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सज गई मेज़ और सज गई थाली,

हवा में महक है बड़ी निराली!

आज पेट को छुट्टी दे दी हमने,

क्योंकि दावत की है तैयारी मतवाली।

 

गरम-गरम पूड़ी संग आलू की सब्ज़ी,

खाते ही जैसे खिल जाए नब्ज़-जी!

पनीर के टुकड़े कर रहे हैं इशारा,

“हमें छोड़ो मत, हम हैं सबसे प्यारा।”

 

रायते में बूंदी जैसे नाच रही हो,

चटनी भी तीखापन जाँच रही हो।

चावल की खुशबू ने ऐसा घेरा,

भूल गए हम सब सवेरा और अंधेरा।

 

गुलाब जामुन चाशनी में डूबे पड़े हैं,

जैसे मीठी नींद के मज़े ले रहे हैं।

तभी रसगुल्ला बोला— “ज़रा हमें भी चखना,

अपनी प्लेट में थोड़ी जगह बाकी रखना!”

 

हंसी के फुहारे और गप्पों का दौर,

दावत का मज़ा ही कुछ होता है और।

डाइट-वाइट की बातें कल करेंगे यार,

आज तो बस परोसिए अपना ढेर सारा प्यार!

 

पेट कह रहा— “बस करो अब भाई,”

पर जीभ बोली— “अभी तो रबड़ी नहीं आई!”

ऐसी ये दावत, ऐसी ये शान,

खुशियों से भर जाए सबका जहान।

 

 

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