अयोध्या राम मंदिर की न्यायिक और ऐतिहासिक यात्रा: भाग-३ (राम मंदिर आंदोलन और ६ दिसंबर १९९२ का घटनाक्रम)
(नोट: यह इस विशेष श्रृंखला का तीसरा भाग है। पहले दो भागों में हमने प्राचीन इतिहास, सम्राट विक्रमादित्य के काल, १५२८ के विध्वंस, ब्रिटिश दौर के मुकदमों और १९४९ में रामलला की मूर्ति प्रकट होने की कहानी को समझा था। इस भाग में हम स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े जन-आंदोलन, शाह बानो केस के प्रभाव, ताला खुलने और ६ दिसंबर १९९२ की उस ऐतिहासिक घटना का विश्लेषण करेंगे जिसने देश की राजनीति और इतिहास को हमेशा के लिए बदल दिया।)
सन १९४९ में विवादित ढांचे पर ताला लगने के बाद यह मामला कई दशकों तक फैजाबाद की अदालत में सुस्त रफ्तार से चलता रहा। लेकिन १९८० के दशक में राजनीतिक और सामाजिक पटल पर कुछ ऐसी घटनाएं घटीं, जिन्होंने इस कानूनी ढुलमुलपन को देश के सबसे बड़े जन-आंदोलन (Mass Movement) में बदल दिया। यह वह दौर था जब राम जन्मभूमि की मुक्ति का संकल्प अदालती कमरों से निकलकर भारत के हर घर और गांव की चौपाल तक पहुंच गया।
आइए इस तीसरे भाग में १९८० के दशक की राजनीतिक उथल-पुथल, रथ यात्रा और ६ दिसंबर १९९२ के घटनाक्रम को सिलसिलेवार तरीके से समझते हैं।
१. १९८० का दशक: आंदोलन का उदय और शाह बानो केस का राजनीतिक प्रभाव
१९८० के दशक की शुरुआत में विश्व हिंदू परिषद (VHP) ने राम जन्मभूमि की मुक्ति के लिए देशव्यापी अभियान चलाने का निर्णय लिया। इसी दौरान वर्ष १९८५-८६ में भारत की राजनीति में एक बड़ा मोड़ आया:
- शाह बानो मामला और तुष्टिकरण का आरोप: सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम महिला शाह बानो के पक्ष में गुजारा भत्ते का ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने कट्टरपंथी मुस्लिम संगठनों के दबाव में आकर संसद में कानून बदलकर इस फैसले को पलट दिया।
- हिंदू संगठनों की प्रतिक्रिया: इस कदम से बहुसंख्यक हिंदू समाज में यह संदेश गया कि सरकार तुष्टिकरण की नीति अपना रही है। इसके जवाब में हिंदू संगठनों ने राम मंदिर आंदोलन की धार को और तेज कर दिया।
२. १ फरवरी १९८६: अदालत का ऐतिहासिक आदेश और ताला खुलना
इस राजनीतिक माहौल के बीच, उमेश चंद्र पांडे नाम के एक स्थानीय वकील ने फैजाबाद अदालत में एक अर्जी दाखिल की। उन्होंने मांग की कि चूंकि अंदर रामलला की नियमित पूजा एक पुजारी द्वारा की ही जा रही है, इसलिए आम हिंदुओं को दर्शन से वंचित रखना मौलिक अधिकारों का हनन है और परिसर का ताला तुरंत खोला जाना चाहिए।
- जज के. एम. पांडे का ऐतिहासिक फैसला: १ फरवरी १९८६ को फैजाबाद के जिला न्यायाधीश के. एम. पांडे ने एक अभूतपूर्व आदेश सुनाया। उन्होंने जिला प्रशासन से पूछा कि क्या ताला खोलने से कानून-व्यवस्था को कोई खतरा है? तत्कालीन डीएम और एसपी ने कहा कि वे सुरक्षा बनाए रखने में सक्षम हैं।
- ताला खुलने का दृश्य: अदालत का आदेश आने के मात्र ४० मिनट के भीतर विवादित परिसर के भारी लोहे के ताले खोल दिए गए। दूरदर्शन पर इस घटना का सीधा प्रसारण हुआ और दशकों बाद लाखों भक्तों ने टेलीविजन पर रामलला के साक्षात दर्शन किए। इस घटना ने आंदोलन को एक नई ऊर्जा दे दी।
[ १०४९ से विवादित परिसर पर बंद ताला ]
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(१ फरवरी १९८६: फैजाबाद कोर्ट का आदेश)
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[ ४० मिनट के भीतर खुला मुख्य ताला ]
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[ हिंदुओं में उत्साह ] [ मुस्लिम पक्ष की लामबंदी ]
• आम जनता के लिए दर्शन शुरू हुए। • बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी का गठन।
• आंदोलन जन-आंदोलन में बदला। • कानूनी और राजनीतिक विरोध तेज।
३. शिलान्यास (१९८९) और लालकृष्ण आडवाणी की ऐतिहासिक ‘रथ यात्रा’ (१९९०)
ताला खुलने के बाद आंदोलन का नेतृत्व पूरी तरह से भाजपा और वीएचपी के हाथों में आ गया।
