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 अहिल्याबाई होलकर जी ने जिन खंडहरों को पुनर्जीवित किया था, उन्हें आज ‘पुनरुद्धार’ के नाम पर मलबे में तब्दील होते देखना हृदय विदारक है।

इस गंभीर विषय पर भावनाओं को शब्द देती यह कविता:

 

॥ विरासत का विलाप: काशी की व्यथा ॥

 

जहाँ काल भी झुक जाता था,

उस शाश्वत अविनाशी में,

आज बुलडोज़र गरज रहे,

शिव की प्यारी काशी में।

 

अमृतकाल की वेदी पर,

ये कैसा हवन हो रहा है?

सौंदर्यीकरण के नाम पर,

स्मृतियों का वध हो रहा है।

 

महमूद की क्रूर दृष्टि से,

जो देवस्थान बच पाए थे,

औरंगज़ेब के खंजर से भी,

जो मंदिर न घबराए थे।

 

आज ‘विकास’ के पंजे उनको,

धूल-धूसरित करते हैं,

अहिल्याबाई के संकल्पों का,

अपमान ये करते हैं।

 

मणिकर्णिका की वो गलियाँ,

जहाँ पूर्वज बसते थे,

प्राचीन शिलाओं के भीतर,

महादेव ही हँसते थे।

 

जीर्णोद्धार का अर्थ नहीं कि,

नींवों को ही ढहा दो तुम,

नई ईंट के लालच में,

इतिहास ही मिटा दो तुम।

 

विरासत सहेजी जाती है,

मलबे में नहीं डाली जाती,

संस्कृति की जड़ें कभी भी,

ऐसे नहीं उखाड़ी जातीं।

 

सुनो ओ सत्ता के स्वामी!

ये पत्थर नहीं, ये प्राण हैं,

होलकर की उस महारानी का,

ये गौरव और सम्मान है।

 

मूर्तियों के टुकड़े कहते—

“हम पर ये कैसी मार है?”

रक्षक ही जब भक्षक बन जाए,

तो फिर कहाँ गुहार है?

 

सुधारो अपनी भूल अभी,

काशी की आत्मा रोती है,

परंपरा की हत्या करके,

उन्नति कभी न होती है।

 

 यह पीड़ा केवल मेरी व्यक्तिगत नहीं, बल्कि उस हर सनातनी की है जो धर्मस्थल को केवल ‘संरचना’ नहीं, बल्कि ‘प्राण-प्रतिष्ठित चेतना’ मानता है। काशी का कण-कण शंकर है, और वहाँ के प्राचीन मंदिरों का अस्तित्व किसी भी आधुनिक सौंदर्यीकरण से कहीं ऊपर है।

 

विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’

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