कांच के पीछे की यादें: सम्पूर्ण सिंह कालरा से ‘गुलज़ार’ बनने की वो रूमानी दास्तान
”गुलज़ार साहब के मजेदार किस्सों में से अश्विनी दो-एक सुनाएगा, सुनिएगा ज़रूर मज़ा आएगा…”
कुछ लोग शब्दों को कागज़ पर लिखते हैं, और कुछ लोग शब्दों को साँस देते हैं। जब कोई कहता है कि—”मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है”—या कोई धीरे से गुनगुनाता है—”इस मोड़ से जाते हैं”—तो पृष्ठभूमि में एक सफ़ेद कड़क कुर्ते-पायजामे में लिपटी, चश्मा लगाए एक ऐसी रूहानी शख्सियत खड़ी दिखाई देती है, जिसे दुनिया ‘गुलज़ार’ कहती है। लेकिन इस गुलज़ार के पीछे ‘सम्पूर्ण सिंह कालरा’ का जो संघर्ष, आँसू और पंचम दा के साथ जो अल्हड़ यारी है, वो किसी मुकम्मल फ़िल्म की कहानी जैसी है।
झेलम का दीना गाँव, वर्ली का गैरेज और ‘बंदिनी’ का पहला गीत
गुलज़ार साहब का जन्म १८ अगस्त १९३६ को अविभाजित भारत के पंजाब (अब पाकिस्तान में) के झेलम जिले के दीना गाँव में हुआ था। नियति का क्रूर मज़ाक देखिए कि वे अपने पिता की दूसरी पत्नी की इकलौती संतान थे, और उनकी माँ उन्हें बचपन में ही छोड़कर इस दुनिया से चल बसीं। न माँ के आँचल की छाँव मिली, न पिता का पूरा दुलार। नौ भाई-बहनों में चौथे नंबर के सम्पूर्ण सिंह के हिस्से सिर्फ अकेलापन और संघर्ष आया।
बंटवारे की विभीषिका के बाद उनका परिवार अमृतसर आ गया, लेकिन सम्पूर्ण सिंह की आँखों में शब्दों की कुछ ऐसी बेताबी थी कि वे मुंबई (तब बंबई) भाग आए। पेट पालने के लिए उन्होंने मुंबई के वर्ली में एक गैरेज में बतौर मैकेनिक काम करना शुरू किया। दिनभर गाड़ियों का धुआँ और मोबिल-ऑयल झेलने वाले सम्पूर्ण सिंह जब शाम को खाली वक्त पाते, तो अपनी डायरी में कविताएँ लिखने लगते।
यहीं से उनका रास्ता फ़िल्म इंडस्ट्री की तरफ मुड़ा। वे महान निर्देशक बिमल राय, हृषिकेश मुखर्जी और हेमंत कुमार के सहायक बन गए। और फिर वो ऐतिहासिक मोड़ आया जब बिमल राय की कालजयी फ़िल्म ‘बंदिनी’ के लिए उन्होंने ‘गुलज़ार’ के नाम से अपना पहला गीत लिखा—”मोरा गोरा अंग लई ले, मोहे श्याम रंग दई दे…”। इसके बाद सम्पूर्ण सिंह हमेशा के लिए पीछे छूट गए और हिंदी सिनेमा को उसका ‘गुलज़ार’ मिल गया।
पुरस्कारों का आसमान: ऑस्कर से दादासाहब फाल्के तक
उनकी रचनाएँ मुख्यतः हिंदी, उर्दू और पंजाबी में हैं, लेकिन ब्रजभाषा, खड़ी बोली, मारवाड़ी और हरियाणवी पर भी उनकी वैसी ही पकड़ है। उनकी इस बेमिसाल प्रतिभा को दुनिया ने झुककर सलाम किया:
फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार (सर्वश्रेष्ठ गीतकार): एक या दो बार नहीं, बल्कि १० बार (१९७७, १९७९, १९८०, १९८३, १९८८, १९८८, १९९१, १९९८, २००२, २००५) उन्होंने इस ब्लैक लेडी को अपने नाम किया।
साहित्य अकादमी पुरस्कार (२००२): उनके उर्दू कविता संग्रह के लिए उन्हें अदब का यह सर्वोच्च सम्मान मिला।
पद्म भूषण (२००४): कला के क्षेत्र में अद्वितीय योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान से नवाजा।
ऑस्कर पुरस्कार (२००९): हॉलीवुड फ़िल्म ‘स्लमडॉग मिलियनेयर’ के गीत ‘जय हो’ के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ मौलिक गीत का ‘अकादमी अवार्ड’ (ऑस्कर) मिला, जिसने हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा कर दिया।
