सत्ता का शिखर और कनिष्ठ मोहरे: मोदी काल के आंदोलनों और जवाबदेही से बचने का विस्तृत आलेख
लोकतांत्रिक ढांचे में जन-आंदोलन जनता की आवाज होते हैं, लेकिन पिछले 12 वर्षों (2014 से 2026) में केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने इन आंदोलनों से निपटने के लिए एक विशेष और अभूतपूर्व राजनीतिक ढर्रा विकसित किया है। इस रणनीति के दो मुख्य स्तंभ हैं: पहला—शीर्ष नेतृत्व का असहज मुद्दों पर पूरी तरह मौन हो जाना, और दूसरा—जब जनता का आक्रोश फूट पड़े, तो प्रधानमंत्री के बजाय जूनियर मंत्रियों, प्रवक्ताओं या सरकारी नौकरशाहों को ढाल बनाकर आगे कर देना।
नीचे सरकार के खिलाफ हुए सभी प्रमुख आंदोलनों का विस्तृत काला चिट्ठा है, जो इस बात की पोल खोलता है कि सरकार कहाँ-कहाँ सीधे जवाब देने से बचती रही:
1. NEET-UG पेपर लीक और ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) आंदोलन (2026)
सरकार की पोल: चिकित्सा प्रवेश परीक्षा NEET-UG 2026 में पेपर लीक और विसंगतियों के कारण 22 लाख से अधिक छात्रों का भविष्य अधर में लटक गया। यह पूरी शिक्षा और प्रशासनिक प्रणाली के भ्रष्टाचार की पोल खोलता है।
जवाबदेही से बचाव: इस संवेदनशील मुद्दे पर जब लाखों छात्र और अभिभावक मानसिक तनाव से गुजर रहे थे, प्रधानमंत्री की तरफ से कोई सीधी सहानुभूति या जवाबदेही देखने को नहीं मिली। संसद के मॉनसून सत्र की शुरुआत में भी इस मुद्दे पर विपक्ष के हंगामे के बीच सत्र को स्थगित कर दिया गया, लेकिन खुली बहस नहीं कराई गई।
किसे आगे किया गया: जनता और मीडिया के तीखे तीरों को झेलने के लिए शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) के महानिदेशक को आगे झोंक दिया गया। जब ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) और छात्र संगठनों के नेतृत्व में दिल्ली के जंतर-मंतर पर भारी प्रदर्शन हुआ और ‘संसद चलो’ मार्च निकाला गया, तो सरकार ने राजनीतिक जवाब देने के बजाय दिल्ली पुलिस को आगे कर आंसू गैस, लाठीचार्ज और धरपकड़ का सहारा लिया।
2. देशव्यापी ‘हिट एंड रन’ कानून विरोधी आंदोलन (2024)
सरकार की पोल: ‘भारतीय न्याय संहिता’ (BNS) में ड्राइवरों के लिए 10 साल की सजा और ₹7 लाख के जुर्माने का कड़ा प्रावधान बिना जमीनी हकीकत जाने और ट्रांसपोर्ट यूनियनों से बात किए बिना थोप दिया गया। इससे ड्राइवरों में मॉब लिंचिंग का डर बैठ गया।
जवाबदेही से बचाव: ड्राइवरों की हड़ताल से जब पूरे देश में पेट्रोल-डीजल की किल्लत हो गई और हाहाकार मच गया, तब भी शीर्ष राजनैतिक नेतृत्व ने कोई बयान नहीं दिया।
किसे आगे किया गया: इस गंभीर संकट को टालने और ऑल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस (AIMTC) के गुस्से को शांत करने के लिए गृह सचिव अजय भल्ला (एक सरकारी नौकरशाह) को आगे किया गया। गृह सचिव और गृह मंत्रालय के अधिकारियों ने प्रेस के सामने आकर आश्वासन दिया कि कानून अभी लागू नहीं हो रहा है, जिससे शीर्ष मंत्रियों की साख बची रहे।
3. ऐतिहासिक किसान आंदोलन (2020–2021 और 2024–2025)
