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सनातन वांग्मय का महाकोश: अठारह महापुराण एवं उपपुराणों का तात्विक स्वरूप

​लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’

 

​पुराण: भारतीय जीवन-धारा के प्राण

​’पुराण’ का शाब्दिक अर्थ है—’पुरातन’ या ‘प्राचीन’, परंतु इसकी प्रासंगिकता सदा नूतन रहती है। पुराण हिंदुओं के वे परम पवित्र धर्मसंबंधी ग्रंथ हैं जिनमें सृष्टि की उत्पत्ति (सर्ग), प्रलय (प्रतिसर्ग), प्राचीन ऋषियों-मुनियों, देवताओं और प्रतापी राजाओं के प्रामाणिक वंशानुचरित आदि का विशद वृत्तांत है। कालक्रम की दृष्टि से ये वैदिक काल के काफी बाद के ग्रंथ हैं, जो सनातन परंपरा के ‘स्मृति’ विभाग के अंतर्गत आते हैं।

​भारतीय जीवन-धारा को आचार, विचार और संस्कार देने में जिन ग्रंथों का सबसे महत्वपूर्ण स्थान है, उनमें पुराण भक्ति-ग्रंथों और लोक-लोकांतर के मार्गदर्शक के रूप में सर्वोपरि माने जाते हैं। वेदों के गूढ़ और जटिल ज्ञान को सर्वसाधारण के लिए सुलभ और सरस कथाओं के माध्यम से प्रस्तुत करना ही पुराणों का मुख्य उद्देश्य रहा है।

 

​पाप-पुण्य और धर्म-अधर्म की आख्यायिकाएँ

​अठारह पुराणों में अलग-अलग कालखंडों के अनुसार विभिन्न देवी-देवताओं को केंद्र मानकर पाप और पुण्य, धर्म और अधर्म, कर्म और अकर्म की अमर गाथाएँ कही गई हैं। कुछ पुराणों में सृष्टि के आरंभ से लेकर उसके महाप्रलय (अंत) तक का ऐसा सूक्ष्म विवरण मिलता है, जो आधुनिक विज्ञान को भी विस्मित करता है। इनमें हिंदू देवी-देवताओं के दिव्य स्वरूपों का और पौराणिक मिथकों का बहुत ही सुंदर, दार्शनिक और अलंकारिक वर्णन किया गया है।

 

​अठारह महापुराणों का संक्षिप्त परिचय

​महर्षि वेदव्यास द्वारा वर्गीकृत पुराणों की संख्या मुख्य रूप से अठारह (१८) मानी गई है, जिनका विवरण इस प्रकार है:

​१. ब्रह्मपुराण

​इसे पुराणों में प्रथम स्थान प्राप्त होने के कारण “आदिपुराण” भी कहा जाता है। प्राचीन काल के सभी ग्रंथों में इसका प्रामाणिक उल्लेख मिलता है। विभिन्न प्रतिलिपियों के कारण इसमें श्लोकों की संख्या अलग-अलग प्रमाणों से भिन्न-भिन्न मिलती है। इसमें मुख्य रूप से सृष्टि की रचना, मनु की उत्पत्ति, उनके वंश का इतिहास तथा देवों और समस्त प्राणियों की उत्पत्ति का वर्णन है। इसके अतिरिक्त, इस पुराण में भारतवर्ष के विभिन्न पवित्र तीर्थों का विस्तार से भौगोलिक वर्णन किया गया है।

​२. पद्मपुराण

​यह पुराण अत्यंत विशाल है। इसमें अनेक ज्ञानवर्धक विषयों के साथ-साथ मुख्य रूप से विष्णु-भक्ति के अनेक अलौकिक पक्षों पर प्रकाश डाला गया है। विद्वानों के अनुसार इसका क्रमिक विकास ५वीं शताब्दी के आसपास माना जाता है। इसके पाँच खंड जीवन के पाँच सूत्रों की व्याख्या करते हैं।

