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श्रीराम का वनगमन पथ: अयोध्या से लंका तक की सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक यात्रा

​लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’

 

​प्रस्तावना: संपूर्ण भारत को एक सूत्र में बांधती यात्रा

​मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम को मिला १४ वर्ष का वनवास केवल एक राजा का निर्वासन नहीं था, बल्कि वह भारतीय समाज के पुनर्गठन का एक दैवीय अनुष्ठान था। इस वनवास काल में श्रीराम ने न केवल ऋषियों-मुनियों से शिक्षा, अस्त्र-विद्या और आत्मज्ञान ग्रहण किया, बल्कि भारत के सुदूर अंचलों में रहने वाले आदिवासी, वनवासी, भील, कोल और किरात समाज को संगठित कर उन्हें मुख्यधारा से जोड़ा। उन्होंने संपूर्ण भारतवर्ष को उत्तर से दक्षिण तक एक ही सांस्कृतिक और वैचारिक सूत्र में पिरो दिया।

​रामायण में उल्लेखित वृत्तांतों और आधुनिक अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार, यह यात्रा अयोध्या से प्रारंभ होकर रामेश्वरम तक और तत्पश्चात श्रीलंका में जाकर समाप्त हुई। जाने-माने इतिहासकार और पुरातत्त्वशास्त्री अनुसंधानकर्ता डॉ. राम अवतार ने श्रीराम और माता सीता के जीवन से जुड़े ऐसे २०० से भी अधिक स्थानों का पता लगाया है, जहां आज भी उनके रहने, रुकने और तपस्या करने के साक्ष्य विद्यमान हैं। इन स्मारकों, भित्तिचित्रों और कंदराओं की जांच वैज्ञानिक पद्धतियों से की गई है। आइए, प्रभु श्रीराम की इस पावन यात्रा के प्रमुख पड़ावों को विस्तार से समझते हैं:

 

​१. प्रथम पड़ाव: तमसा तट से श्रृंगवेरपुर (केवट प्रसंग)

​वनवास की प्रथम रात्रि प्रभु ने अयोध्या से लगभग २० किलोमीटर दूर तमसा नदी के तट पर बिताई। इसके पश्चात गोमती नदी को पार करते हुए वे प्रयागराज से लगभग २२ मील (३५.२ किमी) उत्तर-पश्चिम में स्थित ‘श्रृंगवेरपुर’ पहुंचे, जो निषादराज गुह का राज्य था। वर्तमान में इसे ‘सिंगरौर’ कहा जाता है। यहीं गंगा के तट पर ऐतिहासिक ‘केवट प्रसंग’ घटित हुआ। गंगा पार करने के बाद प्रभु जिस स्थान पर उतरे, वह वर्तमान इलाहाबाद (प्रयागराज) जिले का ‘कुरई’ नामक स्थान है, जो सिंगरौर के ठीक सामने गंगा के दूसरे तट पर स्थित है।

 

यात्रा कविता – भाग १ (मंगलाचरण एवं प्रस्थान)

त्याग अवध का वैभव सारा, चले राम जन-हित की धारा।

तमसा-तीर बिताई रजनी, संग चली सिय सुघर सुसजनी।

गंगा तट केवट को तारा, पार हुए प्रभु पतित-उधारा।

निषादराज का पाकर नेहा, बढ़े सुतीर तजकर सब गेहा॥

 

​२. द्वितीय पड़ाव: प्रयाग संगम से अलौकिक चित्रकूट

​कुरई से आगे बढ़ते हुए श्रीराम, लक्ष्मण और माता सीता के साथ भारद्वाज ऋषि के आश्रम (प्रयाग) पहुंचे। प्रयाग में गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के पावन संगम के समीप यमुना नदी को पार करके वे चित्रकूट पर्वत पहुंचे। चित्रकूट वह दिव्य भूमि है जहां प्रभु ने वनवास के शुरुआती साढ़े ग्यारह वर्ष बिताए थे। यहाँ वाल्मीकि आश्रम, मांडव्य आश्रम और भरतकूप जैसे जादुई स्थल आज भी मौजूद हैं।

​यहीं पर सतना जिले के बिरसिंहपुर क्षेत्र में अद्वितीय ‘सिद्धा पहाड़’ स्थित है, जहां हड्डियों का ढेर देखकर प्रभु श्रीराम ने पहली बार असुरों और निशाचरों के समूल नाश की प्रतिज्ञा ली थी। चित्रकूट ही वह स्थान है जहां महाराज दशरथ के देहावसान के बाद भरत अपनी चतुरंगिणी सेना के साथ प्रभु को मनाने पहुंचे थे और उनकी चरण-पादुका लेकर वापस लौटे थे।

 

​यात्रा कविता – भाग २ (चित्रकूट एवं प्रतिज्ञा)

ऋषि भारद्वाज शीश नवाए, चित्रकूट के घाट सुहाए।

भरत खड़े ले चरण-पदोटी, धन्य हुई वह पावन कुटी।

सिद्धा शैल देखि खल-रीती, लीन्ही राम असुर-क्षय प्रीती।

मुनि-रक्षण हित धनुष उठाया, धर्म-ध्वजा को गगन उड़ाया॥

 

