अंतस के आरेख
त्रिदिवसीय काव्य प्रतियोगिता,
दिनाँक : २८ अक्तूबर २०१९
दिए की जंग
कवि: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’
एक शाम चौराहे पर
दिया जल रहा था
कभी मद्धम तो
कभी भभक रहा था
एक शाम चौराहे पर
दिया जल रहा था॥
चल रही थी हवा
आँधी बनकर
खुद को जलाए रखने को
वह लड़ रहा था
कभी वेग थमता
वह संभलता
कभी जो चलती वेगी
वह अस्तित्व से लड़ रहा था
एक शाम चौराहे पर
दिया जल रहा था॥
कभी रोशन किए खड़ा था
आज जहमत में पड़ा था
थी लड़ाई उसकी या हमारी
सोच में पड़ा था
एक शाम चौराहे पर
दिया जल रहा था॥
जब ज़माना
चैन से सो रहा था
उसे रोशन रखने को
वह हवा से लड़ रहा था
काम नहीं आसाँ था
हवा को सलामी दे या
दे ज़माने को रोशनी
अजब धर्मसंकट में पड़ा
वह जल रहा था
एक शाम चौराहे पर
दिया जल रहा था॥
नहीं झुकूँगा बैरी से
सेवा धर्म है मेरा
यही तो कर्म है मेरा
टिमटिमाता दिया
यह सोचकर
एक बार ज़ोर से
भभक पड़ा था
बड़ी देर से लड़ता रहा
हवा के हर वार को सहता रहा
घायल था, कमज़ोर बड़ा था
तेल का तेज भी
कम हो पड़ा था
हवा के इस झोंके से
लड़ता, जूझता
बुझ गया था
एक शाम चौराहे पर
जो दिया जल रहा था॥
बुझ गया था दिया
थी रोशन उसकी हिम्मत
बुझे दिए के धुएँ ने
अलख जगा रखी थी
ज़माने के नथुने में
अपनी खुशबू फैला रखी थी
हवा से जूझता वह
ज़माने को जगा रहा था
उठो, जागो, खड़े हो जाओ
अंधेरा गहरा हो गया है
युद्ध का बिगुल फूंकता
वह समर में धूल गया था
एक शाम चौराहे पर
जो दिया जल रहा था॥
