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यह कैसा देश हमारा?

​लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’

 

​यह कैसा देश हमारा!

यह कैसा देश हमारा!

 

​क्या यह देवों की पावन भूमि है,

या महज़ नक्शे का टुकड़ा प्यारा?

क्या यहाँ बहती सचमुच गंगा है,

या यह केवल दूषित जल की धारा?

 

​तुम तो कहते थे—

कण-कण में यहाँ शंकर बसते हैं,

हर कंकर में शिव का रूप संवरता है;

फिर आज क्यों चारों तरफ—

सीमेंट और कंक्रीट का सैलाब उभरता है?

कहाँ खो गया वो अध्यात्म,

कहाँ गुम हो गया वो दर्शन सारा?

यह कैसा देश हमारा!

 

​गली-गली में आज—

ऊँचे आलीशान मंदिर बनते हैं,

मस्जिदों के मीनार सजते हैं,

नित नए गुरुद्वारे और चर्च खड़े होते हैं;

पर अफ़सोस! उसी देहली के बाहर,

भूख और ग़रीबी से लाचार,

इंसानियत के आंसू बहते हैं।

 

​कैसी विडंबना है इस नए दौर की—

कि मज़हब के नाम पर,

आज मानव ही मानव को काट रहा है,

अपनों का ख़ून बहाकर,

नफ़रत का ज़हर बांट रहा है।

इंसान की वफ़ादारी पर अब यक़ीन नहीं रहा,

इसलिए आँगन का वो मूक ‘कुत्ता’,

आज इंसान से भी ज़्यादा प्यारा बन गया है!

 

​सोचकर रूह काँप उठती है,

हृदय हाहाकार कर उठता है—

हाय! यह कैसा दौर आ गया,

यह कैसा देश हमारा!

यह कैसा देश हमारा!

 

सृजन-समीक्षा (लेखक के विचार):

​यह कविता किसी व्यवस्था का विरोध नहीं है, बल्कि यह हमारे भीतर मरती हुई मानवीय संवेदनाओं का पोस्टमार्टम है। जब तक हम पत्थरों की इमारतों को धर्म मानते रहेंगे और सामने खड़े भूखे इंसान को ठुकराते रहेंगे, तब तक हमारा देवभूमि कहलाना बेमानी है। रामराज्य केवल नारों से नहीं, बल्कि मानव से मानव के प्रेम से स्थापित होता है।

​धन्यवाद!

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