२५ नवंबर २०१८: एक ही तिथि, दो राज्य और एक लेखक की दोहरी महा-विजय!
जीवन में कुछ तारीखें केवल कैलेंडर का पन्ना नहीं होतीं, बल्कि वे आपके भाग्य-पटल पर सुनहरे अक्षरों में लिख दी जाती हैं। मेरे जीवन में २५ नवंबर २०१८ की तिथि कुछ ऐसी ही कालजयी सौगात लेकर आई। यह वह दिन था जिसने मेरे साहित्यिक श्रम को राष्ट्रीय फलक पर एक साथ दो महा-उत्सवों के माध्यम से गौरवान्वित किया।
नियति का खेल देखिए, एक ही दिन और एक ही समय पर दो ऐसे बड़े आयोजन निर्धारित थे कि जहाँ एक तरफ हृदय में अगाध हर्ष था, वहीं दूसरी तरफ दोनों स्थानों पर एक साथ उपस्थित न हो पाने का एक कसमसाता हुआ मलाल भी था। परंतु, कुल मिलाकर वह दिन मेरे जीवन की सबसे सुंदर झांकी बन गया।
उस ऐतिहासिक दिन की दो महत्वपूर्ण खबरें, जो सदैव मेरे स्मृतिकोष में जीवंत रहेंगी, वे इस प्रकार हैं:
पहली खबर: बक्सर के ऐतिहासिक किले में ‘शताब्दी विमोचन’
जैसा कि पिछले संस्मरण में तय हुआ था, ‘बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन, पटना’ के शताब्दी वर्ष के गौरवशाली उपलक्ष्य में प्रांतीय राजाज्ञा के अनुसार बक्सर में एक भव्य आयोजन सुनिश्चित हुआ।
आयोजक: बक्सर जिला हिंदी साहित्य सम्मेलन।
अवसर: सम्मेलन का शताब्दी वर्ष एवं मेरी मौलिक कृति ‘बिहार: एक आईने की नज़र से’ का भव्य लोकार्पण समारोह।
कार्यक्रम स्थल: रेडक्रॉस सोसाइटी सभागार (बक्सर किला), बक्सर।
बक्सर किले के उस ऐतिहासिक प्रांगण में, मनीषियों और साहित्यानुरागियों की गरिमामयी उपस्थिति के बीच जब मेरी पुस्तक का विमोचन हुआ, तो वह क्षण मेरी लेखनी के लिए एक परम संतोष का क्षण था। ‘बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन’ की नवनियुक्त जिला कार्यकारिणी के सदस्य के रूप में इस शताब्दी आयोजन को संपन्न कराना मेरे लिए किसी सायुज्य मुक्ति जैसा था।
दूसरी खबर: कोलकाता के ‘द सर्कल क्लब’ में राष्ट्रीय सम्मान
एक तरफ बक्सर में विमोचन की तालियाँ गूंज रही थीं, तो ठीक उसी समय सीमा पार पश्चिम बंगाल की सांस्कृतिक राजधानी कोलकाता में मेरी इसी कृति का डंका बज रहा था।
अवसर: ‘The Indian Awaz’ द्वारा आयोजित देश के प्रतिष्ठित “100 Inspiring Authors of India” (भारत के १०० प्रेरणादायक लेखक) समारोह।
पुरस्कार: मेरी पुस्तक ‘बिहार: एक आईने की नज़र से’ को राष्ट्रीय स्तर पर विजेता घोषित करते हुए मुझे इस प्रतिष्ठित अवार्ड से सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम स्थल: #TheCircleClub (द सर्कल क्लब), कोलकाता।
संतोष और आत्मीयता का अनूठा संगम
जहाँ एक ओर एक ही समय पर दो महान सम्मान मिलने की असीम खुशी थी, वहीं साक्षात कोलकाता न पहुँच पाने का एक सूक्ष्म मलाल भी मन के किसी कोने में था। परंतु, ईश्वर जब कोई मार्ग बनाता है, तो वह संबंधों की मिठास भी उसमें घोल देता है।
मुझे इस बात का परम संतोष और गौरव है कि कोलकाता के उस भव्य मंच पर जब ‘अश्विनी राय’ का नाम पुकारा गया, तो मेरे स्थान पर उस सम्मान को ग्रहण करने का सौभाग्य मेरे आदरणीय बहनोई श्री धर्मेंद्र ठाकुर जी को प्राप्त हुआ। उन्होंने न केवल वहाँ उपस्थित होकर मेरा प्रतिनिधित्व किया, बल्कि उस गौरवमयी क्षण के साक्षी बनते हुए अवार्ड की दो बेहद खूबसूरत तस्वीरें भी भेजीं। उन तस्वीरों को देखकर बक्सर में बैठे-बैठे ही मेरा रोम-रोम पुलकित हो उठा।
एक लेखक के रूप में मैं हैरान भी था और विस्मित भी। मन बार-बार यही कह रहा था—हे विधाता! बक्सर की गलियों में भटके उस राही को आपने एक ही दिन में इतना कुछ दे दिया! यह सम्मान मेरा नहीं, बल्कि मेरी मातृभूमि और मां भारती के चरणों में समर्पित मेरी लेखनी का सम्मान था।
अश्विनी राय ‘अरूण’
मांगोडेहरी, बक्सर, बिहार


