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वैचारिक भटकाव बनाम असली बाबासाहेब: डॉ. आंबेडकर के नाम पर ‘नया तमाशा’

 

​आज हमारे समाज में डॉ. भीमराव आंबेडकर जी के पावन नाम पर एक नया और खतरनाक वैचारिक नाटक प्रचलित किया जा रहा है। इस छद्म एजेंडे का एकमात्र उद्देश्य बाबासाहेब के नाम की आड़ लेकर अपरिपक्व और भावुक युवाओं को भड़काना तथा देश में वैमनस्य फैलाना है। विडंबना देखिए कि आज खुद को ‘अंबेडकरवादी’ कहने वाले इन तत्वों की मान्यताएं, स्वयं डॉ. आंबेडकर के जीवन-मूल्यों और विचारों के सर्वथा विपरीत हैं।

​आइए, बाबासाहेब के वास्तविक दर्शन और आज के इस छद्म ‘अंबेडकरवाद’ के १० महा-अंतर्विरोधों को आईने के सामने रखकर देखते हैं:

​सत्य बनाम पाखंड: ११ बड़े अंतर्विरोध

 

​१. भारत के मूल निवासी और आर्य सिद्धांत

​प्रकाण्ड विद्वान डॉ. आंबेडकर: बाबासाहेब का स्पष्ट मत था कि आर्य लोग बाहर से नहीं आए थे। ‘आर्यन इन्वेजन थ्योरी’ (आर्य आक्रमण का सिद्धांत) पश्चिमी और औपनिवेशिक लेखकों की कोरी कल्पना मात्र है।

​आज के अंबेडकरवादी: इनका नैरेटिव इसके ठीक उलट है। ये प्रचारित करते हैं कि दलित ही भारत के मूल निवासी हैं और ‘ब्राह्मण आर्यों’ ने उन्हें हराकर इस देश पर कब्जा किया। इनके अनुसार सभी ब्राह्मण विदेशी आर्य हैं और सभी दलित अनार्य हैं, जो पूरी तरह समाज को बांटने की साजिश है।

 

​२. इस्लाम और विभाजन का यथार्थ

​दूरद्रष्टा डॉ. आंबेडकर: बाबासाहेब का मानना था कि व्यावहारिक रूप से इस्लाम समभाव और भ्रातृभाव का संदेश देने में सक्षम नहीं है। इसीलिए १९४७ में जब पाकिस्तान का निर्माण हुआ, तो उन्होंने साफ कहा था कि सभी दलित भाइयों को पाकिस्तान छोड़कर भारत आ जाना चाहिए। इतिहास गवाह है कि जोगेंद्रनाथ मंडल जैसे नेताओं को बाद में वहां से प्रताड़ित होकर लौटना पड़ा।

​आज के अंबेडकरवादी: ये तत्व दिन-रात इस्लाम की झूठी एकता और भाईचारे का गुणगान करते हैं। ये खुलेआम कहते हैं कि हमें इस्लाम स्वीकार करने में कोई गुरेज नहीं है, भले ही इसके लिए बाबासाहेब की चेतावनियों को दफन करना पड़े।

 

​३. ईसाई मिशनरियों का धर्मांतरण चक्रव्यूह

​नैतिकता के प्रतीक डॉ. आंबेडकर: बाबासाहेब ने साफ शब्दों में कहा था कि ईसाई समाज धन, मुफ्त शिक्षा, नौकरी और चिकित्सा सुविधाओं के लालच के बल पर दरिद्र, अशक्त और पीड़ित हिंदुओं का छल से धर्म परिवर्तन कराता है, जो कि पूरी तरह अनैतिक और गलत है।

​आज के अंबेडकरवादी: इनका नारा है—”बाप बड़ा न भैया, सबसे बड़ा रुपया!” ये मिशनरियों की इस कुटिल नीति का कभी विरोध नहीं करते, बल्कि परोक्ष रूप से लोगों को उकसाते हैं कि धन लो और ईसाई बन जाओ।

 

​४. राष्ट्रवाद की कसौटी

​राष्ट्रभक्त डॉ. आंबेडकर: बाबासाहेब के लिए राष्ट्रवाद सबसे ऊपर था और रहेगा। उनका संकल्प था कि राष्ट्र से बढ़कर कुछ भी नहीं।

​आज के अंबेडकरवादी: ये तत्व देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में भारत की बर्बादी का नारा लगाने वाले टुकड़े-टुकड़े गैंग के साथ खड़े नजर आते हैं। इनके लिए स्वहित और तुष्टीकरण पहले है, राष्ट्रवाद बाद में।

 

​५. संविधान की मर्यादा और आतंकवाद का समर्थन

​संविधान निर्माता डॉ. आंबेडकर: बाबासाहेब का मानना था कि हमारे द्वारा निर्मित इस पावन संविधान का सम्मान करना और उसकी मर्यादाओं का पालन करना हर भारतीय का सर्वोच्च नैतिक कर्त्तव्य है।

