पश्चात उन्होंने कानून (विधि) की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद वे झाँसी में ही रहकर वकालत करने लगे। न्यायशास्त्र के इस व्यावहारिक ज्ञान ने आगे चलकर उनके उपन्यासों के कथानक और चरित्र-चित्रण में एक अद्भुत तार्किक कसावट पैदा की।
बचपन का लेखक: लेखन की प्रवृत्ति तो उनके भीतर शैशवावस्था से ही कुलाँचे मार रही थी। जब वे मात्र नवीं श्रेणी (कक्षा 9) में पढ़ रहे थे, तभी उन्होंने तीन छोटे-छोटे नाटक लिखे। इन नाटकों को उन्होंने प्रयाग के प्रसिद्ध ‘इण्डियन प्रेस’ भेजा, जहाँ उनकी प्रतिभा को पहचानते हुए उन्हें पुरस्कार स्वरूप ५० रुपये प्रदान किए गए—जो उस दौर में एक बाल-लेखक के लिए बहुत बड़ी प्रोत्साहन राशि थी।
अनुवाद और मौलिक सृजन: इसी शुरुआती दौर में उन्होंने ‘महात्मा बुद्ध का जीवन-चरित’ नामक एक मौलिक ग्रंथ की रचना की और अंग्रेजी के महान नाटककार विलियम शेक्सपीयर के प्रसिद्ध नाटक ‘टेम्पेस्ट’ (Tempest) का बेहद खूबसूरत हिंदी अनुवाद भी प्रस्तुत किया।
साहित्यिक यात्रा: क्रांति का शंखनाद और स्कॉट का प्रभाव
वर्मा जी का साहित्यिक जीवन भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के उस दौर में परवान चढ़ रहा था जब ब्रिटिश हुकूमत की कलम पर भी सख्त पहरे थे।
जब्त हुआ पहला नाटक: सन १९०९ ई. में वर्मा जी का ‘सेनापति ऊदल’ नामक नाटक प्रकाशित हुआ। बुंदेली शौर्य से ओतप्रोत इस नाटक ने तत्कालीन ब्रिटिश सरकार को इतना डरा दिया कि उन्होंने इस कृति को तुरंत जब्त (Banned) कर लिया। यह घटना सिद्ध करती है कि वर्मा जी की लेखनी में शुरुआत से ही राष्ट्रीय चेतना की धधकती ज्वाला थी।
कहानी से निबंध तक का सफर: १९२० ई. तक वे लगातार छोटी-छोटी कहानियाँ लिखते रहे। इसके बाद सन १९२१ ई. से उन्होंने गंभीर विषयों पर निबंध लेखन की शुरुआत की।
‘सर वाल्टर स्कॉट’ से प्रेरणा: वर्मा जी ने विश्व साहित्य का गहरा अध्ययन किया था। उन्होंने अंग्रेजी के प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपन्यासकार सर वाल्टर स्कॉट (Sir Walter Scott) के उपन्यासों का स्वेच्छापूर्वक और अत्यंत सूक्ष्म अध्ययन किया। स्कॉट की लेखन शैली से वे इतने प्रभावित हुए कि उन्हें हिंदी में ऐतिहासिक उपन्यास लिखने की मूल प्रेरणा वहीं से मिली। इसी कारण आलोचक उन्हें ‘हिंदी का वाल्टर स्कॉट’ भी कहते हैं।
उपन्यासों का स्वर्ण युग: वर्ष १९२७ और ‘झाँसी की रानी’ का उदय
सन १९२७ ई. वर्मा जी के जीवन का वह चमत्कारी वर्ष था, जिसने हिंदी उपन्यास विधा का भूगोल बदल दिया। उन्होंने केवल दो महीने के भीतर अपना पहला महान ऐतिहासिक उपन्यास ‘गढ़ कुण्डार’ लिख डाला (जो १९३० ई. में पुस्तक रूप में सामने आया)।
