गुरु ग्रंथ साहिब सिखों का पूजनीय पवित्र ग्रंथ है। इस ग्रंथ को ‘आदिग्रंथ’ के नाम से भी जाना जाता है। सिखों के लिए सर्वाधिक श्रद्धेय अमृतसर के हरमंदिर साहिब में, २७ अगस्त, १६०४ को गुरू ग्रंथ साहिब की स्थापना हुई।

इसका संपादन सिख धर्म के पांचवें गुरु श्री गुरु अर्जुन देव जी ने किया था। गुरु ग्रन्थ साहिब जी का पहला प्रकाशन १६ अगस्त, १६०४ को हरिमंदिर साहिब अमृतसर में हुआ था। दमदमा साहिब में दशमेश पिता गुरु गोविंद सिंह जी ने गुरु तेगबहादुर जी के ११६ शब्द जोड़कर इसको पूर्ण किया, इसमे कुल १४३० पृष्ठ है।

गुरुग्रन्थ साहिब में मात्र सिख गुरुओं के ही उपदेश नहीं है, वरन् ३० अन्य हिन्दू संत और अलंग धर्म के मुस्लिम भक्तों की वाणी भी सम्मिलित है। इसमे जहां जयदेवजी और परमानंदजी जैसे ब्राह्मण भक्तों की वाणी है, वहीं अन्य दिव्य आत्माओं के जैसे संत कबीर, सन्त रविदास, नामदेव जी, सैण जी, सघना जी, छीवाजी, धन्ना जी की वाणी भी सम्मिलित है। पांचों वक्त नमाज पढ़ने में विश्वास रखने वाले शेख फरीद के श्लोक भी गुरु ग्रंथ साहिब में दर्ज हैं। अपनी भाषायी अभिव्यक्ति, दार्शनिकता, संदेश की दृष्टि से गुरु ग्रन्थ साहिब अद्वितीय है। इसकी भाषा की सरलता, सुबोधता, सटीकता जहां जनमानस को आकर्षित करती है। वहीं संगीत के सुरों व 31 रागों के प्रयोग ने आत्मविषयक गूढ़ आध्यात्मिक उपदेशों को भी मधुर व सारग्राही बना दिया है।

आदिग्रंथ को कभी-कभी ‘गुरुबानी’ मात्र भी कह देते हैं, किंतु अपने भक्तों की दृष्टि में वह सदा शरीरी गुरूस्वरूप है। अत: गुरू के समान उसे स्वच्छ रेशमी वस्त्रों में वेष्टित करके चांदनी के नीचे किसी ऊँची गद्दी पर ‘पधराया’ जाता है, उसपर चंवर ढलते हैं, पुष्पादि चढ़ाते हैं, उसकी आरती उतारते हैं तथा उसके सामने नहा धोकर जाते और श्रद्धापूर्वक प्रणाम करते हैं।

“जो बोले सो निहाल सत श्री अकाल”

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