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फिल्म समीक्षा: ‘सतलुज’ (पंजाब ’95) – इतिहास, सिनेमा और तटस्थता का द्वंद्व

 

निर्देशक: हनी त्रेहान

मुख्य कलाकार: दिलजीत दोसांझ, अर्जुन रामपाल, सुविंदर विक्की

शैली: बायो–ग्राफिकल पॉलिटिकल ड्रामा / ऐतिहासिक थ्रिलर

 

भूमिका: सिनेमा की कसौटी पर इतिहास का एक काला पन्ना

हनी त्रेहान द्वारा निर्देशित फिल्म ‘सतलुज’ (जिसे पहले ‘पंजाब ’95’ नाम दिया गया था) केवल एक सिनेमाई मनोरंजन नहीं है, बल्कि यह स्वतंत्र भारत के सबसे अशांत दौर—1980 और 90 के दशक के पंजाब—का एक गहरा दस्तावेज़ है। यह फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा के जीवन और उनके द्वारा उजागर किए गए ‘लावारिस शवों’ के सच पर केंद्रित है। एक कलाकृति के रूप में यह फिल्म जितनी प्रभावशाली है, एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ के रूप में यह उतनी ही विवादित भी है। एक तटस्थ दृष्टिकोण से देखने पर इस फिल्म के दो स्पष्ट पहलू सामने आते हैं: एक जो व्यवस्था की क्रूरता को बेनकाब करता है, और दूसरा जो उस दौर के पूरे सच को अधूरा छोड़ देता है।

 

सकारात्मक पक्ष (पहला पहलू): मानवाधिकार और जसवंत सिंह खालरा का ऐतिहासिक सच

1. खालरा के संघर्ष और खोजी जांच का सटीक चित्रण:

फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष यह है कि यह जसवंत सिंह खालरा (दिलजीत दोसांझ द्वारा अभिनीत) के खोजी अभियान को पूरी प्रामाणिकता के साथ दिखाती है। अमृतसर सेंट्रल कोऑपरेटिव बैंक के एक साधारण मैनेजर से लेकर एक वैश्विक मानवाधिकार कार्यकर्ता बनने तक का उनका सफर स्क्रीन पर बेहद सजीव है। फिल्म यह दिखाने में पूरी तरह सफल रही है कि कैसे उन्होंने नगर निगम और श्मशान घाटों के गुप्त रजिस्टरों को खंगालकर 2,000 से अधिक अज्ञात शवों के अवैध दाह-संस्कार का सच निकाला था, जिसे बाद में सीबीआई और सुप्रीम कोर्ट ने भी सही माना।

2. राज्य प्रायोजित हिंसा और पुलिस बर्बरता का बेबाक प्रकटीकरण:

फिल्म उस दौर की पुलिस कार्यप्रणाली के उस काले पक्ष को दिखाने से नहीं हिचकती, जहां ‘प्रमोशन, नकद इनाम और पदकों’ की लालसा में मानवाधिकारों को कुचल दिया गया था। फर्जी मुठभेड़ों (Fake Encounters) और हिरासत में टॉर्चर के दृश्य विचलित करने वाले हैं, लेकिन यह ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित है कि उस दौर में सुरक्षा बलों को उग्रवाद कुचलने के लिए असीमित अधिकार दिए गए थे, जिसका दुरुपयोग भी हुआ।

3. जसवंत सिंह खालरा का अपहरण और अंतिम परिणति:

फिल्म का क्लाइमेक्स जसवंत सिंह खालरा के साहस और उनकी दुखद परिणति को दिखाता है। 6 सितंबर 1995 को उनके घर के बाहर से हुए अपहरण और उसके बाद पुलिस हिरासत में उनकी हत्या का चित्रण ऐतिहासिक रिकॉर्ड (जैसे पूर्व पुलिसकर्मी कुलदीप सिंह के अदालती बयान) के बिल्कुल करीब है। फिल्म यह संदेश देने में सफल रहती है कि सच बोलने की कीमत खालरा को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी थी।

 

आलोचनात्मक पक्ष (दूसरा पहलू): जहां फिल्म ‘तटस्थता’ के पैमाने पर चूक जाती है

एक उत्कृष्ट और निष्पक्ष फिल्म समीक्षा के लिए इसके उन पहलुओं पर चर्चा करना आवश्यक है, जो नैरेटिव (कथानक) को एकतरफा बनाते हैं:

1. उग्रवादियों के ‘आतंक के राज’ पर रहस्यमयी चुप्पी:

