बंगाल का पुनर्जागरण: ८०० वर्षों की प्रतीक्षा और ‘हिन्दवी’ का उदय
लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय अरुण
लक्ष्मण सेन से बख्तियार खिलजी तक: एक युग का अंत
इतिहास के पन्ने गवाह हैं कि १२०४ ईस्वी तक बंगाल की भूमि महाराजा लक्ष्मण सेन के संरक्षण में फल-फूल रही थी। वे बंगाल के अंतिम सशक्त हिंदू सम्राट थे। किंतु नियति को कुछ और ही मंजूर था। बख्तियार खिलजी के आक्रमण ने न केवल बंगाल की सत्ता बदली, बल्कि यहाँ की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान पर भी गहरा आघात किया। वह एक ऐसी हार थी जिसने बंगाल को अगले कई सौ वर्षों के लिए दिल्ली सल्तनत और फिर मुग़ल साम्राज्य की बेड़ियों में जकड़ दिया।
गुलामी के बदलते चेहरे: सल्तनत, मुग़ल और अंग्रेज
मध्यकाल के अंधकार में बंगाल की अस्मिता दबी रही। मुग़लों के दौर में नवाबों का शासन रहा, जो अंततः सिराजुद्दौला तक पहुँचा। १७५७ में प्लासी के युद्ध ने सत्ता का चेहरा फिर बदला। सिराजुद्दौला को हटाकर अंग्रेजों ने बंगाल पर कब्जा किया। ८०० वर्षों तक बंगाल केवल सत्ता के हस्तांतरण का केंद्र बना रहा—कभी इस्लामी शासकों के अधीन, तो कभी गोरे साहबों के। इस लंबी अवधि में हिंदू समाज केवल संघर्ष और अस्तित्व की लड़ाई लड़ता रहा।
आजादी का अधूरा सच और ‘गोपाल पाठा’ का शौर्य
१९४७ में भारत आजाद हुआ, विभाजन की त्रासदी हुई, किंतु बंगाल के हिंदुओं के लिए यह आजादी पूर्ण नहीं थी। नोआखली से लेकर कोलकाता के दंगों तक, हिंदुओं का रक्त बहता रहा। उस कालखंड में गोपाल चंद्र मुखोपाध्याय (गोपाल पाठा) जैसे नायकों ने शस्त्र उठाए और समाज की रक्षा की। किंतु विडंबना देखिए, जिस बंगाल ने राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत दिया, वहां आजादी के बाद भी हिंदुओं की अपनी सरकार नहीं बन सकी।
वामपंथ से तुष्टिकरण की राजनीति तक
आजाद भारत में पहले दशकों तक कांग्रेस, फिर ३४ वर्षों का कठोर वामपंथी शासन और अंत में ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस की सरकार रही। इस पूरे दौर में आरोप लगते रहे कि सत्ता ने ‘वोट बैंक’ के लिए एक विशिष्ट समुदाय का पक्ष लिया और बहुसंख्यक हिंदू समाज को हाशिये पर धकेला गया। तुष्टिकरण की इस राजनीति ने सांस्कृतिक जड़ों को कमजोर करने का प्रयास किया।
४ मई २०२६: एक नया सूर्योदय
समय का चक्र अंततः घूमा। ८२२ वर्षों की एक लंबी प्रतीक्षा के बाद, ४ मई २०२६ को बंगाल की राजनीति ने एक ऐतिहासिक मोड़ लिया। जनता के प्रबल जनादेश के साथ ममता बनर्जी के शासन का अंत हुआ और भाजपा के नेतृत्व में ‘हिंदवी सरकार’ ने आकार लिया। यह केवल एक राजनीतिक परिवर्तन नहीं, बल्कि बंगाल की आत्मा की पुकार मानी जा रही है।
श्रीराम का आशीर्वाद और माँ काली का संरक्षण
कहा जाता है कि नियति स्वयं अपने मार्ग बनाती है। बंगाल की अधिष्ठात्री देवी माँ काली के बुलावे पर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का आशीर्वाद बंगाल की भूमि पर उतरा है। ‘जय श्री राम’ का उद्घोष, जो कभी बंगाल की गलियों में प्रतिबंधित करने का प्रयास किया गया था, आज वही राजशक्ति का आधार बना है। अब प्रश्न यह है कि यह ‘हिन्दवी’ शासन बंगाल को उसके प्राचीन गौरव और सांस्कृतिक वैभव की ओर कैसे ले जाता है।
निष्कर्ष
लक्ष्मण सेन के बाद शुरू हुआ पराभव का दौर अब थम गया है। बंगाल के इतिहास में ४ मई २०२६ की तिथि स्वर्ण अक्षरों में दर्ज होगी। अब यह देखना रोचक होगा कि यह नई सरकार किस प्रकार ‘सबका साथ’ सुनिश्चित करते हुए हिंदू समाज की उन आकांक्षाओं को पूरा करती है, जो सदियों से दबी हुई थीं।
बंगाल की पहली हार: राजा लक्ष्मण सेन और बख्तियार खिलजी का वह काला अध्याय।