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किसानी

लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’

 

​आइए, आइए…

आज हम लज़ीज़ व्यंजन बनाते हैं,

पहले एक सूखा खेत लेते हैं…

बदन पर फटा गमछा या लुंगी लपेट लेते हैं,

और मेड़ पर बैठ ऊपर देखते हैं…

मिन्नत करते हैं…

और फिर नीचे देखते हैं।

नम आँखों के साथ लिए..

खेत के चारों ओर चक्कर लगाते हैं,

और फिर सोचते हैं…

 

​काम कहाँ से शुरू करूँ?

 

​हैरान, परेशान…

सरकार की भाँति,

क्या कुदरत भी बेईमान?

चलो कोई नई बात नहीं है…

शुरू करो अंताक्षरी…

ले के हरी का नाम,

समय ना बीत जाए..

करते हैं कुछ काम।

 

​पानी चलाते हैं…

गर पास हो मशीन,

वरना भाड़े पर पानी लो कीन।

 

​व्यंजन के खातिर तेल तो लगेगा न..

 

​कर लो तेल (डीज़ल) की व्यवस्था,

हो कितना भी महँगा चाहे हो सस्ता।

 

​कैसे होगी जुताई,

बीज कहाँ से,

खाद कहाँ से,

कीटनाशक और पानी कहाँ से आई?

 

​कर्ज़ ले लूँ या बीवी के गहने बेचूँ,

एक टुकड़ा या पूरा खेत ही बेचूँ,

मैं बैठे-बैठे यही सोचूँ।

 

​जैसे-तैसे कर ली खेती…

 

​अब इंतज़ार करते हैं,

क्योंकि इस व्यंजन को बनने में

चार-पाँच माह जो लगते हैं।

 

​पानी की व्यवस्था करते हैं,

वरना व्यंजन जल जाएगा,

खाद चाहिए,

कीटनाशक भी चाहिए,

नहीं तो, वैसा स्वाद नहीं आएगा।

 

​मेहरबान, क़दरदान…

लीजिए व्यंजन तैयार है,

तो बनिया भी तैयार है,

खाने वाले भी तैयार हैं,

सरकार भी तैयार,

और नेता जी भी तैयार हैं।

 

​बस बनाने वाला लाचार है॥

 

​महलों में पेश है,

होटलों में पेश है।

 

​पेट भरा तो स्वाद गायब,

व्यंजन खत्म तो महफ़िल गायब।

 

​पतीला (खेत) खाली हो के रोता है,

उसका बेटा काहे भूखे पेट सोता है?

 

​आज एक बात समझ आई है,

गइया काहे चिल्लाई है।

किसी के बचवा का हिस्सा,

जब कोई खाता है,

गइया की भाँति वो भी चिल्लाता है।

 

​आज बचवा फिर से ऊपर देखता है…

 

​यही कहानी फिर से शुरू होगी,

महफ़िल फिर से जमेगी।

 

​मगर!! किसान की..

नो-नो, नो-एंट्री॥

 

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1 thought on “किसानी: अन्न के लज़ीज़ व्यंजन को उगाने वाले लाचार किसान पर अश्विनी राय ‘अरुण’ की मर्मस्पर्शी कविता

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