​३. विष्णुपुराण

​संस्कृत साहित्य में यह एक अत्यंत व्यवस्थित और शुद्ध पुराण माना जाता है। पुराण के जो पाँचों पारंपरिक लक्षण (सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित) होते हैं, वे इसमें पूर्णतः घटित होते हैं। इसमें भगवान विष्णु को संपूर्ण ब्रह्मांड के नियंता और परम देवता के रूप में निरूपित किया गया है।

​४. वायुपुराण

​इस पुराण में विशेष रूप से भगवान शिव की महिमा, उनके स्वरूप और रुद्र-अवतारों का विशद वर्णन किया गया है, जिसके कारण इसे कई परंपराओं में “शिवपुराण” भी कहा जाता है। ज्ञात हो कि एक ‘शिवमहापुराण’ पृथक रूप से भी उपलब्ध है। इसमें खगोल, भूगोल और प्राचीन राजवंशों का बहुत सुंदर वर्णन है।

​५. भागवतपुराण (श्रीमद्भागवत)

​यह सनातन समाज में सर्वाधिक प्रचलित और श्रद्धेय पुराण है। इस पुराण का हिंदू धर्म में आध्यात्मिक महत्व इतना अधिक है कि इसका ‘सप्ताह-वाचन-पारायण’ (भागवत कथा) आयोजित किया जाता है। इसे सभी वेदों और दर्शनों का पका हुआ अमृतमयी फल यानी “निगमकल्पतरोर्गलितम्” कहा जाता है। विद्वानों की तार्किक कसौटी और परीक्षास्थल होने के कारण इसे “विद्यावतां भागवते परीक्षा” माना जाता है। इसमें योगेश्वर श्रीकृष्ण की अनन्य भक्ति और उनके बाल-चरित्र की रसपूर्ण व्याख्या है।

​६. नारद (बृहन्नारदीय) पुराण

​देवर्षि नारद के मुख से प्रणीत होने के कारण इसे महापुराण का गौरव प्राप्त है। यद्यपि इसमें पारंपरिक पुराण के ५ लक्षण पूर्णतः घटित नहीं होते, तथापि यह ज्ञान का भंडार है। इसमें वैष्णव संप्रदाय के प्रमुख उत्सवों, व्रतों, पवित्र तिथियों और पूजा-पद्धतियों का सांगोपांग वर्णन है।

​७. मार्कण्डेयपुराण

​आकार में छोटा होने के बावजूद इसे सबसे प्राचीनतम और ऐतिहासिक पुराण माना जाता है। इसमें वैदिक काल के प्रमुख देवताओं जैसे इंद्र, अग्नि, सूर्य आदि का अत्यंत जीवंत वर्णन किया गया है। इसी पुराण का एक प्रसिद्ध भाग ‘दुर्गा सप्तशती’ (चंडी पाठ) है, जो शक्ति उपासना का मूल आधार है।

​८. अग्निपुराण

​यह पुराण भारतीय संस्कृति, विज्ञान और तत्कालीन समस्त विद्याओं का साक्षात “महाकोश” (Encyclopedia) माना जाता है। इसमें भगवान विष्णु के दशावतारों के वर्णन के अतिरिक्त शिवलिंग, माँ दुर्गा, गणेश जी, सूर्य देव की उपासना और मूर्तियों की प्राण-प्रतिष्ठा का नियम है। इसके साथ ही इसमें भूगोल, गणित, फलित-ज्योतिष, विवाह, मृत्यु-संस्कार, शकुन विद्या, वास्तु विद्या, आयुर्वेद (चिकित्सा), छंद शास्त्र, काव्य, व्याकरण और कोष निर्माण (डिक्शनरी मेकिंग) जैसे नाना व्यावहारिक विषयों का वैज्ञानिक वर्णन है।