​३. तृतीय पड़ाव: महर्षि अत्रि का आश्रम

​चित्रकूट की सीमाओं को छोड़कर भगवान राम सतना (मध्य प्रदेश) स्थित महर्षि अत्रि के आश्रम पहुंचे। महर्षि अत्रि ऋग्वेद के पंचम मंडल के द्रष्टा और परम तपस्वी थे। उनकी साध्वी पत्नी अनुसूइया ने माता सीता को पातिव्रत धर्म का उपदेश दिया और दिव्य वस्त्र-आभूषण भेंट किए। इस तपोवन में कुछ समय बिताने के बाद मंदाकिनी और गुप्त गोदावरी की कंदराओं से होते हुए प्रभु ने घने और बीहड़ जंगलों में प्रवेश किया।

 

​यात्रा कविता – भाग ३ (ऋषि-आशीर्वाद)

अत्रि-आश्रम पहुंचे राया, अनुसूइया नेह-नेह बरसाया।

सीता को दिव्य चीर सुहाए, मंत्र-शक्ति के मर्म सिखाए।

ऋषि-मुनियों के आशिष पाए, अगणित कष्ट सहज बिसराए।

गहन अरण्य की डगर सुधारी, राम चले बन मंगलकारी॥

 

४. चतुर्थ पड़ाव: दंडकारण्य का विशाल साम्राज्य

​अत्रि-आश्रम की सीमा समाप्त होते ही ‘दंडकारण्य’ का विशाल और सघन वन क्षेत्र आरंभ हो जाता है, जो आज के मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा और आंध्र प्रदेश तक फैला हुआ था। दंडक राक्षस के नाम पर इस क्षेत्र का नाम दंडकारण्य पड़ा, जिसे आज दंतेवाड़ा (छत्तीसगढ़) के नाम से जाना जाता है। छत्तीसगढ़ का कुछ हिस्सा श्रीराम के ननिहाल (दक्षिण कोशल) का था।

​इसी दंडकारण्य का एक हिस्सा आंध्र प्रदेश का ‘भद्राचलम’ शहर है, जहां गोदावरी के तट पर भद्रगिरि पर्वत पर प्रभु ने वास किया था। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इसी दंडकारण्य के आकाश में रावण और जटायु का भीषण युद्ध हुआ था और यहीं पर विश्व का एकमात्र जटायु मंदिर भी स्थित है।

 

​यात्रा कविता – भाग ४ (दंडकारण्य वास)

घोर दंडकारण्य सिधारे, असुर-भीति मुनि-कष्ट निवारे।

दंतेवाड़ा भद्र-गिरि पावन, गोदावरी तट अति मनभावन।

कोल-किरात और गोंड सँवारे, वनवासी सब प्राणन प्यारे।

युग-युग का अवसाद मिटाया, भारत का हर कोना जगाया॥

 

​५. पंचम एवं षष्ठ पड़ाव: पंचवटी वास और सर्वतीर्थ (सीता हरण)

​दंडकारण्य के मुनियों के आश्रमों में भ्रमण करते हुए प्रभु नासिक (महाराष्ट्र) में अगस्त्य मुनी के शिष्य सुतीक्ष्ण जी के परामर्श पर ‘पंचवटी’ पहुंचे। गोदावरी के तट पर पांच विशाल बरगद के पेड़ों वाले इस क्षेत्र में लक्ष्मण जी ने एक सुंदर पर्णकुटी बनाई। यहीं शूर्पणखा का नासा-कर्ण विच्छेदन, खर-दूषण का वध और मारीच का संहार हुआ।

​तत्पश्चात, रावण ने छल से माता सीता का हरण किया। नासिक से ५६ किलोमीटर दूर ताकेड गाँव में ‘सर्वतीर्थ’ नामक वह स्थान आज भी संरक्षित है, जहां सीता जी को बचाते हुए गिद्धराज जटायु ने रावण से युद्ध किया था और अपने प्राण त्यागे थे।

 

​यात्रा कविता – भाग ५ (पंचवटी एवं सीता हरण)

पंचवटी तट कुटी बनाई, शूर्पणखा की मद-मद लाई।

माया-मृग के पीछे धाए, नियति-चक्र में प्रभु उलझाए।

खल रावण सिय-हरण कराया, सर्वतीर्थ पर संकट छाया।

प्राण तजे जटायु दे साखी, राम नाम उर अंतर राखी॥

 

६. सप्तम, अष्टम एवं नवम पड़ाव: सीता की खोज, शबरी आश्रम और ऋष्यमूक पर्वत

​सीता जी की खोज में विलाप करते हुए श्रीराम और लक्ष्मण दक्षिण की ओर बढ़े। तुंगभद्रा और कावेरी नदियों के क्षेत्रों को पार करते हुए वे मतंग ऋषि के आश्रम यानी ‘पम्पा सरोवर’ पहुंचे। यहीं केरल क्षेत्र में भीलनी शबरी (श्रमणा) का आश्रम था, जहां प्रभु ने उनके प्रेम और भक्ति के वशीभूत होकर उनके जूठे बेर खाए।

