बंगाल डायरी – भाग ४: ‘लाल सलाम’ से तुष्टिकरण तक — वामपंथ का छद्म और सांस्कृतिक क्षरण
लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय अरुण
वैचारिक गुलामी का नया चेहरा: वामपंथ का उदय
१९७७ में जब बंगाल में ज्योति बसु के नेतृत्व में वाम मोर्चा सत्ता में आया, तो बंगाल के लोगों को लगा कि यह शोषितों और वंचितों की सरकार है। लेकिन ‘लाल सलाम’ के नारों के पीछे एक गहरा सांस्कृतिक षड्यंत्र छिपा था। वामपंथियों ने सबसे पहले बंगाल के हिंदुओं को उनकी जड़ों से काटने का काम किया। स्कूलों की पाठ्यपुस्तकों से गौरवशाली हिंदू इतिहास को हटाकर ‘मार्क्सवादी सिद्धांतों’ को ठूंस दिया गया। उन्होंने सिखाया कि ‘धर्म अफीम है’, लेकिन यह नियम केवल हिंदुओं पर लागू हुआ।
‘मरीचझापी’: दलितों के नाम पर दलितों का नरसंहार
वामपंथियों के दोहरे चरित्र का सबसे वीभत्स उदाहरण १९७९ का मरीचझापी नरसंहार है। विभाजन के बाद आए हजारों दलित हिंदू शरणार्थियों ने जब मरीचझापी द्वीप पर अपना घर बसाना चाहा, तो ‘सर्वहारा के मसीहा’ वामपंथियों ने उन पर गोलियां चलवाईं, उनका दाना-पानी बंद कर दिया और सैकड़ों को मौत के घाट उतार दिया। यह बंगाल के इतिहास का वह काला पन्ना है जिसे वामपंथियों ने अपनी फाइलों में दबा दिया।
तुष्टिकरण की प्रयोगशाला
वामपंथ के ३४ वर्षों के शासन में बंगाल ‘घुसपैठियों की स्वर्गस्थली’ बन गया। अपनी सत्ता को स्थाई बनाने के लिए वामपंथियों ने सीमा पार से आने वाले अवैध लोगों को संरक्षण दिया, उनके राशन कार्ड बनवाए और उन्हें ‘वोट बैंक’ में तब्दील किया। इस प्रक्रिया में बंगाल के मूल हिंदू नागरिक अपने ही घर में असुरक्षित महसूस करने लगे। हिंदू त्यौहारों पर पाबंदियां और ‘धर्मनिरपेक्षता’ के नाम पर केवल एक समुदाय को विशेष अधिकार देना वामपंथी राजनीति की पहचान बन गई।
आर्थिक विनाश और मेधा का पलायन
जिस बंगाल ने कभी पूरे भारत को नेतृत्व दिया था, वामपंथ की ‘हड़ताल और यूनियन’ वाली राजनीति ने उसे औद्योगिक रूप से कंगाल कर दिया। ‘ब्रेन ड्रेन’ (प्रतिभा पलायन) शुरू हुआ; बुद्धिमान हिंदू युवा बंगाल छोड़कर जाने को मजबूर हुए। इससे बंगाल के भीतर हिंदू समाज की ‘बौद्धिक शक्ति’ कमजोर हुई, जिसका सीधा लाभ उन ताकतों को मिला जो बंगाल का इस्लामीकरण चाहती थीं।
विरासत में मिला ‘तुष्टिकरण’
ममता बनर्जी ने जब वामपंथ को हटाया, तो उम्मीद थी कि बदलाव आएगा। लेकिन उन्होंने वामपंथ के उसी ‘तुष्टिकरण’ वाले मॉडल को अपना लिया और उसे और अधिक आक्रामक बना दिया। वामपंथियों ने जो बीज बोए थे, ममता के राज में वे कटीले वृक्ष बन गए। आज का बंगाल जिस मजहबी उन्माद से जूझ रहा है, उसका आधार इन्ही ३४ वर्षों के ‘लाल शासन’ में रखा गया था।
निष्कर्ष
वामपंथ ने बंगाल के हिंदुओं को केवल आर्थिक रूप से नहीं, बल्कि मानसिक रूप से भी गुलाम बनाया। उन्होंने समाज को वर्गों में बांटा ताकि हिंदू कभी अपनी धार्मिक पहचान के लिए एकजुट न हो सकें। भाग ४ हमें यह सीख देता है कि ‘विचारधारा’ के नाम पर अपनी संस्कृति को भूलना आत्मघाती होता है। अगले भाग में हम उस महापुरुष की चर्चा करेंगे जिसने इस खतरे को बहुत पहले पहचान लिया था—डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और जनसंघ की स्थापना।
बंगाल डायरी – विशेष खंड: सांस्कृतिक रीढ़ और आध्यात्मिक प्रतिरोध