पर्यावरण सुरक्षा समिति, बक्सर

तस्वीरें, तालियाँ और तमतमाती धरती: बक्सर की ‘पर्यावरण सुरक्षा समिति’ और हमारे ‘रन’

​लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’

 

​सरस्वती पुस्तकालय की ‘ठंडी’ गोष्ठी और गरम भाषण

​५ जून आते ही अचानक बक्सर के ‘सरस्वती पुस्तकालय’ की सोई हुई चेतना जाग उठी। अवसर था—विश्व पर्यावरण दिवस की महान बैठक का। जिले भर के स्वघोषित बुद्धिजीवी, मठाधीश विद्वज्जन और अपनी विधा के जाने-माने नामचीन साहित्यकार इस तरह सज-धजकर पहुँचे, मानो पर्यावरण को बचाने का सारा ठेका आज ही पूरा कर लेंगे।

​विमर्श का मंच तैयार हुआ और ज्ञान की ऐसी गंगा बही कि जल संचयन, मृदा संरक्षण, दम तोड़ती नदियों की सुरक्षा से लेकर प्लास्टिक के वैश्विक दानव तक पर बारी-बारी से सबने अपनी-अपनी बेशकीमती राय का रायता फैलाया। किसी महापंडित ने छत पर ‘तुलसी’ का गमला लटकाने का क्रांतिकारी नुस्खा दिया, तो किसी दूसरे चिंतक ने घर के सामने ‘पेड़’ लगाने की ऐसी भावुक अपील की कि सुनने वालों की आँखों में आँसू आ जाएं।

​बात तो अच्छी है, होनी भी चाहिए। लेकिन इस पूरी नौटंकी के पीछे का गणित कुछ और ही था। कोई इस हरियाली के बहाने अपनी नई ‘समिति’ के गठन की जुगत में था, तो कोई इस मंच का इस्तेमाल अपनी राजनीति चमकाने के लिए कर रहा था। और इन सबके बीच, मुझ जैसा एक अदना प्राणी भी बैठा था जो न पर्यावरण से सरोकार रखता था, न राजनीति से; उसे तो बस एक अच्छी सी ‘फोटो’ खिंचवानी थी ताकि अखबार में नाम छप सके!

 

एसी (AC) की हवा में ग्लेशियर पिघलने का रोना

​गोष्ठी में पाखंड का पारा तब सातवें आसमान पर पहुँच गया, जब एक परम विद्वान वक्ता ने बंद कमरे की वातानुकूलित (AC) हवा का लुत्फ़ उठाते हुए बेहद तमतमाए स्वर में माइक संभाला। वे बोले—”भाइयों! ये एसी (AC) लगाना ही सबसे बड़ा पाप है। इससे ‘xyz’ खतरनाक गैसें निकलती हैं, जिसके कारण हमारा पूरा वातावरण गर्म हो रहा है और ध्रुवों के ग्लेशियर पिघल रहे हैं।”

​कमाल देखिए! यह गंभीर चेतावनी वे उस हॉल में बैठकर दे रहे थे, जहाँ खुद दो-दो एसी कमरे को शिमला बनाने के लिए पूरी ताक़त से कार्बन उगल रहे थे। खैर, भाषणों का कोरम पूरा हुआ। इसके बाद कुछ गमलों और ज़मीन के टुकड़ों पर ‘पौधे’ रोपे गए। खुरपी पकड़कर कैमरे के सामने मुस्कुराते हुए पोज़ दिए गए।

​पर बड़ा सवाल यह है कि यह जो पौधा आज गाड़ा गया है, यह कल सुबह पेड़ बनने तक जीवित भी रहेगा? क्या इस समिति का कोई भी सूरमा कल सुबह उठकर इसे एक लोटा पानी देने आएगा? या कोई मुड़कर इसका हाल-चाल भी लेगा? बिल्कुल नहीं! क्योंकि असली मक़सद तो पूरा हो गया—आज रचना लिखी जाएगी, मंच से पर्यावरण पर मर्मस्पर्शी कविता पढ़ी जाएगी, कल के स्थानीय अखबार में सुंदर चित्र छपेगा, नाम के आगे ‘विशिष्ट अतिथि’ लिखा जाएगा, मिठाइयाँ चलेंगी, ज़ोरदार तालियाँ गूँजेंगी… और बस! हो गया हमारा पर्यावरण सुरक्षित! बच गया मानव जीवन!

