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शब्दों के सुल्तान मजरूह सुल्तानपुरी: मुशायरों की मसनद से परदे के सुनहरे गीतों तक

 

​”इक दिन बिक जाएगा, माटी के मोल। जग में रह जाएंगे, प्यारे तेरे बोल॥”

फ़िल्मी गीतों को अदब (साहित्य) की गरिमा देने वाले और हर मिज़ाज को अपनी शायरी में ढालने वाले मजरूह सुल्तानपुरी साहब की वो दास्तान, जिसने पाँच दशकों तक भारतीय सिनेमा के दिल को धड़काया।

​हिंदी सिनेमा के सुनहरे दौर में जब संगीत और शब्दों का संगम होता था, तो एक ऐसी खुशबू बिखरती थी जो दशकों बाद आज भी ताज़ा फूलों सी महसूस होती है। उनके लिखे गीतों की हर एक लाइन दिल की गहराइयों में इस कदर उतर जाती है, मानो शब्द हमें अपनी ओर खींच रहे हों। यह हकीकत है कि उनके लिखे हर गीत और शायरी के विन्यास में एक मखमली जादू था। वे कालजयी गीतकार कोई और नहीं, बल्कि मजरूह सुल्तानपुरी जी थे। उनका जन्म ०१ अक्टूबर १९१९ को उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले में हुआ था और उनका असली नाम “असरार उल हसन खान” था।

 

हकीमी का पेशा और मुशायरों की मक़बूलियत

​मजरूह साहब ने शुरुआत में यूनानी चिकित्सा की पढ़ाई की और ‘हकीम’ के रूप में काम करना शुरू किया, लेकिन उनके भीतर एक बेचैन शायर छुपा था। बात उन दिनों की है जब मजरूह साहब ने हकीमी का काम छोड़कर अपना सारा ध्यान शेरो-शायरी और मुशायरों में लगाना शुरू कर दिया। उनके शब्दों में वो कशिश थी जो सुनने वालों के दिलों को सीधे छू जाती थी। बहुत कम समय में ही वे देश के बड़े-बड़े मुशायरों की शान बन गए। उनके हुस्न और इश्क़ के शेरों पर महफ़िलें झूम उठती थीं:

“अलग बैठे थे फिर भी आँख साक़ी की पड़ी हम पर,

अगर है तिश्नगी कामिल तो पैमाने भी आएँगे।”

 

​जब कारदार का प्रस्ताव ठुकराया और जिगर मुरादाबादी ने राह दिखाई

​मजरूह साहब की जिंदगी में सबसे बड़ा मोड़ तब आया, जब मुंबई (तब बंबई) में एक बड़े मुशायरे का आयोजन हुआ। इस कार्यक्रम में मजरूह साहब ने अपनी गज़लों से समां बांध दिया। वहीं महफ़िल में हिंदी सिनेमा के मशहूर निर्माता-निर्देशक ए. आर. कारदार भी बैठे थे। मजरूह साहब की शायरी से कारदार साहब इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने तुरंत उनसे मुलाकात की और अपनी फिल्मों के लिए गीत लिखने का एक बड़ा प्रस्ताव सामने रखा।

​परंतु, मजरूह साहब ठहरे शुद्ध अदब के मतवाले; उन्होंने साफ तौर पर मना कर दिया। उस दौर में गंभीर शायर फिल्मों में लिखना अच्छा नहीं मानते थे, इसलिए उन्होंने यह सुनहरा प्रस्ताव ठुकरा दिया। जब यह बात उनके उस्ताद और प्रख्यात शायर जिगर मुरादाबादी को पता चली, तो उन्होंने मजरूह साहब को डांटा और समझाया। जिगर साहब ने कहा कि फिल्मों में लिखना कोई बुरी बात नहीं है, इसके जरिए मिलने वाले पैसे से तुम अपने परिवार को आर्थिक संबल दे सकते हो। उस्ताद की बात को शिरोधार्य कर मजरूह साहब फिल्मों में लिखने के लिए राजी हो गए।

 

​नौशाद का साथ और ‘शाहजहाँ’ से शुरू हुआ सुनहरी सफर

​मुंबई की मायानगरी में कदम रखने के बाद उनकी मुलाकात महान संगीतकार नौशाद अली से हुई। नौशाद साहब ने इस नए शायर की परीक्षा लेने के लिए एक धुन सुनाई और उस पर शब्द पिरोने को कहा। मजरूह साहब ने बिना देर किए उस धुन पर अद्भुत पंक्तियाँ लिख दीं:

​”गेसू बिखराए, बादल आए झूम के…”

​इन जादुई बोलों को सुनकर नौशाद मंत्रमुग्ध हो गए और उन्होंने अपनी आने वाली बड़ी फिल्म ‘शाहजहाँ’ (१९४६) के लिए मजरूह साहब को मुख्य गीतकार के रूप में अनुबंधित कर लिया। इसी फिल्म में उन्होंने कुंदन लाल सहगल की आवाज़ में “जब दिल ही टूट गया” जैसा अमर गीत लिखा। यहीं से मजरूह सुल्तानपुरी और संगीतकार नौशाद की एक ऐतिहासिक जोड़ी बन गई, जिसने लगातार एक के बाद एक कई फिल्मों में सुपरहिट और अमर गीत दिए।

 

रूमानी नग्मों से लेकर फलसफे तक का जादू

​मजरूह साहब के लेखन का दायरा बेहद वसी (व्यापक) था। जहाँ एक तरफ उन्होंने देव आनंद की फिल्म ‘सी.आई.डी.’ के लिए चुलबुला और रूमानी गीत लिखा:

​”लेके पहला पहला प्यार, भरके आँखों में खुमार,

जादू नगरी से आया है कोई जादूगर…”

​वहीं दूसरी तरफ ‘चलती का नाम गाड़ी’ में “छोड़ दो आंचल ज़माना क्या कहेगा” और फिल्म ‘सोलवां साल’ में “है अपना दिल तो आवारा, न जाने किसपे आएगा” जैसी शोखियाँ बिखेरीं। लेकिन जब बात जिंदगी के गहरे फलसफे की आई, तो उन्होंने फिल्म ‘तीसरी कसम’ में राजकपूर के लिए वो अमर पंक्तियाँ भी लिखीं जो आज भी दुनिया का सबसे बड़ा सच हैं—“इक दिन बिक जाएगा माटी के मोल, जग में रह जाएंगे प्यारे तेरे बोल…”

 

​निष्कर्ष: गीतों के अमर जादूगर को सलाम

​मजरूह सुल्तानपुरी साहब ने लगभग ५ दशकों के अपने फिल्मी सफर में हर पीढ़ी के संगीतकारों (नौशाद, एस.डी. बर्मन, आर.डी. बर्मन से लेकर जतिन-ललित) के साथ काम किया और हर दौर में प्रासंगिक रहे। २४ मई २००० को भले ही यह महान शायर इस दुनिया से विदा हो गया, लेकिन उनके लिखे बोल आज भी फिज़ाओं में गूँजते हैं।

​लेखक विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’ हिंदी गीतों की रूह, शब्दों के बेताज बादशाह और अदब के गौरव मजरूह सुल्तानपुरी साहब की पावन स्मृतियों को सादर नमन और भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है।

​धन्यवाद!

 

 

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