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वैद्यनाथ मिश्र ‘नागार्जुन’: कबीर परंपरा के आखिरी फक्कड़ और आधुनिक हिंदी कविता के प्रतिनिधि बौद्धिक

​लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’

 

​प्रस्तावना: नाम तो सुना होगा!

​”वैद्यनाथ मिश्र…”

नाम तो सुना होगा…

नहीं सुना?

जी, मैं तो कहता हूँ ज़रूर सुना होगा! ऐसा कौन साहित्य प्रेमी होगा, जिसने इनका नाम नहीं सुना होगा? और अगर आप अब भी थोड़ा चकित हैं, तो चलिए हम बतलाए देते हैं—इन्हें हिंदी साहित्य जगत् प्रेम से ‘बाबा नागार्जुन’ कहता है और मैथिली के संसार में ये ‘यात्री’ उपनाम से पूजे जाते हैं।

​यदि आपने महाकवि कालिदास को नहीं पढ़ा, तो बाबा नागार्जुन को पढ़ लीजिए। यदि आपने महाकवि विद्यापति को नहीं पढ़ा, तो कोई बात नहीं, आप नागार्जुन को पढ़ लें। इनकी लेखनी में आपको बौद्ध दर्शन की करुणा भी मिलेगी और मार्क्सवाद के वर्ग-संघर्ष का प्रचंड वेग भी। व्यावहारिक अनुगमन तथा समय-चेतना का साक्षात् संचार देखना हो, तो बाबा की कविताओं से गुज़रना अनिवार्य है।

 

​जन्म, कठिन बचपन और विस्तृत जीवनी

​बाबा वैद्यनाथ मिश्र का जन्म ३० जून, सन १९११ को उनके ननिहाल ‘सतलखा’ (मधुबनी, बिहार) में हुआ था, परंतु उनका पैतृक गाँव दरभंगा ज़िले का ‘तरौनी’ था। मिथिलांचल की इस माटी ने उन्हें अपनी भाषा और संस्कृति का अगाध ज्ञान दिया।

​उनका प्रारंभिक जीवन अत्यंत संघर्षपूर्ण और अभावों में बीता। बचपन में ही उन पर मातृशोक का पहाड़ टूट पड़ा, जिसके कारण उनके भीतर एक गहरी वैराग्य भावना और घुमक्कड़ी स्वभाव ने जन्म ले लिया। उनकी प्रारंभिक शिक्षा स्थानीय संस्कृत पाठशालाओं में हुई। बाद में वे उच्च शिक्षा के लिए वाराणसी और कलकत्ता (कोलकाता) गए, जहाँ उन्होंने संस्कृत, व्याकरण और प्राचीन साहित्यों का गहन अध्ययन किया।

​घुमक्कड़ी, बौद्ध धर्म और ‘नागार्जुन’ का जन्म:

​बाबा स्वभाव से ही ‘यायावर’ (घुमक्कड़) थे। सन १९३६ में वे लंका (श्रीलंका) चले गए, जहाँ उन्होंने ‘विद्यालंकार परिवेण’ में रहकर बौद्ध दर्शन का इतना गहरा अध्ययन किया कि सन १९३८ में उन्होंने बौद्ध धर्म की बाकायदा दीक्षा ले ली। बौद्ध बनने के बाद ही उनका नाम ‘वैद्यनाथ मिश्र’ से ‘नागार्जुन’ हुआ। वे राहुल सांकृत्यायन और भदंत आनंद कौसल्यायन जैसी प्रचंड मेधाओं के अनन्य साथी बने।

​जन-आंदोलन और जेल यात्रा:

​नागार्जुन केवल बंद कमरों में लिखने वाले कवि नहीं थे, वे सड़क के कवि थे। देश की आज्ञा पर वे हर जन-आंदोलन में कूदे। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान उन्हें जेल जाना पड़ा। आज़ादी के बाद, जब देश में आपातकाल (इमरजेंसी) लगा, तब वे लोकनायक जयप्रकाश नारायण (जेपी) के संपूर्ण क्रांति आंदोलन के अग्रणी सिपाही बने और इसके लिए उन्हें लंबे समय तक जेल की यातनाएँ भी सहनी पड़ीं। उन्होंने लिखा भी था—”गोली दागो, जेल में डालो, बदल दो इस वतन का हुलिया…”

 

