अंगारक विनायकी चतुर्थी: विघ्नहर्ता श्रीगणेश की आराधना का परम पावन संयोग
सभी आस्थाओं के साथ हम जुड़कर अपनी आस्था को दरकिनार तो नहीं कर सकते ना…
इसी अटूट विश्वास और सनातन निष्ठा के साथ, आज की यह पावन भेंट मेरी तरफ से आप सभी मंगल-प्रेमियों के लिए प्रस्तुत है।
हमारे पूज्य धर्म ग्रंथों और शास्त्रों के अनुसार, प्रत्येक महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को बुद्धि और समृद्धि के दाता, भगवान श्रीगणेश को प्रसन्न करने के लिए ‘विनायकी चतुर्थी’ का व्रत व पूजन किया जाता है। शास्त्रों में विधान है कि यदि यह विनायकी चतुर्थी का पावन व्रत मंगलवार के दिन पड़ता है, तो इसे अत्यंत दुर्लभ और फलदायी ‘अंगारक विनायकी चतुर्थी’ कहा जाता है। इस दिन की गई साधना से कुंडली के मंगल दोषों का निवारण होता है और संकटों से मुक्ति मिलती है।
पूजन विधान और महामंत्र
इस पावन तिथि पर प्रात:काल सूर्योदय से पूर्व उठकर, स्नानादि से निवृत्त होकर पवित्र मन से विघ्नहर्ता भगवान गणेश का षोडशोपचार पूजन करना चाहिए। श्रीगणेश को शमी के पत्र अत्यंत प्रिय हैं। उन्हें शमी दल अर्पित करते हुए इस परम कल्याणकारी मंत्र का श्रद्धापूर्वक उच्चारण करें:
त्वत्प्रियाणि सुपुष्पाणि कोमलानि शुभानि वै।
शमी दलानि हेरम्ब गृहाण गणनायक।।
(अर्थात्: हे हेरम्ब! हे गणनायक! आपको अत्यंत प्रिय, कोमल और अत्यंत शुभ सुंदर पुष्प तथा ये शमी के पत्ते मैं आपको अर्पित कर रहा हूँ, कृपया इन्हें ग्रहण करें।)
स्नान और आचमन के पश्चात इस सिद्ध मंत्र से किया गया पूजन साधक के जीवन के समस्त विघ्नों को हर लेता है और सुख, समृद्धि तथा रिद्धि-सिद्धि का मार्ग प्रशस्त करता है। आइए, इस अंगारक विनायकी चतुर्थी पर हम सब मिलकर प्रथम पूज्य भगवान गणेश का वंदन करें।
धन्यवाद !
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