​९. भविष्यपुराण

​जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, इस पुराण में भविष्य में घटने वाली ऐतिहासिक और सामाजिक घटनाओं का भविष्यवाणी के रूप में अद्भुत वर्णन मिलता है। इसमें मुख्यतः ब्राह्मण-धर्म, सदाचार, वर्णाश्रम-धर्म, संस्कारों की महत्ता तथा तत्कालीन समाज की बदलती प्रवृत्तियों का लेखा-जोखा है।

​१०. ब्रह्मवैवर्तपुराण

​यह एक परम पावन वैष्णव पुराण है। इस पुराण में भगवान श्रीकृष्ण के गोलोक-वास, उनके दिव्य चरित्र, राधा-कृष्ण की लीलाओं तथा सृष्टि के मूल कारणों की बहुत ही दार्शनिक और आध्यात्मिक व्याख्या की गई है।

​११. लिंगपुराण

​यह शिव-भक्ति से ओत-प्रोत पुराण है। इसमें ब्रह्मांड की उत्पत्ति के समय भगवान शिव के ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट होने का अद्भुत रहस्य बताया गया है। साथ ही, इसमें शिव के २८ ऐतिहासिक अवतारों की पावन कथाएँ और पाशुपत योग का वर्णन दिया गया है।

​१२. वराहपुराण

​इस पुराण में भगवान विष्णु के तृतीय अवतार ‘वराह-अवतार’ की कथा को केंद्र माना गया है। पाताल लोक के गहरे जल से डूबती हुई पृथ्वी का उद्धार करके, नीलवराह भगवान ने लोक-कल्याण के लिए जिस परम ज्ञान का प्रवचन किया था, वही इस पुराण का मुख्य कलेवर है।

​१३. स्कन्दपुराण

​यह महापुराण भगवान शिव और माता पार्वती के प्रतापी पुत्र स्कन्द (कार्तिकेय, सुब्रह्मण्य) के पावन नाम पर है। श्लोक संख्या की दृष्टि से यह सभी अठारह पुराणों में सबसे विशाल और बड़ा पुराण है। इसमें काशी खंड, रेवा खंड आदि के माध्यम से भारत के भूगोल और महात्म्य का अनुपम वर्णन है।

​१४. वामनपुराण

​इसमें भगवान विष्णु के पाँचवें अवतार ‘वामन-अवतार’ और राजा बलि के दिव्य प्रसंग का मुख्य रूप से वर्णन है। इस पुराण के ज्ञान को सुव्यवस्थित करने के लिए इसे चार संहिताओं में विभक्त किया गया है—(क) माहेश्वरी, (ख) भागवती, (ग) सौरी, तथा (घ) गाणेश्वरी।

​१५. कूर्मपुराण

​समुद्र मंथन के समय मंदराचल पर्वत को अपनी पीठ पर थामने वाले भगवान विष्णु के ‘कूर्म (कछुआ) अवतार’ को समर्पित यह पुराण बेहद महत्वपूर्ण है। इसमें भी वामनपुराण की भांति चार संहिताएँ मिलती हैं—(क) ब्राह्मी, (ख) भागवती, (ग) सौरा, तथा (घ) वैष्णवी।

​१६. मत्स्यपुराण

​भगवान विष्णु के प्रथम ‘मत्स्य-अवतार’ और राजा मनु के प्रलयकालीन संवाद पर आधारित यह पुराण ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत प्रामाणिक है। इसमें प्राचीन राजवंशों, विशेषकर सातवाहन वंश और कलियुग के भावी राजाओं की विस्तृत सूची दी गई है। इसका रचनाकाल लगभग तीसरी शताब्दी माना जाता है।

