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वह और मैं: एक संवाद

 

मित्र का प्रश्न:

“सुना है बड़े मशहूर हो तुम,

पर किस नशे में चूर हो तुम?

न जाने क्यों ऐसा लगता है—

जैसे, बड़े मगरूर हो तुम!”

 

मित्र के लिए जवाब:

मशहूर नहीं ‘मशरूफ’ (व्यस्त) हूँ मैं,

अपनों की दुआओं का नूर हूँ मैं।

नशा अगर है तो बस ‘कलम’ का है,

हाँ, सादगी के नशे में चूर हूँ मैं।

 

जिसे तुम मेरा ‘गुरूर’ कहते हो,

वो शायद मेरी तन्हाई का पहरा है।

दूर से पत्थर सा लगता है जो,

अंदर से वो दरिया बहुत गहरा है।

 

अगर मगरूर हूँ, तो बस इस बात पर—

कि तुम जैसा ‘यार’ मेरे पास है।

दिखता हूँ शायद दूर तुम्हें,

पर दिल तो तुम्हारा ही आवास है।

 

मशहूर होना तो दुनिया का दस्तूर है,

पर आपकी नज़रों में ‘मजबूर’ रहना भी मंज़ूर है।

यह गुरूर नहीं, मेरे आदरणीय भाई—

बस तुम्हारी कमी का एक छोटा सा एहसास है।

 

“दोस्त, मशहूर होना तो दुनिया का दस्तूर है, पर तुम्हारी नज़रों में ‘मजबूर’ भी रहना मुझे मंज़ूर है। यह गुरूर नहीं, बस तुम्हारी कमी का एहसास है।”

 

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