महादेव गोविन्द रानाडे जी के सबसे निकटस्थ उत्तराधिकारी और उनके मानस पुत्र के रूप में गोपाल कृष्ण गोखले का नाम सर्वोपरि है। यद्यपि तिलक और गोखले दोनों ही रानाडे के शिष्य थे, लेकिन गोखले ने रानाडे की ‘उदारवादी’ विचारधारा, उनके संवैधानिक तरीकों और उनके आर्थिक सिद्धांतों को पूर्णतः आत्मसात किया था।
रानाडे जी स्वयं गोखले की प्रतिभा से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने एक बार कहा था, “गोखले जैसे युवा के रहते भारत का भविष्य सुरक्षित है।”
यहाँ हम महान गुरु महादेव गोविन्द रानाडे के महान शिष्य गोपाल कृष्ण गोखले पर शोध-परक और विस्तृत आलेख प्रस्तुत कर रहे हैं:
गोपाल कृष्ण गोखले: उदारवाद के प्रतीक और राजनीति के ‘महात्मा’
प्रस्तावना
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के नरमपंथी दल के सबसे प्रखर नेता और महात्मा गांधी के राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले एक ऐसे व्यक्तित्व थे, जिन्होंने राजनीति में ‘नैतिकता’ और ‘अध्यात्म’ को प्राथमिकता दी। वे बालशास्त्री जंभेकर द्वारा शुरू की गई बौद्धिक परंपरा और महादेव गोविन्द रानाडे द्वारा स्थापित उदारवादी दर्शन की सबसे सशक्त कड़ी थे।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
गोपाल कृष्ण गोखले का जन्म ९ मई, १८६६ को महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के कोटलुक गाँव में हुआ था। विपरीत आर्थिक परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने अपनी शिक्षा पूरी की। एलिफिंस्टन कॉलेज, मुंबई से स्नातक करने के बाद वे पुणे के फर्ग्यूसन कॉलेज में इतिहास और अर्थशास्त्र के प्राध्यापक बने। उनके जीवन पर जंभेकर और रानाडे की उसी शैक्षणिक विरासत का गहरा प्रभाव था जिसने आधुनिक महाराष्ट्र को गढ़ा था।
रानाडे और गोखले: गुरु-शिष्य की अद्वितीय जोड़ी
गोखले, महादेव गोविन्द रानाडे के सबसे प्रिय और योग्य शिष्य थे।
बौद्धिक उत्तराधिकारी: रानाडे ने गोखले को सांख्यिकी, अर्थशास्त्र और सार्वजनिक नीतियों का गहन प्रशिक्षण दिया। गोखले ने रानाडे के मार्गदर्शन में ‘पुणे सार्वजनिक सभा’ के सचिव के रूप में कार्य किया।
संवैधानिक संघर्ष: रानाडे की तरह ही गोखले का विश्वास था कि अंग्रेजों से अधिकार मांगने के लिए संवैधानिक तरीकों, प्रार्थना पत्रों और तर्कों का सहारा लेना चाहिए।
‘सर्वेन्ट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी’ (भारत सेवक समाज) की स्थापना
१२ जून, १९०५ को गोखले ने ‘सर्वेन्ट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी’ की स्थापना की। इसका मुख्य उद्देश्य ऐसे नौजवानों को तैयार करना था जो निस्वार्थ भाव से देश की सेवा कर सकें। वे राजनीति का ‘आध्यात्मिकरण’ करना चाहते थे, जिसका अर्थ था कि देश सेवा को एक पवित्र कर्तव्य माना जाए, न कि सत्ता प्राप्ति का साधन।
आर्थिक प्रखरता और बजट विशेषज्ञ
दादाभाई नौरोजी के आर्थिक सिद्धांतों को गोखले ने सांख्यिकीय आधार दिया।
वेल्बी कमीशन: १८९७ में वे इंग्लैंड गए और ‘वेल्बी कमीशन’ के सामने भारतीय व्यय का ऐसा लेखा-जोखा प्रस्तुत किया कि अंग्रेज अधिकारी भी दंग रह गए।
इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल: परिषद के सदस्य के रूप में उनके बजट भाषण इतने प्रभावशाली होते थे कि स्वयं लॉर्ड कर्जन भी उनकी प्रशंसा करने को विवश हो जाता था।
महात्मा गांधी के राजनीतिक गुरु
दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटने पर महात्मा गांधी ने गोखले को अपना ‘राजनीतिक गुरु’ चुना। गोखले ने ही गांधी जी को सलाह दी थी कि वे सक्रिय राजनीति में आने से पहले पूरे भारत का भ्रमण करें और देश की मिट्टी को समझें। गांधी जी ने उनके बारे में कहा था— “गोखले गंगा के समान पवित्र, हिमालय के समान कोमल और समुद्र के समान गहरे थे।”
तिलक के साथ वैचारिक मतभेद
यद्यपि लोकमान्य तिलक और गोखले दोनों ने एक ही गुरु (रानाडे) से शिक्षा पाई थी, लेकिन उनके रास्तों में अंतर था। जहाँ तिलक ‘स्वराज’ के लिए उग्र विचारधारा के समर्थक थे, वहीं गोखले ‘सुधार’ और ‘क्रमिक विकास’ (Evolution) में विश्वास रखते थे। उनके बीच के मतभेदों के बावजूद, दोनों के मन में एक-दूसरे के प्रति अगाध सम्मान था।
उपसंहार
१९ फरवरी, १९१५ को मात्र ४९ वर्ष की आयु में इस महान देशभक्त का निधन हो गया। गोखले ने जंभेकर की विद्वत्ता, नाना शंकरशेठ की दूरदर्शिता, दादाभाई की आर्थिक सोच और रानाडे के धैर्य को एक साथ समेटकर भारतीय राजनीति को एक नया चरित्र प्रदान किया। वे एक ऐसे ‘धीरोदात्त’ नायक थे जिन्होंने सिखाया कि विरोध में भी विनम्रता और तर्कों में भी सत्यता होनी चाहिए।
महादेव गोविन्द रानाडे: आधुनिक भारत के निर्माता और अर्थशास्त्र के मनीषी