सरकार की पोल: कॉरपोरेट्स को फायदा पहुंचाने के आरोप वाले तीन कृषि कानूनों को बिना किसी व्यापक संसदीय चर्चा के अध्यादेश के रास्ते पास कराया गया। जब किसान दिल्ली की सीमाओं पर कड़ाके की ठंड और धूप में एक साल तक बैठे रहे, तो सरकार ने उन्हें “खालिस्तानी”, “माओवादी” और “आंदोलनजीवी” कहकर बदनाम करने की पूरी कोशिश की।
जवाबदेही से बचाव: एक साल के लंबे धरने और सैकड़ों किसानों की मौत के बावजूद प्रधानमंत्री ने आंदोलनकारी किसानों से एक बार भी सीधे मुलाकात या बातचीत नहीं की।
किसे आगे किया गया: किसानों को थका देने की रणनीति के तहत 11 दौर की बेनतीजा बातचीत के लिए कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल को मोर्चे पर रखा गया। जब पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव नजदीक आए और सरकार को अपनी हार दिखने लगी, तब प्रधानमंत्री ने खुद टीवी पर आकर कानून वापसी की घोषणा की, लेकिन अपनी नीति की गलती मानने के बजाय सारा दोष “कुछ किसानों को समझा न पाने” पर मढ़ दिया।
4. सैन्य भर्ती ‘अग्निपथ योजना’ विरोधी आंदोलन (2022)
सरकार की पोल: भारतीय सेना में नियमित और स्थायी नौकरियों को खत्म कर युवाओं को केवल 4 साल के लिए संविदा (contract) पर रखने की ‘अग्निपथ योजना’ लाई गई। इससे देश के करोड़ों युवाओं का भविष्य असुरक्षित हो गया और युवाओं ने कई राज्यों में उग्र प्रदर्शन किए।
जवाबदेही से बचाव: रक्षा क्षेत्र के इस सबसे बड़े और विवादास्पद नीतिगत बदलाव पर न तो रक्षा मंत्री ने संसद में कोई खुली बहस झेली और न ही प्रधानमंत्री ने युवाओं के हिंसक आक्रोश पर सीधा रुख स्पष्ट किया।
किसे आगे किया गया: भारतीय राजनीति के इतिहास में पहली बार, एक राजनैतिक फैसले का बचाव करने के लिए तीनों सेनाओं के सैन्य जनरलों (Military Officers) को प्रेस कॉन्फ्रेंस करने के लिए आगे कर दिया गया। सरकार ने बड़ी चतुराई से सेना की वर्दी को अपनी ‘राजनैतिक ढाल’ बनाया ताकि सरकार का विरोध करने वालों को “सेना-विरोधी” या “देशद्रोही” ठहराया जा सके।
5. महिला पहलवानों का यौन उत्पीड़न विरोधी आंदोलन (2023)
सरकार की पोल: ओलंपिक और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का मान बढ़ाने वाली महिला पहलवानों (विनेश फोगाट, साक्षी मलिक) ने कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष और भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह पर यौन शोषण के गंभीर आरोप लगाए। यह आंदोलन सरकार के ‘बेटी बचाओ’ नारे की पोल खोलता है।
जवाबदेही से बचाव: जब देश की बेटियां जंतर-मंतर की सड़कों पर रो रही थीं और घसीटी जा रही थीं, तब ‘मन की बात’ करने वाले प्रधानमंत्री पूरी तरह मौन रहे। आरोपी सांसद को बचाने के लिए महीनों तक दिल्ली पुलिस ने एफआईआर दर्ज नहीं की।
किसे आगे किया गया: इस मामले की आंच से पीएमओ को बचाने के लिए खेल मंत्री अनुराग ठाकुर को पहलवानों से बंद कमरों में बातचीत करने और उन्हें समझाने के काम पर लगाया गया। सरकार ने इस पूरे मुद्दे को महज़ एक कानूनी पेच बताकर शीर्ष नेतृत्व की छवि को बेदाग बनाए रखा।
6. सीएए-एनआरसी (CAA-NRC) विरोधी आंदोलन (2019–2020)
