मस्ती, दर्शन और यथार्थ के चितेरे: भगवतीचरण वर्मा और आधुनिक हिंदी गद्य की वैचारिक क्रांति
”हम दीवानों की क्या हस्ती, हैं आज यहाँ कल वहाँ चले, मस्ती का आलम साथ चला, हम धूल उड़ाते जहाँ चले।”
आधुनिक काल के बदलते परिवेश में मानव को साहित्य के केंद्र में स्थापित करने वाले और ‘चित्रलेखा’ जैसी कालजयी कृति से पाप-पुण्य की परिभाषा बदलने वाले युग-प्रवर्तक उपन्यासकार भगवतीचरण वर्मा की संपूर्ण कहानी।
हिंदी साहित्य का आधुनिक काल भारत के इतिहास के बदलते हुए स्वरूप से गहराई से प्रभावित था। स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीयता की तीव्र भावना का प्रभाव तत्कालीन साहित्य में साफ दिखने लगा था। भारत में औद्योगीकरण का प्रारंभ हो रहा था, आवागमन के साधनों का विकास हुआ, और अंग्रेजी तथा पाश्चात्य शिक्षा के बढ़ते प्रभाव से भारतीय जनमानस के जीवन में बड़े बदलाव आने लगे। इस दौर की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि साहित्य में अब ईश्वर के साथ-साथ ‘मानव’ को समान महत्व दिया गया। भावना के साथ-साथ विचारों को पर्याप्त प्रधानता मिली, पद्य के साथ गद्य का भी अभूतपूर्व विकास हुआ और छापेखाने (प्रिंटिंग प्रेस) के आते ही साहित्य के संसार में एक नई वैचारिक क्रांति हुई।
यह आधुनिक हिंदी गद्य केवल हिंदी भाषी क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसकी लोकप्रियता पूरे देश के कोने-कोने में फैली। इसी स्वर्णिम कालखंड में ३० अगस्त १९०३ को उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के शफीपुर गाँव में एक ऐसे महान साहित्यकार का जन्म हुआ, जिसने अपनी विलक्षण लेखनी से साहित्य जगत को एक नई दिशा दी—वे थे पंडित भगवतीचरण वर्मा जी।
बहुआयामी जीवन: कलकत्ता से बंबई तक का सफर
वर्मा जी ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बी.ए. और एल-एल.बी. की डिग्रियां प्राप्त की थीं। प्रारंभ में उन्होंने एक प्रखर कवि के रूप में अपनी साहित्यिक यात्रा शुरू की, परंतु आगे चलकर वे एक महान कथाकार और उपन्यासकार के रूप में विख्यात हुए। उनका व्यक्तित्व किसी एक बंधे-बंधाए ढर्रे पर चलने वाला नहीं था। स्वतंत्र लेखन से पूर्व उन्होंने ‘फिल्म कॉरपोरेशन कलकत्ता’ में कार्य किया। उन्होंने ‘विचार’ नामक साप्ताहिक पत्रिका का शानदार प्रकाशन और संपादन भी किया।
इसके बाद वे मायानगरी बंबई पहुँचे, जहाँ उन्होंने फिल्मों के लिए कथा लेखन किया और साथ ही प्रसिद्ध दैनिक पत्र ‘नवजीवन’ का संपादन भी संभाला। किसी एक जगह न टिकने वाले और घुमक्कड़ मिज़ाज के वर्मा जी ने आकाशवाणी (ऑल इंडिया रेडियो) के कई केंद्रों में भी अपनी सेवाएं दीं। इसके बाद वह जादुई समय आया, जब उन्होंने इन बंधनों को छोड़कर पूरी तरह स्वतंत्र लेखन की शुरुआत की। उनके भीतर की यह बेबाकी उनके गीतों में भी दिखती थी:
”कुछ सुन लें, कुछ अपनी कह लें।
जीवन-सरिता की लहर-लहर, मिटने को बनती यहाँ प्रिये संयोग क्षणिक,
फिर क्या जाने हम कहाँ और तुम कहाँ प्रिये।
पल-भर तो साथ-साथ बह लें, कुछ सुन लें, कुछ अपनी कह लें।”
