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पापा कौन हैं? एक सुधारक, इंजीनियर या बस ‘मेरे पापा’!
लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’
पिता: एक अनसुलझी, मगर सबसे खूबसूरत पहेली
अक्सर जब मैं एकांत में बैठकर सोचता हूँ, तो एक सवाल मन के आँगन में बार-बार कौंधता है कि वास्तव में पापा कौन हैं? समाज की नज़रों से देखें तो समझ नहीं आता कि उन्हें एक कड़ा ‘सुधारक’ कहूँ, एक गंभीर ‘विचारक’ कहूँ या फिर जीवन के गूढ़ सत्यों को सहजता से जीने वाला कोई महान ‘फिलोसोफर’ (दार्शनिक) कहूँ। वे इन सब पैमानों से बहुत ऊपर हैं। हमारे लिए तो वे इन भारी-भरकम शब्दों से दूर, बस ‘पापा’ हैं—एक ऐसा नाम, जिसे पुकारते ही मन का सारा डर और सारी चिंताएं कपूर की तरह उड़ जाती हैं।
उनकी ममता का व्याकरण भी बड़ा अनूठा होता है। दोपहर की चिलचिलाती धूप में जब वे बाज़ार से आम लेकर आते हैं, और हमें अपने सामने बिठाकर भर पेट आम खिलाते हैं, तब हमारा पेट भले ही पूरी तरह भर जाए, लेकिन उनका मन नहीं भरता। वे हमेशा हमारे चेहरे को देखकर बड़े लाड़ से यही कहते हैं—”अरे! तुमने तो कुछ खाया ही नहीं, कितना कम खाया है थोड़ा और खाओ।” इस एक वाक्य में छिपा हुआ वात्सल्य दुनिया के किसी भी दर्शनशास्त्र से कहीं बड़ा है।
हर भूमिका में मुकम्मल: मोची से लेकर रसोइया तक
बचपन में हमारी हर छोटी-बड़ी ज़रूरत के पीछे पापा का ही अक्स छुपा होता था। आज सोचता हूँ तो अचरज होता है कि हमारे पापा हमारे लिए क्या-क्या नहीं बने!
स्वाद के जादूगर (कुक): माँ बीमार हो या घर में कोई उत्सव, जब पापा रसोई का मोर्चा संभालते थे, तो उनके हाथों के स्वाद के आगे बड़े-बड़े पकवान फीके पड़ जाते थे। वे हमारे लिए एक कुशल कुक (रसोइया) भी बन जाते थे।
अभावों को छुपाने वाले शिल्पी (मोची): बचपन में खेलते-कूदते जब कभी हमारे जूते या चप्पलें फट जाती थीं, तो वे तुरंत उसे फेंकने या हमें डांटने के बजाय खुद औज़ार लेकर बैठ जाते थे। टांका लगाकर उसे इस तरह चमका देते थे कि वे एक मोची की भूमिका में भी सबसे श्रेष्ठ नज़र आते थे। उनके रहते हमें कभी अपने अभावों का अहसास तक नहीं हुआ।
घर के अंतिम संबल: घर के भीतर जब भी कोई चीज़ बिगड़ती थी—चाहे वो बिजली का पंखा हो, पानी का नल हो या कोई अन्य सामान—मम्मी का हमेशा एक ही पेटेंट संवाद होता था, जो पूरे घर को आश्वस्त कर देता था—”चुप हो जाओ और आने दो पापा को, वो आएंगे तो सब ठीक कर देंगे।”
चाहे सामान हो या हम… सब ठीक करने का हुनर
मम्मी का वह भरोसा सिर्फ घर के निर्जीव सामानों तक सीमित नहीं था। घर की कोई मशीन बिगड़े या फिर हम भाई-बहनों का अनुशासन और बर्ताव बिगड़े, हम पढ़ाई से भटकें या जीवन की किसी उलझन में हों—मम्मी हमेशा पापा की ही शरण लेती थीं। और पापा के पास भी वह जादुई हुनर था कि वे बिगड़े हुए सामान को भी दुरुस्त कर देते थे और भटकते हुए हमारे जीवन और हमारे आचरण को भी अपनी सूझबूझ से सही रास्ते पर ले आते थे।
ऐसे में समझ ही नहीं आता कि पापा को किस सांचे में ढाला जाए? वे घर के बिगड़े सामान को ठीक करने वाले कोई कुशल ‘इंजीनियर’ हैं, या हमें जीवन का ककहरा और सही-गलत का भेद सिखाने वाले कोई प्रकांड ‘मास्टर’ (शिक्षक)?
अंततः… पापा मेरे पापा हैं!
अब इन सारे सवालों और कयासों को यहीं छोड़ देते हैं, इस बहस पर अब बस पूर्णविराम लगाते हैं…। सच तो यह है कि पापा को किसी एक उपाधि, किसी एक पेशे या किसी एक परिभाषा के दायरे में बांधा ही नहीं जा सकता।
सत्य तो बस इतना सा है कि पापा मेरे पापा हैं… और वे इस ब्रह्मांड में हमारे लिए सब कुछ कर सकते हैं। उनकी सामर्थ्य की कोई सीमा नहीं है और उनका साया हमारे सिर पर एक ऐसे बरगद की तरह है, जिसके रहते जीवन की कोई भी धूप हमें झुलसा नहीं सकती। वे ईश्वर का भेजा हुआ वह साक्षात वरदान हैं, जो बिना कुछ कहे हमारी पूरी दुनिया को मुकम्मल बना देते हैं।
धन्यवाद !