​आज के अंबेडकरवादी: ये सुविधावादी लोग हैं। जहाँ काम निकले, वहाँ वैसा पैंतरा बदलते हैं। ये एक तरफ संविधान की दुहाई देते हैं, तो दूसरी तरफ संविधान विरोधी इस्लामिक फतवों का समर्थन करते हैं। इतना ही नहीं, देश के उच्चतम न्यायालय और संविधान के आधार पर फांसी चढ़ाए गए आतंकी अफजल गुरु और याकूब मेमन की फांसी का विरोध करने देश-विरोधी ताकतों के साथ खड़े हो जाते हैं।

 

​६. विदेशी ताकतों का प्रलोभन और एनजीओ (NGO) का धंधा

​स्वाभिमानी डॉ. आंबेडकर: बाबासाहेब ने स्पष्ट कहा था कि देश को तोड़ने वाली विदेशी ताकतों के हाथ की कठपुतली बनना घोर पाप है। अपने जीवन में अनेक प्रलोभन मिलने के बाद भी उन्होंने कभी राष्ट्रहित से समझौता नहीं किया।

​आज के अंबेडकरवादी: इनके लिए वैचारिक दुकानदारी पहले है और देश बाद में। आज कई तथाकथित संगठनों और एनजीओ का धंधा ही विदेशी फंडिंग के बल पर चल रहा है। बाहर से पैसे लो और देश की कानून-व्यवस्था को पंगु बनाओ, यही इनका छुपा हुआ एजेंडा है।

 

​७. भारतीय सेना का सम्मान बनाम आतंकवाद का महिमामंडन

​क्रांतिकारियों के प्रशंसक डॉ. आंबेडकर: बाबासाहेब का मत था कि देश की आजादी के लिए सर्वस्व न्योछावर करने वाले क्रांतिकारियों और सीमाओं पर प्राण देने वाले वीर सैनिकों का सर्वोच्च सम्मान होना चाहिए।

​आज के अंबेडकरवादी: ये भारतीय सेना पर पत्थर और गोलियां चलाने वाले, पाकिस्तान समर्थित कश्मीरी आतंकवादियों के हक में ‘जिंदाबाद’ के नारे लगाते हैं। इनके नैरेटिव के अनुसार असली सिपाही सेना नहीं, बल्कि वे आतंकी हैं, और भारतीय सेना ने कश्मीर पर नाजायज कब्जा किया हुआ है।

 

​८. ‘वंदे मातरम’ और ‘भारत माता की जय’ से गुरेज

​सांस्कृतिक गौरव के संवाहक डॉ. आंबेडकर: बाबासाहेब ‘वंदे मातरम’ और ‘भारत माता की जय’ जैसे राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत नारों का पूर्ण समर्थन करते थे।

​आज के अंबेडकरवादी: इन्हें ‘जय अम्मी’ या ‘जय भीम’ का नारा लगाने में कोई परहेज नहीं है, लेकिन ‘भारत माता की जय’ और ‘वंदे मातरम’ कहने में इनके पेट में दर्द होने लगता है; क्योंकि ये केवल अपनी राजनीतिक सहूलियत की जमीन तलाशते हैं।

 

​९. राष्ट्र निर्माण में सहयोग बनाम संकीर्णता

​समावेशी डॉ. आंबेडकर: बाबासाहेब का मानना था कि देश की उन्नति के लिए और समाज के कल्याण के लिए किसी भी वर्ग या दल के साथ मिलकर सकारात्मक कार्य करना गलत नहीं है।

​आज के अंबेडकरवादी: ये एक खास चश्मा पहनकर घूमते हैं। ये केवल नास्तिकों, चरमपंथियों और मिशनरियों का अंध-समर्थन करेंगे, क्योंकि इनके नैरेटिव के अनुसार बाकी पूरा भारत ‘ब्राह्मणवादी’ और ‘मनुवादी’ है।

 

​१०. पुरुषार्थ बनाम अंध-विरोध की राजनीति

​कर्मयोगी डॉ. आंबेडकर: बाबासाहेब का संदेश था—”जीवन में आगे बढ़ने के लिए पुरुषार्थ करो, सकारात्मक कार्य करो। सदाचारी, संयमी, शुद्ध आचरण वाला और प्रगतिशील बनो।”

​आज के अंबेडकरवादी: ये केवल अंध-विरोध का एजेंडा चलाना जानते हैं। बात अच्छी हो या बुरी, सरकार की नीति देशहित में हो या न हो, इन्हें सिर्फ चिल्ला-चिल्लाकर हंगामा खड़ा करना है। हक की बात तो चौबीसों घंटे करेंगे, लेकिन राष्ट्र निर्माण के कर्तव्य के नाम पर शून्य रहेंगे।

 

​११. बुद्ध का संदेश और वैचारिक हिंसा

​अहिंसा के उपासक डॉ. आंबेडकर: बाबासाहेब ने तथागत बुद्ध के करुणा और अहिंसा के संदेश को आत्मसात किया था। वे मांस भक्षण के सर्वथा विरोधी थे।

​आज के अंबेडकरवादी: गले में बुद्ध की अहिंसा का तमगा लटकाकर ये तत्व चौबीसों घंटे वैचारिक हिंसा, घृणा और प्रदूषण फैलाते हैं। बीफ पार्टियां (गोमांस भक्षण) करना ये अपना मौलिक अधिकार बताते हैं और खुलेआम कहते हैं कि गोमांस खाने से हम अल्पसंख्यकों के मित्र बन जाएंगे। क्या बाबासाहेब ने इसी घृणा की शिक्षा दी थी?

