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साप्ताहिक कविता प्रतियोगिता #०३
दिनांक : ०४-११-१८

 

मेरी खा़बे-कायनात

 

​उसे देखा तो,

आसमां की याद दिलाती है।

चाँद की रोशनी,

चेहरे पर नज़र आती है।

 

​उसके काले गेसुओं में,

भीगती जाती है रात,

रिदा-ए-तीरगी बन जाती है।

 

​हवा के झोंके से,

खुशबू जो उड़ी बदन से,

शायद वही कहीं न कहीं,

रातरानी कहलाती है।

 

​कुछ ठहरी हुई तो,

कुछ मचलती हुई,

मेरी खा़बे-कायनात,

वह बनती जाती है।

 

​इतने ख्यालों से,

इक नाम ज़ेहन में आया है।

मेरे जीवन की तरुणाई की,

वह “अनीता” कहलाई है।

 

​— अश्विनी राय ‘अरुण’

 

​कविता का भावार्थ (Interpretation)

​यह कविता केवल एक प्रेयसी के सौंदर्य का वर्णन नहीं है, बल्कि एक कवि हृदय द्वारा अपनी अर्धांगिनी के प्रति अगाध प्रेम और सम्मान की अभिव्यक्ति है:

प्रथम और द्वितीय छंद: कवि अपनी पत्नी ‘अनीता’ को देखते ही असीम आकाश की विशालता और पवित्रता को महसूस करता है। उनके चेहरे का तेज और सादगी ऐसी है मानो चाँद की पूरी रोशनी उनके चेहरे पर आकर ठहर गई हो। जब रात बढ़ती है, तो उनके घने काले बाल (गेसू) ऐसे लगते हैं मानो उन्होंने रात को अपने भीतर समेट लिया हो, और वे बाल ‘रिदा-ए-तीरगी’ (अंधकार की मखमली चादर) की तरह प्रतीत होते हैं।

​तृतीय छंद: यहाँ कवि अपनी पत्नी के सामीप्य की सुगंध को महसूस करता है। हवा के झोंके से उनके बदन की जो खुशबू बिखरती है, वह कवि को मदहोश करती है। कवि को लगता है कि प्रकृति में पाई जाने वाली सुगन्धित ‘रातरानी’ का वजूद शायद उन्हीं की इस खुशबू से प्रेरित है।

​अंतिम छंद: कवि कहता है कि वह सुंदरता, शालीनता और चंचलता का एक ऐसा संगम हैं जो कभी गंभीर (ठहरी हुई) तो कभी अल्हड़ (मचलती हुई) लगती हैं। वे कवि के जीवन का सबसे बड़ा सपना—उनकी ‘खा़बे-कायनात’ (ब्रह्मांड का सबसे सुंदर ख्वाब) बन चुकी हैं। इन तमाम खूबसूरत ख्यालों, यादों और एहसासों के केंद्र में जो पवित्र नाम कवि के ज़ेहन (मस्तिष्क) में उभरता है, वह उनकी जीवनसंगिनी और यौवन (तरुणाई) की प्रेरणा—अनीता हैं।

 

जब मैं छोटा था: बचपन की गली क्रिकेट और यादों का मीठा दर्द | अश्विनी राय ‘अरुण’

 

 

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