फिल्म का सबसे बड़ा दोष यह है कि यह 1980 और 90 के दशक के पंजाब के केवल एक ही पक्ष को दिखाती है। पंजाब में उग्रवाद के उस दौर में खालिस्तानी चरमपंथियों द्वारा हजारों निर्दोष हिंदुओं और सिखों की हत्याएं की गई थीं, बसों से उतारकर लोगों को गोली मारी गई, जबरन वसूली हुई और महिलाओं पर अत्याचार किए गए। फिल्म इन भयानक वास्तविकताओं को पूरी तरह नजरअंदाज कर देती है। एक तटस्थ दर्शक के लिए यह समझना मुश्किल हो जाता है कि पुलिस इतनी आक्रामक और क्रूर क्यों हुई थी, क्योंकि फिल्म उस उग्रवादी पृष्ठभूमि और उनके आतंक को स्थापित ही नहीं करती।

2. हिंसा और उग्रवादी नेताओं का कथित महिमामंडन:

समीक्षकों का एक बड़ा वर्ग इस बात से असहमत है कि फिल्म में तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की आत्मघाती बम धमाके में हुई हत्या के दृश्य को जिस तरह से फिल्माया गया है, वह संवेदनशील है। बैकग्राउंड में सिखों के पवित्र धार्मिक भजनों का उपयोग करना और इस हिंसक कृत्य को एक ‘न्याय’ या ‘आध्यात्मिक जीत’ के रूप में पेश करना, चरमपंथ और आतंकवाद को सही ठहराने जैसा प्रतीत होता है। यह फिल्म की तटस्थता को गंभीर रूप से चोट पहुंचाता है।

3. वास्तविक पात्रों के नाम बदलना और कानूनी सेंसरशिप:

केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) के साथ लंबे विवाद और दर्जनों कट्स के बाद फिल्म में तत्कालीन डीजीपी केपीएस गिल और मुख्यमंत्री बेअंत सिंह जैसे वास्तविक किरदारों के नाम बदलकर क्रमशः ‘DGP बिट्टा’ और ‘CM अनंत सिंह’ कर दिए गए हैं। हालांकि यह कानूनी मजबूरी थी, लेकिन इससे फिल्म का दस्तावेजी मूल्य (Documentary Value) थोड़ा कम हो जाता है और यह एक वास्तविक इतिहास के बजाय एक ‘काल्पनिक कहानी’ जैसी लगने लगती है।

 

अभिनय, निर्देशन और तकनीकी पक्ष

दिलजीत दोसांझ का अभिनय: दिलजीत दोसांझ ने जसवंत सिंह खालरा के किरदार में अपने करियर का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन दिया है। उनकी आंखों में दिखने वाला दृढ़ संकल्प, शांति और दर्द फिल्म की आत्मा है। वह कहीं भी लाउड नहीं होते, बल्कि बहुत ही सूक्ष्म (Subtle) तरीके से एक पारिवारिक व्यक्ति और एक जुझारू कार्यकर्ता के द्वंद्व को जीते हैं।

सह-कलाकार: अर्जुन रामपाल ने एक सख्त और क्रूर पुलिस अधिकारी के रूप में प्रभावित किया है, हालांकि उनका किरदार थोड़ा एकआयामी (One-dimensional) लगता है। सुविंदर विक्की ने हमेशा की तरह अपनी भूमिका के साथ पूरा न्याय किया है।

निर्देशन और सिनेमैटोग्राफी: हनी त्रेहान का निर्देशन कसा हुआ है। 90 के दशक के पंजाब के गांवों, धूल भरे श्मशान घाटों और तनावपूर्ण माहौल को कैमरे (सिनेमैटोग्राफी) ने बहुत ही सघन और डार्क टोन में कैद किया है, जो फिल्म के गंभीर विषय के अनुकूल है।

 

निष्कर्ष: एक महत्वपूर्ण लेकिन अधूरी दास्तां

‘सतलुज’ (पंजाब ’95) एक सिनेमाई मास्टरपीस होने के बेहद करीब पहुंचती है, लेकिन अपनी वैचारिक एकतरफा सोच के कारण वह ऐतिहासिक न्याय करने से चूक जाती है। जसवंत सिंह खालरा के प्रति सम्मान और उनकी खोजी जांच का सच दिखाना इस फिल्म की सबसे बड़ी जीत है। लेकिन पंजाब के उस काले दौर के दूसरे खूनी हिस्से—यानी उग्रवादियों के आतंक—को छिपा लेना इसकी सबसे बड़ी कमजोरी है।

यह फिल्म उन लोगों के लिए देखना जरूरी है जो मानवाधिकारों की लड़ाई और व्यवस्था की क्रूरता को समझना चाहते हैं, लेकिन एक तटस्थ दर्शक को यह हमेशा याद रखना होगा कि यह पंजाब के उस दौर के इतिहास का पूरा सच नहीं, बल्कि केवल ‘एक चुनिंदा सच’ है। यही कारण है कि यह फिल्म आज भी कला, इतिहास और राजनीति के बीच एक बड़े विवाद का केंद्र बनी हुई है।

 

 

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