 

प्लास्टिक के ‘रन’ और कंक्रीट में दफ़न संवेदनाएँ

​अगर इस महान पर्यावरण चेतना का असली स्कोरकार्ड देखना हो, तो कल सुबह की अपनी दिनचर्या देख लीजिए। आज कसमें खाने वाले ये सभी बुद्धिजीवी कल सुबह उठेंगे, घर से कपड़े का थैला लाना भूल जाएंगे और बाज़ार में सब्जी वाले से चिल्लाकर ‘प्लास्टिक की थैली’ मांगेंगे। वह प्लास्टिक सीधा जाकर हमारे मोहल्ले की नाली को चोक करेगा—लीजिए, हमारी लापरवाही का ‘एक रन’ बन गया!

​फिर बाज़ार में प्यास लगेगी, तो हम ‘बिसलेरी’ की बोतल खरीदेंगे, पानी पिएंगे और उस खाली बोतल को पैर से मारकर सड़क पर फेंक देंगे—लीजिए, ‘दूसरा रन’ भी बन गया! आज जिस पौधे को हमने मुख्य अतिथि के हाथों बड़ी शिद्दत से ज़मीन में गड़वाया था, कल सुबह वो किसी आवारा सांड के पेट में समा जाएगा या कोई पड़ोसी उससे अपने दाँत साफ करने के लिए दातून तोड़ लेगा—और यह लग गया शानदार ‘चौका (चार रन)’!

​पाखंड की पराकाष्ठा देखिए—जिस ज़मीन में आज पौधे के लिए गड्ढा खोदा गया था, कल सुबह उसे किसी पुराने मकान के मलबे और कंक्रीट से पाट दिया जाएगा। ठीक वैसे ही, जैसे हमने कंक्रीट के आलीशान जंगलों में अपने खुद के जीवन और संवेदनाओं को दफ़ना दिया है। हमारी हरकतों से तबाही के मैच में ‘रन पर रन’ बने जा रहे हैं और हम सोए हुए हैं।

 

कचरे का पहाड़ और ‘ग्लोबल’ पाखंड का कचरा

​हमारे देश में स्वच्छता और पर्यावरण का एक ही सीधा नियम है—’अपना कचरा साफ करो और पड़ोसी के मत्थे मढ़ दो।’ आप पूछेंगे कैसे? अरे भाई! हमने बड़ी ईमानदारी से अपने घर का कूड़ा साफ किया और उसे गली के कोने पर रखे डब्बे में डाल दिया। वहां से नगर पालिका की गाड़ी आई और उसे उठाकर ले गई। हमारा घर तो साफ हो गया, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि वह गाड़ी उस कचरे को कहाँ फेंकती है? नहीं न!

​वह शहर के बाहर किसी सुदूर गाँव की सीमा पर या किसी बड़े गड्ढे में फेंक दिया जाता है, जो आज धीरे-धीरे ‘कचरे के पहाड़’ का रूप ले चुका है। जब वह पहाड़ हद से ज़्यादा बड़ा और बदबूदार हो जाएगा, तो प्रशासन कोई और नया गड्ढा ढूँढेगा, फिर कोई और जगह…। पर ये अक्ल के अंधे यह भूल जाते हैं कि धरती तो आखिर एक ही है न! ज़हर चाहे इस कोने में फेंको या उस कोने में, धीरे-धीरे उस प्रदूषित मलबे का विष पूरी धरती की रगों में और भूमिगत जल में फैलता ही जाएगा।

​विश्व के विकसित देशों में ‘कचरा प्रबंधन’ (Waste Management) पर कॉलेजों में बाकायदा डिग्रियां दी जाती हैं, इसके लिए अलग से अरबों का बजट बनता है, कचरा रीसायकल होता है, उससे बिजली और जैविक खाद बनाई जाती है। हमारी तरह वहाँ सिर्फ साल में एक दिन ‘दिवस’ का तमाशा नहीं खड़ा किया जाता, न ही मंचों से खोखले वादे किए जाते हैं और न ही कसमें खाई जाती हैं। क्योंकि जो सच में काम होता है, वो ज़मीन पर दिखता है, अखबार की कतरनों में नहीं।

​बाकी की पर्यावरण की लड़ाई और लंबे-चौड़े भाषण कल सुबह की अगली गोष्ठी के लिए उठा रखते हैं… फिलहाल तो अपने कमरे का एसी (AC) ऑन करिए, चादर तानिए और चलो सो जाते हैं!

​धन्यवाद !

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