गीत: श्रद्धा का संवाद
(स्थायी)
ए पुजारी रे!
काहे को तू पूजा करत है?
ए पुजारी रे…
काहे को तू पूजा करत है?
पूजा करत का तोर भाग खुलत है?
काहे तू अकारण ही माथा रगड़त है?
ए पुजारी रे…
काहे को तू पूजा करत है?
(अंतरा १ – पुजारी का उत्तर)
पुजारी कहत…
पूजा करत मोर मन हर्षाए,
रोम-रोम में एक लागी लग जाए,
मिट जाए आपा, जब सुध बिसराए,
एही से हम पूजा करत है।
रे अभागा रे!
तनिक बुझ ले…
एही से हम पूजा करत है।
(अंतरा २ – अभागे का तर्क)
कहे अभागा—
पत्थर में काहे को शीश नवावे?
मूरत कभी न तोसे बोल पावे,
मौन खड़ा ये, का फल दे पावे?
काहे को अपना जनम गंवावे?
(अंतरा ३ – पुजारी का बोध)
पुजारी हँस के कहे—
मूरत में मैं मूरत (परमात्मा) देखूँ,
साँस-साँस में उसकी सूरत देखूँ।
बिन मांगे मैं सब कुछ पाऊं,
चरणन में जब शीश झुकाऊं।
ए अभागा रे!
तनिक सुन ले—
स्वारथ बिन जो प्रीत लगावे,
वही तो जग में ‘परम-सुख’ पावे।
एही से हम पूजा करत है।
(उपसंहार – हृदय परिवर्तन)
ए पुजारी रे!
अब जान गयली हम…
काहे को तू पूजा करत है।
ए अभागा रे!
अब से तू भी पूजा करबै रे…
ए पुजारी रे!
अब से हम भी पूजा करबै,
ए पुजारी रे!
हम भी पूजा करबै।
हम भी ओकर नाम जपबै
जय श्री राम