- राम शिला पूजन और शिलान्यास (१९८९): वीएचपी ने देश के हर गांव से ‘राम शिला’ (पवित्र ईंटें) अयोध्या भेजने का अभियान चलाया। नवंबर १९८९ में राजीव गांधी सरकार की अनुमति से विवादित स्थल के पास ही मंदिर का पहला शिलान्यास (Foundation Stone) किया गया, जिसमें दलित समुदाय के कामेश्वर चौपाल ने पहली ईंट रखी।
- सोमनाथ से अयोध्या रथ यात्रा (सितंबर १९९०): आंदोलन को पूर्ण राष्ट्रव्यापी स्वरूप देने के लिए भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने २५ सितंबर १९९० को गुजरात के पवित्र सोमनाथ मंदिर से उत्तर प्रदेश के अयोध्या तक एक भव्य ‘रथ यात्रा’ की शुरुआत की।
- कारसेवकों पर गोलीकांड: इस यात्रा ने देश के कोने-कोने में राम भक्ति की लहर पैदा कर दी। हालांकि, अक्टूबर १९९० में बिहार के समस्तीपुर में तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के आदेश पर आडवाणी जी को गिरफ्तार कर लिया गया। इसके विरोध में लाखों कारसेवक अयोध्या पहुंच गए, जहां ३० अक्टूबर और २ नवंबर १९९० को उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के आदेश पर सुरक्षा बलों ने कारसेवकों पर गोलियां चला दीं, जिसमें कई कारसेवक वीरगति को प्राप्त हुए।
४. ६ दिसंबर १९९२: विवादित ढांचे का ढहना और इतिहास का नया मोड़
गोलियों के जख्म और शहादत ने राम भक्तों के संकल्प को और अधिक अडिग बना दिया। वर्ष १९९१ के चुनावों में उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी और कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने। उन्होंने अदालत में यह हलफनामा दिया कि वे परिसर की सुरक्षा करेंगे, लेकिन कारसेवकों पर बल प्रयोग नहीं करेंगे।
६ दिसंबर की सुबह का घटनाक्रम
वीएचपी और भाजपा के आह्वान पर देश भर से २ लाख से अधिक कारसेवक अयोध्या में ‘सांकेतिक कारसेवा’ के लिए एकत्रित हुए थे। परिसर के सामने बने एक ऊंचे मंच पर लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती और अशोक सिंघल जैसे बड़े नेता मौजूद थे।
- नियंत्रण से बाहर हुई भीड़: सुबह करीब ११:४५ बजे अचानक कुछ युवा कारसेवकों का जत्था सुरक्षा घेरे और बाड़ को तोड़ते हुए मुख्य गुंबद के ऊपर चढ़ गया। नेताओं ने लाउडस्पीकर से कारसेवकों को नीचे उतरने की अपील की, लेकिन तब तक स्थिति पूरी तरह नियंत्रण से बाहर हो चुकी थी।
- ढहाया गया ढांचा: कारसेवकों ने कुदाल, हथौड़ों और रस्सियों की मदद से एक-एक करके विवादित ढांचे के तीनों गुंबदों को ढहा दिया। शाम करीब 5:00 बजे तक वह तीन गुंबदों वाला पुराना ढांचा पूरी तरह मलबे में तब्दील हो चुका था।
- अस्थायी मंदिर का निर्माण: ढांचा ढहने के तुरंत बाद कारसेवकों ने उसी मलबे को साफ किया और रातों-रात तिरपाल (Tent) की मदद से एक अस्थायी मंदिर (Temporary Structure) खड़ा कर दिया, जिसमें भगवान रामलला की मूर्ति को पूरी मर्यादा के साथ पुनः स्थापित किया गया।
राजनीतिक परिणाम
इस ऐतिहासिक घटना के तुरंत बाद मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया। केंद्र की पी. वी. नरसिम्हा राव सरकार ने उत्तर प्रदेश सहित चार राज्यों की भाजपा सरकारों को बर्खास्त कर दिया और पूरे परिसर को अपने सीधे नियंत्रण (Adjoining Area Acquisition Act, 1993) में ले लिया।
भाग-३ का निष्कर्ष
६ दिसंबर १९९२ की घटना ने इस विवाद के भौतिक स्वरूप को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया। अब वहां कोई पुरानी विवादित इमारत मौजूद नहीं थी, बल्कि एक अस्थायी टेंट में विराजमान रामलला थे। यहाँ से यह आंदोलन अपने सबसे कठिन और वैज्ञानिक कानूनी दौर में दाखिल हुआ, जहाँ अब अदालत को ज़मीन के नीचे दबे पत्थरों और मलबे के आधार पर फैसला करना था।
अगले भाग की ओर:
इस श्रृंखला के भाग-४ में हम चर्चा करेंगे—“एएसआई (ASI) का वह वैज्ञानिक सर्वे जिसने कोर्ट में रुख बदल दिया”। हम गहराई से जानेंगे कि कैसे वर्ष २००३ में इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश पर पुरातत्व विभाग ने विवादित स्थल की खुदाई की और मलबे के नीचे से मिले २६८ हिंदू अवशेषों, कसौटी के खंभों और तोरण द्वारों ने अदालत के सामने सच का आइना रख दिया।