​१७. गरुड़पुराण

​यह एक सुप्रसिद्ध वैष्णव पुराण है, जिसमें भगवान विष्णु अपने वाहन पक्षीराज गरुड़ के संशयों का निवारण करते हैं। इसमें विष्णुपूजा, सदाचार और धर्म-कर्म के अतिरिक्त मनुष्य की मृत्यु के बाद जीवात्मा की गति, यमलोक की यात्रा और मोक्ष के रहस्यों का उद्घाटन है। इसका पूर्वखण्ड संपूर्ण विश्वकोषात्मक वैज्ञानिक ज्ञान से भरा हुआ है।

​१८. ब्रह्माण्डपुराण

​अठारह पुराणों की सूची में यह अंतिम और ब्रह्मांड के रहस्यों को समेटे हुए एक अद्भुत ग्रंथ है। इसमें संपूर्ण ब्रह्मांड के खगोल विज्ञान और भूगोल का सविस्तार वर्णन है। यह पुराण मुख्य रूप से चार पादों (भागों) में विभाजित है—(क) प्रक्रिया, (ख) अनुषङ्ग, (ग) उपोद्घात, तथा (घ) उपसंहार। इसी पुराण का एक अत्यंत पूजनीय भाग ‘अध्यात्म रामायण’ भी है।

 

​उपपुराणों की अमूल्य शृंखला

​महापुराणों के अतिरिक्त, सनातन वांग्मय में ऋषियों ने ‘उपपुराणों’ की भी रचना की, जो मुख्य पुराणों के ही पूरक ग्रंथ माने जाते हैं। इनकी संख्या भी मुख्य रूप से अठारह ही स्वीकार की गई है, जो इस प्रकार हैं:

​सनत्कुमार पुराण, नरसिंह पुराण, बृहन्कारदीय पुराण, शिवरहस्य पुराण, दुर्वासा पुराण, कपिला पुराण, वामन पुराण (उपपुराण रूप), भार्गव पुराण, वरुण पुराण, कालिका पुराण, साम्ब पुराण, नन्दि पुराण, सूर्य पुराण, पराशर पुराण, वसिष्ठ पुराण, देवी भागवत (कुछ मतों में यह महापुराण है), गणेश पुराण, और हंस पुराण।

 

१८ महापुराणों को पढ़ने का क्रम और नियम

महापुराणों को पढ़ने का कोई एक ऐसा कठोर या अनिवार्य नियम नहीं है कि आपको इसी क्रम में पढ़ना होगा, क्योंकि हर पुराण अपने आप में पूर्ण और स्वतंत्र है। परंतु, सनातन परंपरा, भाषाई सरलता और आध्यात्मिक चेतना के विकास की दृष्टि से विद्वानों ने तीन बेहतरीन क्रम सुझाए हैं।

आप अपनी रुचि और समय के अनुसार इनमें से किसी भी एक मार्ग का चयन कर सकते हैं:

१. त्रिविध गुण क्रम (सर्वश्रेष्ठ और अनुशंसित मार्ग)

हमारे शास्त्रों में अठारह पुराणों को तीन श्रेणियों—सात्त्विक, राजसिक और तामसिक—में विभाजित किया गया है। यह वर्गीकरण किसी को छोटा या बड़ा दिखाने के लिए नहीं है, बल्कि मनुष्य की मानसिक चेतना के क्रमिक विकास के लिए है। इस क्रम से पढ़ने पर बुद्धि भ्रमित नहीं होती:

प्रथम चरण (सात्त्विक पुराण – भगवान विष्णु प्रधान): सबसे पहले सात्त्विक पुराणों से शुरुआत करनी चाहिए। इनमें भक्ति, सदाचार, नीति और मर्यादा का सरल उपदेश है, जो मन को शांत और शुद्ध करता है।

क्रम: विष्णु पुराण, भागवत पुराण, नारद पुराण, गरुड़ पुराण, पद्म पुराण, वराह पुराण।

द्वितीय चरण (राजसिक पुराण – ब्रह्मा जी और सृष्टि प्रधान): जब मन स्थिर हो जाए, तब सृष्टि के निर्माण, भूगोल, खगोल और राजाओं के इतिहास को समझने के लिए राजसिक पुराण पढ़ने चाहिए।