​शबरी के निर्देश पर वे ऋष्यमूक पर्वत (हम्पी, कर्नाटक) पहुंचे, जहां उनकी भेंट पवनपुत्र हनुमान और वानरराज सुग्रीव से हुई। श्रीराम ने सुग्रीव की रक्षा हेतु बाली का वध किया और किष्किंधा में सुग्रीव गुफा के समीप अपनी सेना का संगठन शुरू किया।

 

​यात्रा कविता – भाग ६ (शबरी-भेंट एवं सुग्रीव-मित्री)

सिय बिन विकल अरण्य पुकारें, तरु-पक्षी से हाल निहारें।

शबरी के जूठे बेर खाए, प्रेम-भक्ति के मान बढ़ाए।

ऋष्यमूक पर संकट टारा, अंजनी-सुत ने प्रभु को निहारा।

बाली-वध कर सुग्रीव उबारा, किष्किंधा बना सैन्य का द्वारा॥

 

७. दशम, एकादश एवं द्वादश पड़ाव: कोडीकरई से रामेश्वरम और रामसेतु निर्माण

​वानर सेना को साथ लेकर प्रभु लंका विजय के लिए दक्षिण के समुद्र तट की ओर बढ़े। उन्होंने पहले अपनी सेना को ‘कोडीकरई’ (तमिलनाडु) में एकत्रित किया, किंतु वहां से लंका दूर थी। अतः वे ‘रामेश्वरम’ के शांत समुद्र तट पर पहुंचे। लंका पर चढ़ाई करने से पूर्व प्रभु ने रेत से शिवलिंग निर्मित कर महादेव की आराधना की।

​समुद्र पार करने के लिए नल और नील की तकनीकी देखरेख में पत्थरों से ‘रामसेतु’ (एडम्स ब्रिज) का निर्माण किया गया, जो रामेश्वरम द्वीप से श्रीलंका के मन्नार द्वीप तक लगभग ३० किलोमीटर (१८ मील) लंबा है। सेतु निर्माण का अंतिम बिंदु ‘धनुषकोडी’ था, जहां से लंका का भू-मार्ग सबसे निकट था।

 

​यात्रा कविता – भाग ७ (रामेश्वरम एवं सेतु-बंध)

चली कटक सागर के तीरा, कोडीकरई जुटे सब बीरा।

रामेश्वरम शिव-लिंग थापा, पूज महादेव संकट कापा।

नल-नील ने पाषाण तैराए, सिंधु-वक्ष पर सेतु बनाए।

धनुषकोडी से प्रस्थान कीन्हा, जय रघुनंदन नारा दीन्हा॥

 

​८. त्रयोदश पड़ाव: श्रीलंका की ‘नुवारा एलिया’ पर्वत शृंखला

​सेतु पार कर वानर सेना लंका की धरती पर उतरी। वाल्मीकि रामायण के अनुसार, रावण का महल मध्य श्रीलंका की ऊंची पहाड़ियों के बीच स्थित था, जिसे आज ‘नुवारा एलिया’ पहाड़ियों के रूप में जाना जाता है। यहाँ बांद्रवेला की तरफ आज भी रावण की गुफाएं, सुरंगों का भंवरजाल और अशोक वाटिका (हक्कागाला बॉटनिकल गार्डन) के पुरातात्विक अवशेष मिलते हैं, जिनकी कार्बन डेटिंग वैज्ञानिक स्तर पर रामायण काल की पुष्टि करती है। यद्यपि कुछ लोग इसे केवल आस्था मानते हैं, परंतु नासा द्वारा खींची गई रामसेतु की तस्वीरें और भू-वैज्ञानिक प्रमाण रामकथा की ऐतिहासिकता को अकाट्य सत्य सिद्ध करते हैं।

 

​यात्रा कविता – भाग ८ (लंका विजय एवं उपसंहार)

पहुंचे राम लंका के द्वारे, कोटि-कोटि खल-राक्षस मारे।

रावण का अभिमान गिराया, विभीषण को राज दिलाया।

मुक्त हुई सिय पावन सीता, धन्य हुआ वनवास का बीता।

अवधपुरी लौटे जग-स्वामी, जय-जय प्रभु अंतरयामी॥

 

सृजन-समीक्षा (लेखक के विचार):

​भगवान राम की यह वनवास यात्रा भौगोलिक दूरी तय करने से कहीं बढ़कर, भारत की अंतरात्मा को जगाने का महा-अभियान थी। अयोध्या के राजकुमार ने महलों के ऐश्वर्य को त्यागकर १४ वर्ष तक कंकड़-पत्थरों पर चलना स्वीकार किया, ताकि वे भारत के सुदूर वनों में रहने वाले अंतिम व्यक्ति को गले लगा सकें। राम की यह यात्रा सिखाती है कि जब समाज बिखर रहा हो, तो शासक को महलों में नहीं, बल्कि जनता के बीच जाकर ‘रामराज्य’ की नींव रखनी पड़ती है।

​धन्यवाद !

 

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