सरकार की पोल: नागरिकता संशोधन कानून के जरिए समाज को धार्मिक आधार पर बांटने का आरोप लगा। दिल्ली का शाहीन बाग और जेएनयू-जामिया जैसे विश्वविद्यालय इसके मुख्य केंद्र बने।
जवाबदेही से बचाव: देशव्यापी प्रदर्शनों और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में हो रही किरकिरी के बावजूद प्रधानमंत्री ने प्रदर्शनकारियों से सीधे संवाद का कोई रास्ता नहीं निकाला। बल्कि एक चुनावी रैली में उन्होंने विवादास्पद बयान दिया कि “प्रदर्शन करने वालों को उनके कपड़ों से पहचाना जा सकता है।”
किसे आगे किया गया: इस पूरे आंदोलन के दौरान केवल गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा के छोटे प्रवक्ताओं को टीवी चैनलों पर नैरेटिव सेट करने के लिए आगे रखा गया। आंदोलनकारियों को देश का दुश्मन साबित करने का पूरा जिम्मा आईटी सेल और छोटे नेताओं को सौंप दिया गया था।
7. मणिपुर जातीय हिंसा विरोधी प्रदर्शन (2023–2024)
सरकार की पोल: मणिपुर में भड़की भीषण जातीय हिंसा में सैकड़ों लोग मारे गए, महिलाओं को निर्वस्त्र घुमाया गया और राज्य महीनों तक जलता रहा। यह सरकार की ‘डबल इंजन’ शासन व्यवस्था की सबसे बड़ी प्रशासनिक नाकामी थी।
जवाबदेही से बचाव: इस त्रासदी पर प्रधानमंत्री ने संसद के भीतर या बाहर महीनों तक कोई बयान नहीं दिया। विपक्ष द्वारा अविश्वास प्रस्ताव लाने के बाद ही वे संसद में बोले, लेकिन उसमें भी मणिपुर पर बेहद संक्षिप्त टिप्पणी की। उन्होंने आज तक मणिपुर का एक भी दौरा नहीं किया।
किसे आगे किया गया: मणिपुर के मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह और गृह मंत्री अमित शाह को ही इस संकट का सामना करने के लिए आगे रखा गया, जबकि प्रधानमंत्री खुद को इस विवादित और दुखद घटनाक्रम से पूरी तरह दूर रखने में सफल रहे।
निष्कर्ष: ‘क्राइसिस मैनेजमेंट’ का कॉरपोरेट मॉडल
मोदी सरकार के शासन का यह आलेख साफ करता है कि यहाँ जवाबदेही का एक कॉरपोरेट मॉडल लागू है। जब भी कोई नीति सफल होती दिखाई देती है या किसी भव्य आयोजन (जैसे नए संसद भवन का उद्घाटन, वैश्विक शिखर सम्मेलन) का मौका होता है, तो उसका पूरा श्रेय और केंद्रबिंदु स्वयं प्रधानमंत्री होते हैं।
इसके विपरीत, जब भी कोई नीति विफल होती है या जनता सड़कों पर उतरकर “पोल खोलती है”, तो जनता के आक्रोश को झेलने, लाठीचार्ज का आदेश देने और मीडिया के सामने सफाई पेश करने के लिए हमेशा किसी कनिष्ठ मंत्री, पार्टी प्रवक्ता या नौकरशाह को बलि का बकरा (Scapegoat) बना दिया जाता है। यह रणनीति शीर्ष नेतृत्व की राजनैतिक छवि को तो सुरक्षित रखती है, लेकिन स्वस्थ लोकतंत्र की मूल भावना ‘सीधी जवाबदेही’ का गला घोंट देती है।
डिस्क्लेमर: इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार और विश्लेषण लेखक के निजी राजनैतिक दृष्टिकोण और उपलब्ध सार्वजनिक घटनाक्रमों पर आधारित हैं। इसका उद्देश्य किसी राजनैतिक दल, व्यक्ति या संस्था की छवि को ठेस पहुंचाना नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जवाबदेही और जन-आंदोलनों के पैटर्न का एक विश्लेषणात्मक मूल्यांकन प्रस्तुत करना है। पाठक अपने विवेक से काम लें।
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