 

​वामपंथ (कम्युनिज्म) के धुर विरोधी थे बाबासाहेब

​आज की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जो वामपंथी (कम्युनिस्ट) देश को तोड़ने की साजिश रचते हैं, वे खुद को बाबासाहेब का हितैषी दिखाते हैं। जबकि सच यह है कि बाबासाहेब आंबेडकर ने वामपंथियों से देश को होने वाले खतरे के मद्देनजर उनके प्रति अपनी कड़ी नापसंदगी और घोर विरोध को हमेशा खुलकर प्रकट किया।

​गठबंधन से साफ इनकार: अपने राजनीतिक दल “शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन” के घोषणापत्र में बाबासाहेब ने स्पष्ट शब्दों में लिखा था:

​”मैं कम्युनिस्टों के साथ कोई गठबंधन नहीं करूंगा, क्योंकि कम्युनिस्ट व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संसदीय लोकतंत्र को नष्ट कर देश में तानाशाही स्थापित करना चाहते हैं।” पीटीआई (PTI) को दिए एक साक्षात्कार में भी उन्होंने कम्युनिज्म में अपने इसी अविश्वास को दोहराया था।

​संविधान सभा में कम्युनिस्टों को बेनकाब करना: कम्युनिस्टों की कुत्सित मंशा को भांपते हुए संविधान सभा में बाबासाहेब ने कहा था कि कम्युनिस्ट, संविधान में असीमित मौलिक अधिकार केवल इसलिए चाहते हैं ताकि सत्ता से बाहर होने पर वे न सिर्फ सरकार की आलोचना कर सकें, बल्कि देश में तख्तापलट भी कर सकें।

​मजदूरों के शोषक: मैसूर जिला सम्मेलन में बाबासाहेब ने स्वयं को कम्युनिस्टों का ‘पक्का दुश्मन’ घोषित किया था और कहा था कि कम्युनिस्ट अपने राजनीतिक लाभ के लिए गरीब मजदूरों का केवल शोषण करते हैं।

​चुनावी भ्रष्टाचार और प्रोपेगैंडा: कम्युनिस्ट नेता डांगे ने जब जनता से बाबासाहेब को वोट न देने की अपील की, तब चुनावी भ्रष्टाचार के खिलाफ दायर अपनी याचिका में बाबासाहेब ने डांगे को आड़े हाथों लेते हुए कहा था कि ये लोग कानून को ताक पर रखकर सिर्फ प्रोपेगैंडा और भ्रष्टाचार में लीन रहते हैं।

​अध्यात्म विहीन विचारधारा: बौद्ध धर्म के प्रति कम्युनिस्टों की घृणा पर अपनी कड़ी नाराजगी जताते हुए बाबासाहेब ने लिखा था:

​”कम्युनिज्म एक मोटे सूअर और एक संवेदनशील इंसान के बीच का फर्क भी नहीं समझता। वह यह नहीं समझ सकता कि इंसान के लिए भौतिक समृद्धि के साथ-साथ आंतरिक अध्यात्म भी उतना ही आवश्यक है।” कम्युनिस्टों द्वारा इतिहास में की गई राजनीतिक हत्याओं पर सवाल उठाते हुए उन्होंने पूछा था कि क्या इनके लिए इंसानी जान की कोई कीमत नहीं होती?

 

​निष्कर्ष: जागने का समय आ गया है

​आज देश में चल रही वामपंथियों और छद्म विचारकों की राष्ट्र-विरोधी हरकतें बाबासाहेब द्वारा दशकों पहले व्यक्त की गई आशंकाओं को अक्षरशः सच सिद्ध कर रही हैं। हमारे दलित और वंचित भाइयों को बाबासाहेब द्वारा घोषित इस ‘कम्युनिस्ट रूपी खतरे’ को समय रहते समझना होगा। यह पहचानना होगा कि ये वामपंथी केवल अपनी डूबती हुई राजनीतिक नैया को पार लगाने के लिए बाबासाहेब के नाम का इस्तेमाल एक ‘ढाल’ की तरह कर रहे हैं।

​यदि किसी को मेरी इन बातों पर विश्वास न हो, तो वे स्वयं डॉ. आंबेडकर प्रतिष्ठान द्वारा प्रकाशित ‘बाबासाहेब आंबेडकर संपूर्ण वांग्मय’ पढ़ सकते हैं। इसके २१ खंड हैं, और ये सभी खंड संदर्भ के लिए मेरे निजी पुस्तकालय में मौजूद हैं।

​आइए, महामानव, प्रखर राष्ट्रभक्त, अद्वितीय विद्वान और संविधान निर्माता बाबासाहेब को उनकी पावन स्मृति पर शत-शत नमन करें और उनके नाम पर चल रहे इस वैचारिक पाखंड को पूरी तरह से नकार दें।

​धन्यवाद !

 

 

 

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