ग्रैमी पुरस्कार (२०१०): वैश्विक संगीत की दुनिया का सबसे बड़ा सम्मान भी उनके नाम रहा।
दादासाहब फाल्के सम्मान (२०१३): भारतीय सिनेमा के इस सर्वोच्च शिखर सम्मान से उन्हें विभूषित किया गया।
पंचम और गुलज़ार: ‘नशेमन’ और ज़िद के वो अल्हड़ किस्से
राहुल देव बर्मन (आर.डी. बर्मन/पंचम दा) और गुलज़ार की जोड़ी सिर्फ गीतकार और संगीतकार की नहीं थी, वे दो बदन और एक रूह थे।
किस्सा नंबर १: जब पंचम दा को हार माननी पड़ी
गुलज़ार साहब स्वयं मुस्कुराते हुए बताते हैं कि कितनी ही बार वो आर.डी. के घर नए लिरिक्स लेकर जाते, तो आर.डी. उन्हें कभी अपनी गाड़ी में तो कभी लिविंग रूम में घंटों वेट करवाते थे। एक बार जब गुलज़ार कोई नया गाना लेकर पहुँचे, तो पंचम दा काम करने के मूड में बिल्कुल नहीं थे। उन्होंने गुलज़ार को टालने की बड़ी कोशिश की। वे कभी चाय की बात करते, तो कभी सिनेमा की और कभी इधर-उधर की गप्पें मारते। लेकिन गुलज़ार भी अड़ गए थे; वे हर बार पंचम को खींचकर वापस गाने की लाइनों पर ले आते। आखिरकार, घंटों तक बचकर भागने के बाद पंचम दा को गुलज़ार की उस मीठी ज़िद के आगे हार माननी ही पड़ी।
किस्सा नंबर २: ‘नशेमन’ कहाँ पड़ता है भाई?
ऐसा ही एक मज़ेदार वाकया फ़िल्म ‘आँधी’ के सदाबहार गाने ‘इस मोड़ से जाते हैं’ की रिकॉर्डिंग के समय हुआ। इस गाने में गुलज़ार ने एक शब्द पिरोया था—‘नशेमन’ (जिसका अर्थ होता है घोंसला या आशियाना), और पंक्ति थी—“तिनकों के नशेमन तक, इस मोड़ से जाते हैं”।
आर.डी. और गुलज़ार इस गाने को रिकॉर्ड करने के बाद जब स्टूडियो में मिक्सिंग के लिए बैठे, तो पंचम दा ने शरारत भरी मुस्कान के साथ कहा, “दोस्त, गाना तो तूने बहुत शानदार लिखा है, लेकिन ये ‘नशेमन’ कहाँ पड़ता है? और ये किस मोड़ से जाते हैं, कभी मुझे भी ले चल, होकर आया जाए!” गुलज़ार साहब उनकी इस मासूम टांगखिंचाई पर न हंस सके, न गुस्सा हो सके; उन्होंने बस इतना ही कहा, “भाई, तुम चुपचाप गाना ही बनाओ, नशेमन फिर कभी चलेंगे!”
किस्सा नंबर ३: “कल को टाइम्स ऑफ इंडिया की हेडलाइन ले आएगा!”
और वो ऐतिहासिक किस्सा कैसे भूला जा सकता है, जब फ़िल्म ‘इजाज़त’ का गीत ‘मेरा कुछ सामान’ लेकर गुलज़ार, पंचम दा के पास पहुँचे। चूंकि इस गीत में कोई पारंपरिक ‘अंतरा’ या ‘मुखड़ा’ नहीं था, यह गद्य (Prose) की तरह मुक्त छंद में था, संगीत के एक्सपर्ट्स भी मानते हैं कि इसे कंपोज़ करना लगभग असंभव था।
कागज़ देखते ही पंचम दा का सिर चकरा गया और वे झुंझलाकर बोल उठे, “भाई गुलज़ार! तू तो गज़ब आदमी है। कल को तू ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की हेडलाइन उठाकर ले आएगा और कहेगा कि इस पर गाना बना दो, तो क्या मैं बना थोड़े ही दूँगा?” लेकिन यह पंचम दा की जिनियस कलाकारी ही थी कि उन्होंने उस ‘असंभव’ कविता को एक ऐसी धुन दी कि आज भी वह कानों में मिश्री घोलती है। बाद में इसी गाने के लिए आशा भोंसले जी को राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला।
निष्कर्ष: एक शाश्वत गुलज़ार
गुलज़ार साहब का जीवन हमें सिखाता है कि अगर आपके भीतर शब्दों की आग है, तो गैरेज का काला मोबिल-ऑयल भी आपकी तकदीर की स्याही को फीका नहीं कर सकता। आज वे ९० के पड़ाव को छू रहे हैं, लेकिन उनकी कलम से निकलने वाली नज़्में आज भी १८ साल के किसी आशिक की धड़कन जैसी ताज़ा हैं।
धन्यवाद!