’चित्रलेखा’: पाप और पुण्य की शाश्वत दार्शनिक बहस
सन १९३४ में प्रकाशित ‘चित्रलेखा’ न केवल भगवतीचरण वर्मा को एक अद्वितीय उपन्यासकार के रूप में प्रतिष्ठा दिलाने वाला पहला उपन्यास साबित हुआ, बल्कि यह हिंदी के उन विरले उपन्यासों में भी गिना जाता है जिसकी लोकप्रियता काल की सीमा को लाँघकर आज भी अक्षुण्ण है। ‘चित्रलेखा’ की मूल कथा ‘पाप और पुण्य’ की जटिल समस्या और उसकी परिभाषा पर आधारित है।
पाप क्या है? उसका निवास कहाँ है? इन यक्ष प्रश्नों का उत्तर खोजने के लिए महाप्रभु रत्नांबर के दो शिष्य—श्वेतांक और विशालदेव—क्रमशः भोग और विलास के प्रतीक सामंत बीजगुप्त और त्याग व साधना के प्रतीक योगी कुमारगिरि की शरण में जाते हैं। जीवन के थपेड़ों और अनुभवों को देखने के बाद जब वे लौटते हैं, तो उनके निष्कर्षों पर महाप्रभु रत्नांबर की कालजयी टिप्पणी मानव स्वभाव का सबसे बड़ा सच उजागर करती है:
“संसार में पाप कुछ भी नहीं है, यह केवल मनुष्य के दृष्टिकोण की विषमता का दूसरा नाम है। हम न पाप करते हैं और न पुण्य करते हैं, हम केवल वह करते हैं जो हमें करना पड़ता है।”
इस उपन्यास की अद्वितीय लोकप्रियता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस पर भारतीय सिनेमा में दो बार (१९४१ और १९६३) बेहद सफल फिल्मों का निर्माण भी हुआ।
‘टेढ़े-मेढ़े रास्ते’ से ‘भूले-बिसरे चित्र’ तक का साहित्यिक वैभव
वर्मा जी वैचारिक रूप से बेहद सुदृढ़ थे। उनका उपन्यास ‘टेढ़े-मेढ़े रास्ते’ उनका पहला वृहद् उपन्यास था, जिसे हिंदी साहित्य के ‘प्रथम राजनीतिक उपन्यास’ का गौरव प्राप्त हुआ। मार्क्सवाद और तत्कालीन राजनीतिक विचारधाराओं पर आधारित इस उपन्यास को उन्होंने स्वयं अपनी ‘प्रथम शुद्ध बौद्धिक गद्य-रचना’ माना था।
इसके बाद, उनके एक और महान महाकाव्यात्मक उपन्यास ‘भूले-बिसरे चित्र’ के लिए उन्हें साहित्य जगत के सर्वोच्च ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। इस उपन्यास में उन्होंने तीन पीढ़ियों के माध्यम से बदलते हुए भारतीय समाज और उसके नैतिक मूल्यों का सजीव चित्रण किया था।
निष्कर्ष: पद्मभूषण और राष्ट्र का सम्मान
साहित्य के क्षेत्र में उनके इसी अप्रतिम और अतुलनीय योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान ‘पद्यभूषण’ से नवाज़ा और उन्हें देश के उच्च सदन यानी ‘राज्यसभा की मानद सदस्यता’ भी प्रदान की। ५ अक्टूबर १९८१ को यह महान साहित्यकार पंचतत्व में विलीन हो गया, परंतु उनकी रचनाओं की जीवंतता आज भी पाठकों के दिलों में वैसी ही उमंग भर देती है, जैसी उन्होंने खुद कभी लिखी थी:
“गेंदा फूला जब बागों में, सरसों फूली जब खेतों में
तब फूल उठी सहस उमंग, मेरे मुरझाये प्राणों में।”
लेखक विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’ आधुनिक हिंदी गद्य के इस अप्रतिम शिल्पी, मस्ती और दर्शन के साक्षात प्रतीक पंडित भगवतीचरण वर्मा जी के चरणों में अपना कोटि-कोटि वंदन और सादर श्रद्धांजलि निवेदिता करता है।
धन्यवाद!
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