इसी कालखंड के आस-पास उन्होंने ‘लगन’, ‘संगम’, ‘प्रत्यागत’, ‘कुण्डली चक्र’, ‘प्रेम की भेंट’ तथा निबंधात्मक कृति ‘हृदय की हिलोर’ की रचना की। १९३० ई. में एक और कालजयी कृति ‘विराट की पद्मिनी’ लिखने के बाद कुछ वर्षों के लिए उनका लेखन स्थगित रहा। इसके बाद १९३९ ई. में उन्होंने व्यंग्य विधा में हाथ आजमाया और १९४२-४४ ई. के बीच ‘कभी न कभी’ तथा ‘मुसाहिब जू’ जैसे उपन्यास लिखे।
सन १९४६ ई. में उनका सबसे प्रसिद्ध और हिंदी साहित्य का मील का पत्थर माना जाने वाला उपन्यास ‘झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई’ प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास के लिए वर्मा जी ने झाँसी और बुंदेलखंड के गाँवों में घूम-घूमकर लोकगीतों और मौखिक इतिहास को एकत्रित किया था। इसके बाद तो उनकी कलम अबाध रूप से चलती रही।
वर्मा जी का वृहद् साहित्य संसार (वर्गीकृत विधाएँ)
वर्मा जी की रुचि केवल इतिहास तक सीमित नहीं थी; कला, पुरातत्त्व, मनोविज्ञान, चित्रकला और मूर्तिकला में उनकी गहरी पैठ थी। उनकी विशाल कृतियों का वर्गीकरण इस प्रकार है:
क) ऐतिहासिक उपन्यास (इतिहास का सजीव रस)
वर्मा जी के ये उपन्यास केवल इतिहास की तारीखें नहीं बताते, बल्कि उस दौर के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन को साक्षात कर देते हैं:
मृगनयनी (१९५० ई.): यह वर्मा जी की सर्वश्रेष्ठ और कालजयी रचना मानी जाती है। इसमें १५वीं शताब्दी के अंत के ग्वालियर राज्य के महाराजा मानसिंह तोमर और उनकी गूजरी रानी ‘मृगनयनी’ की अद्भुत प्रेम और शौर्य गाथा है। इसमें लाखी और अटल की उपकथा भी कलात्मकता के साथ बुनी गई है।
कचनार (१९४७ ई.): यह उपन्यास इतिहास और जन-परंपरा पर आधारित है। इसकी घटनाएँ पूर्णतः सत्य हैं, जिसका केंद्र धमोनी (राजगोंडों की रियासत) है। इसमें एक साधारण नारी ‘कचनार’ के सतत संघर्षशील और संयमित जीवन के साथ-साथ दुर्व्यवसनग्रस्त गुसाइयों की हीन दशा का चित्रण है।
टूटे काँटें (१९४५ ई.): इसमें एक साधारण जाट मोहनलाल और प्रसिद्ध नर्तकी नूरबाई के उत्थान-पतन के माध्यम से १८वीं शताब्दी के राजनीतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक जीवन का दिग्दर्शन है।
अहिल्याबाई: मराठा साम्राज्य के गौरवशाली जीवन से संबंधित उपन्यास, जो लोकमाता अहिल्याबाई होलकर जैसी आदर्श हिंदू नारी के जीवन को समर्पित है।
भुवन विक्रम (१९५७ ई.): उत्तर वैदिक काल की पृष्ठभूमि पर आधारित, जिसकी केंद्र भूमि अयोध्या है। राजा रोमक, रानी ममता और राजकुमार भुवन के माध्यम से वैदिक संयम, अनुशासन और सभ्यता का जीवंत खाका खींचा गया है।
माधवजी सिन्धिया (१९५७ ई.): १८वीं शताब्दी के महान पेशवा पटेल माधवजी सिन्धिया के जटिल और संघर्षमय जीवन पर आधारित।
अन्य प्रमुख ऐतिहासिक उपन्यास: ‘गढ़ कुण्डार’, ‘झाँसी की रानी’, ‘विराट की पद्मिनी’।
ख) सामाजिक उपन्यास (कुरीतियों पर प्रहार)
वर्मा जी ने समाज के यथार्थ और उसमें व्याप्त विसंगतियों को दूर करने के लिए कई महत्वपूर्ण सामाजिक उपन्यासों की रचना की:
लगन: प्रेमकथा के साथ बुंदेलखंड के दो स्वाभिमानी किसानों की आन-बान और संघर्ष।
संगम और प्रत्यागत: समाज में व्याप्त ऊँच-नीच, जाति-पाति की कठोरता, रूढ़िग्रस्तता और धर्मान्धता पर चोट।
प्रेम की भेंट: मानवीय संवेदनाओं और प्रेम के त्रिकोण की एक मर्मस्पर्शी लघु कथा।
कुण्डलीचक्र: ग्रामीण अंचल में शोषक जमींदारों और पीड़ित किसानों के बीच का तीखा संघर्ष।
कभी न कभी: मिल मजदूरों और श्रमजीवियों के हक, शोषण और उनके जीवन की अनकही गाथा।
अचल मेरा कोई: उच्च वर्ग और उच्च मध्यम वर्ग के खोखलेपन, विलासिता और उनके आपसी संबंधों का चित्रण।
सोना: बुंदेलखंड की एक प्रसिद्ध और मर्मस्पर्शी लोककथा के आधार पर रचित उपन्यास।
अमरवेल: आधुनिक भारत के निर्माण में सहकारिता (Cooperation) तथा सामूहिक श्रमदान के महत्व का प्रतिपादन।
ग) नाट्य साहित्य (रंगमंच पर राष्ट्र चेतना)
वर्मा जी ने नाटकों को भी दो प्रमुख धाराओं में बाँटकर समाज और राष्ट्र को नई दिशा दी:
ऐतिहासिक नाटक: इसमें औपन्यासिक कृति का नाट्य रूपांतरण ‘झाँसी की रानी’, जैन ग्रंथ ‘प्रभाकर चरित’ पर आधारित ‘हंसमयूर’, पूर्वी द्वीपों में भारतीय संस्कृति के विस्तार को दिखाता ‘पूर्व की ओर’, सम्राट अकबर को महान बनाने वाले उनके दरबारी के चतुर प्रयासों पर केंद्रित ‘बीरबल’, ‘भुवन विक्रम’ से प्रेरित ‘ललित विक्रम’ और मुगल इतिहास के पतन को रेखांकित करता ‘जहाँदारशाह’ मुख्य हैं। इनके अतिरिक्त ‘फूलों की बोली’ में स्वर्ण बनाने के चक्कर में पड़े लोगों की मूर्खता पर करारा व्यंग्य है।
सामाजिक नाटक: इनमें तत्कालीन राजनीतिक और सामाजिक विसंगतियों पर गहरा कटाक्ष है। जैसे—१९३७ के कांग्रेस मंत्रिमंडल की स्थिति पर ‘धीरे-धीरे’, हिंदू समाज में राखी की पवित्र प्रथा की रक्षा पर ‘राखी की लाज’, कॉलेज के प्रेम की ओछी मनोवृत्ति पर ‘बाँस की फाँस’, पुरानी बारात प्रथा के दासों पर ‘पीले हाथ’, कालाबाजारी के खिलाफ ‘सगुन’, विज्ञान और अध्यात्म के समन्वय पर ‘नीलकण्ठ’, राजनीतिक दलबंदी पर ‘केवट’, बेमेल विवाह पर ‘मंगलसूत्र’, मनोबल की शक्ति पर ‘खिलौने की खोज’, हरिजन सुधार पर ‘निस्तार’ और सामाजिक पर्वों पर दिखावे के फिजूलखर्च पर चोट करता नाटक ‘देखादेखी’ शामिल हैं।
घ) कहानी संग्रह और निबंध
उनके जीवनकाल में ‘दबे पाँव’, ‘मेढ़क का ब्याह’, ‘अम्बपुर के अमर वीर’, ‘ऐतिहासिक कहानियाँ’, ‘अँगूठी का दान’, ‘शरणागत’, ‘कलाकार का दण्ड’ और ‘तोषी’ जैसे ८ महत्वपूर्ण कहानी संग्रह प्रकाशित हुए। इसके अलावा उनका प्रसिद्ध निबंध संग्रह ‘हृदय की हिलोर’ उनकी दार्शनिक सोच को प्रकट करता है।
वैचारिक दर्शन: राष्ट्र-पुनर्निर्माण और कर्मवाद
वृंदावनलाल वर्मा जी की रचनाएँ केवल मनोरंजन के लिए नहीं लिखी गईं, बल्कि उनके पीछे एक ठोस वैचारिक अधिष्ठान था:
१. रूढ़ियों का विरोध: वर्मा जी भारत के पतन का सबसे बड़ा कारण यहाँ के रूढ़ि-जर्जर समाज को मानते थे। उन्होंने अपनी रचनाओं को समाजशास्त्रीय प्रयोगशाला बनाकर जाति-पाति, छुआछूत और अंधविश्वास जैसी कुरीतियों पर कड़ा प्रहार किया।
२. श्रम की महत्ता: वे अकर्मण्यता के घोर विरोधी और ‘श्रम के गौरव’ के सबसे बड़े समर्थक थे। ‘अमरवेल’ और ‘कभी न कभी’ जैसी कृतियाँ इसी श्रम-साधना का प्रमाण हैं।
३. प्रेम एक साधना: उनके दर्शन में प्रेम कोई उथला आकर्षण नहीं, बल्कि एक पवित्र साधना है, जो मनुष्य को वासना की सामान्य भूमि से उठाकर आत्मिक उच्चता की ओर ले जाती है।
४. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और गीता का संदेश: जीवन के प्रति उनका दृष्टिकोण पूर्णतः सनातन और प्राचीन भारतीय संस्कृति से अनुप्राणित था। वे श्रीमद्भगवद्गीता के निष्काम कर्मयोग के प्रबल समर्थक थे; उनका मानना था कि मनुष्य को केवल कर्म करने का अधिकार है, फल का नहीं।
भाषा-शैली: बुंदेली माटी का सोंधापन
वर्मा जी की शैली की सबसे बड़ी विशेषता उनकी तटस्थता और पात्रानुकूलता है।
बुंदेलखण्डी का पुट: उनकी भाषा में झाँसी और बुंदेलखंड की स्थानीय बोली का जो पुट मिलता है, वह उपन्यासों में गजब की प्रामाणिकता और क्षेत्रीयता (Local Flavor) भर देता है। ऐसा लगता है मानो पाठक स्वयं उस कालखंड और धरती पर खड़ा हो।
वर्णनात्मक एवं रोचक शैली: वे अपनी शैली को बहुत अधिक बोझिल या अलंकारमय नहीं बनाते, बल्कि उपयुक्त उपमाओं का सहारा लेते हैं। उनकी शैली मुख्य रूप से वर्णनात्मक है, जिसमें गजब का प्रवाह और रोचकता होती है।
चरित्र-चित्रण की कला: लेखक कभी भी पात्रों के चरित्र का विश्लेषण खुद जबरन नहीं करता। उनके पात्र घटनाओं, परिस्थितियों और आपसी संवादों (कथोपकथन) के माध्यम से अपना चरित्र स्वयं उजागर करते हैं। यही कारण है कि उनके उपन्यास पाठकों के बीच बेहद लोकप्रिय हुए।
सम्मान, उपाधियाँ और महाप्रयाण
साहित्य जगत में उनके इस अद्वितीय और विराट योगदान के लिए उन्हें देश के हर बड़े मंच से सम्मानित किया गया:
उन्हें भारत सरकार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश राज्य सरकारों के सर्वोच्च साहित्य पुरस्कारों से नवाजा गया।
‘डालमिया साहित्यकार संसद’, ‘हिन्दुस्तानी अकादमी (प्रयाग)’ और ‘नागरी प्रचारिणी सभा (काशी)’ ने उन्हें अपने सर्वोत्तम पुरस्कारों से अलंकृत किया।
उनकी अमूल्य साहित्यिक सेवाओं के सम्मान में आगरा विश्वविद्यालय ने उन्हें ‘डी. लिट.’ (D.Litt.) की मानद उपाधि से विभूषित किया।
हिंदी साहित्य में इतिहास रस की वास्तविक और प्रामाणिक अनुभूति कराने वाले इस महान शिल्पी का २३ फ़रवरी, १९६९ ई. को महाप्रयाण हो गया। वे सशरीर भले चले गए, लेकिन बुंदेलखंड के किलों और हिंदी पाठकों के दिलों में वे अपनी अमर कृतियों के माध्यम से सदैव जीवित रहेंगे।