​विराट भाषाई और साहित्यिक अवदान

​बाबा नागार्जुन बहुभाषाविद् थे। हिंदी, मैथिली और संस्कृत के अलावा पालि, प्राकृत, अपभ्रंश, बँगला, सिंहली और तिब्बती आदि भाषाओं पर उनका समान अधिकार था और इन भाषाओं में उन्होंने विपुल लेखन किया। उनका साहित्यिक कैनवास इतना बड़ा है कि उन्होंने:

​६ से अधिक कालजयी उपन्यास लिखे।

​एक दर्जन से अधिक विख्यात कविता संग्रह दिए।

​२ उत्कृष्ट खंडकाव्य रचे।

​२ मैथिली कविता संग्रह और १ प्रसिद्ध मैथिली उपन्यास लिखा।

​१ संस्कृत काव्य तथा संस्कृत की कई अनूदित कृतियों की रचना की।

 

​उदय प्रकाश की दृष्टि में बाबा का विराट व्यक्तित्व

​समकालीन प्रमुख हिंदी साहित्यकार उदय प्रकाश ने बाबा नागार्जुन के व्यक्तित्व-निर्माण एवं कृतित्व की व्यापक महत्ता को एक साथ संकेतित करते हुए एक ही महावाक्य में लिखा है:

​”खुद ही विचार करिये, जिस कवि ने बौद्ध दर्शन और मार्क्सवाद का गहन अध्ययन किया हो, राहुल सांकृत्यायन और आनंद कौसल्यायन जैसी प्रचंड मेधाओं का साथी रहा हो, जिसने प्राचीन भारतीय चिंतन परंपरा का ज्ञान पालि, प्राकृत, अपभ्रंश और संस्कृत जैसी भाषाओं में महारत हासिल करके प्राप्त किया हो, जिस कवि ने हिंदी, मैथिली, बंगला और संस्कृत में लगभग एक जैसा वाग्वैदग्ध्य अर्जित किया हो, अपनी मूल प्रज्ञा और संज्ञान में जो तुलसी और कबीर की महान संत परंपरा के निकटस्थ हो, जिस रचनाकार ने ‘बलचनमा’ और ‘वरुण के बेटे’ जैसे उपन्यासों के द्वारा हिंदी में आंचलिक उपन्यास लेखन की नींव रखी हो जिसके चलते हिंदी कथा साहित्य को रेणु जैसी ऐतिहासिक प्रतिभा प्राप्त हुई हो, जिस कवि ने अपने आक्रांत निजी जीवन ही नहीं बल्कि अपने समूचे दिक् और काल की, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों और व्यक्तित्व पर अपनी निर्भ्रांत कलम चलाई हो, (संस्कृत में) बीसवीं सदी के किसी आधुनिक राजनीतिक व्यक्तित्व (लेनिन) पर समूचा खण्डकाव्य रच डाला हो, जिसके हैंडलूम के सस्ते झोले में मेघदूतम् और ‘एकाॅनमिक पाॅलिटिकल वीकली’ एक साथ रखे मिलते हों, जिसकी अंग्रेजी भी किसी समकालीन हिंदी कवि या आलोचक से बेहतर ही रही हो, जिसने रजनी पाम दत्त, नेहरू, बर्तोल्त ब्रेख्ट, निराला, लूशुन से लेकर विनोबा, मोरारजी, जेपी, लोहिया, केन्याता, एलिजाबेथ, आइजन हावर आदि पर स्मरणीय और अत्यंत लोकप्रिय कविताएं लिखी हों — … बीसवीं सदी की हिंदी कविता का प्रतिनिधि बौद्धिक कवि वह है…।”

 

​उपसंहार: विश्व साहित्य का संक्षेप

​बाबा वैद्यनाथ मिश्र कहिए, मिशिर बाबा कहिए, बाबा नागार्जुन कहिए या यात्री—जो भी कहिएगा, कोई फर्क नहीं पड़ता! वे हर रूप में लोक के थे और लोक के ही रहे। यदि आप बहुत व्यस्त या आलसी पाठक हैं और ज़्यादा विश्व साहित्य नहीं पढ़ सकते, तो मेरी एक सलाह मानिए… आप सिफ़र और सिफ़र् बाबा नागार्जुन को पढ़ लीजिए। समझ लीजिएगा कि आपने पूरे विश्व का श्रेष्ठ साहित्य एक साथ पढ़ डाला है।

​धन्यवाद!

 

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