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जली जो लकड़ियाँ बाहर, क्या भीतर कुछ खाक हुआ?

मिटा जो चेहरे का अंतर, क्या मन भी पाक हुआ?

चलो आज उस आग में अपना, थोथा ‘मैं’ जलने दें,

अहंकार की संधि तोड़कर, प्रेम की गंगा बहने दें।

 

यह लाल नहीं है शक्ति है, यह पीला केवल ज्ञान नहीं,

जब चढ़े गुलाल चेहरे पर, तो रहता कोई भान नहीं।

न राजा कोई, न रंक यहाँ, न ऊँच-नीच की खाई है,

रंगों के इस धुंधलके में, बस छिपती एक बुराई है।

 

‘बुरा न मानो’ मंत्र नहीं, यह जीवन की गहराई है,

दुख के काले रंगों में भी, सुख की एक परछाई है।

जैसे शाम ढले ये चेहरे, पानी से धुल जाते हैं,

वैसे ही सब द्वेष हमारे, करुणा में घुल जाते हैं।

 

कोरे कागज सा मन लेकर, फिर घर को अपने लौट चलें,

शून्यता के श्वेत रंग में, सप्तरंगों को समेट लें।

होली तो बस एक बहाना, खुद से खुद को पाने का,

अद्वैत के इस महाकुंभ में, एक दूजे में खो जाने का।

 

 

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