क्रम: ब्रह्म पुराण, ब्रह्मांड पुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण, मार्कण्डेय पुराण, भविष्य पुराण, वामन पुराण।

तृतीय चरण (तामसिक/शैव पुराण – भगवान शिव और अग्नि प्रधान): तामसिक का अर्थ यहाँ अंधकार नहीं, बल्कि ‘लय’ (Disintegration) और गूढ़ तंत्र-योग से है। अंत में इन्हें पढ़ने से वैराग्य और परम ज्ञान की प्राप्ति होती है।

क्रम: शिव (वायु) पुराण, लिंग पुराण, स्कन्द पुराण, अग्नि पुराण, मत्स्य पुराण, कूर्म पुराण।

२. ऐतिहासिक और आकार का क्रम (सरल से कठिन की ओर)

यदि आप अकादमिक (Academic) या ऐतिहासिक दृष्टि से पढ़ना चाहते हैं, तो छोटे और कथा-प्रधान पुराणों से शुरू करके विशाल महाकोशों की ओर बढ़ना चाहिए:

शुरुआत (सरल और कथा-प्रधान): मार्कण्डेय पुराण (सबसे प्राचीन और छोटा) या विष्णु पुराण (सबसे सुव्यवस्थित) से शुरुआत करें। इसके बाद ब्रह्मपुराण (आदिपुराण) पढ़ें।

मध्य चरण (विशाल ज्ञान-कोश): इसके बाद अग्नि पुराण (जिसमें आयुर्वेद, ज्योतिष, व्याकरण सब कुछ है) और भागवत पुराण (गहन दर्शन) का अध्ययन करें।

अंतिम चरण (महा-ग्रंथ): अंत में स्कन्द पुराण हाथ में लेना चाहिए, क्योंकि यह श्लोकों की संख्या के लिहाज़ से सबसे विशाल है और इसे समझने के लिए पहले के पुराणों का आधार होना आवश्यक है।

३. पारंपरिक श्लोक क्रम (पारंपरिक मार्ग)

यदि आप केवल उस क्रम का पालन करना चाहते हैं जिस क्रम में महर्षि वेदव्यास जी के श्लोकों में इनका नाम आता है (मद्वयं भद्वयं चैव…), तो आप प्रामाणिक सूची के अनुसार १ से १८ तक क्रमिक रूप से पढ़ सकते हैं:

ब्रह्म, पद्म, विष्णु, वायु, भागवत, नारद, मार्कण्डेय, अग्नि, भविष्य, ब्रह्मवैवर्त, लिंग, वराह, स्कन्द, वामन, कूर्म, मत्स्य, गरुड़ और ब्रह्मांड।

अध्ययन के कुछ व्यावहारिक नियम:

शुरुआत कहाँ से करें? मेरी व्यक्तिगत संस्तुति है कि आप विष्णु पुराण या मार्कण्डेय पुराण से श्रीगणेश करें। ये दोनों आकार में मध्यम हैं और इनकी भाषा व कथा-प्रवाह अत्यंत सुगम है।

श्रीमद्भागवत कब पढ़ें? भागवत महापुराण को “निगमकल्पतरोर्गलितम् फलम्” (वेदों का पका हुआ फल) कहा गया है। इसे थोड़े अध्ययन के बाद (जैसे विष्णु पुराण पढ़ने के बाद) पढ़ना बेहतर होता है, ताकि इसके आध्यात्मिक और दार्शनिक अर्थों को गहराई से आत्मसात किया जा सके।

​यह संपूर्ण पौराणिक साहित्य भारत की वह वैचारिक और आध्यात्मिक धरोहर है, जो सदियों से समाज को सही मार्ग दिखाती आ रही है।

​धन्यवाद !

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