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साहित्यिक प्रतियोगिता : १.१५
दिनाँक : १५/१२/१९
विषय : शर्मिंदा

जला के इंसानियत को,
वो अभी जिन्दा है।

भूखे की रोटी छीनी,
प्यासे को पानी छीनी,
रोगी के लाश पर हँसकर भी,
वो अभी जिन्दा है।

जो शिक्षा दिलाएं,
अंधे को राह बताए,
अपराध को शर्मिंदा कर जाएं,
उनको भटका कर भी,
वो अभी जिंदा जिंदा है।

कमजोर को दबाकर,
पीड़ित की पीड़ा बढ़ाकर,
जाति-धरम को लडाकर,
कुरीतियों को बढ़ाकर भी,
वो अभी जिन्दा है।

नारी की अस्मिता को,
बुजुर्गों के स्वाभिमान को,
नौनिहालों की जान को,
कदमों से रौंद कर भी,
वो अभी जिंदा है।

उसे जिंदा देखकर भी,
मैं अभी जिंदा हूँ।
यह सोच सोच मैं शर्मिंदा हूँ
जी हाँ! मैं शर्मिंदा हूँ।

अश्विनी राय ‘अरूण’

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