April 4, 2025

अंतस के आरेख
विषय : रीति रिवाज एवं परम्परा
दिनाँक : १८/०१/२०२०

रीति रिवाज स्वयं में ऐसी परंपराएं हैं, जो परिवार, समाज अथवा देश में पीढ़ियों से चलते आ रहे हैं। मुख्यतः इनका संबंध प्रतिदिन के कार्यों पर अथवा उनसे जुड़ी घटनाओ से ही होता है। वैसे इन्हें हम अपने धर्म और त्योहारो का भी हिस्सा मान सकते हैं।

दूसरी ओर परंपराएं हैं, जो हमारी सामाजिक विरासत हैं। मगर देखा जाए तो परम्परा सामाजिक कम व्यक्तिगत और पारिवारिक ज्यादा जान पड़ता है। देखा जाएं तो परम्परा का अपना स्वाभाविक गुण है, और वह यह है की अपने स्वभाव को बिखरे बगैर वह स्वयं को जारी रखते हुए प्राचीन उपलब्धियों को आगे और आगे तक ले जाने के प्रयास में सदा रहता है। मगर कभी कभी सब तरह से सही होने पर भी परम्परा समान रूप में नहीं रह पातीं है, वह वक्त के साथ सामाजिक विरासत का रूप लेती जाती हैं। रीति रिवाजों के माध्यम से सरलता पूर्वक चली यह परम्परा सामाजिक विरासत के नाम पर सहेजे जाने योग्य हो जाती हैं यानी लुप्त होने के कगार पर आ जाती हैं।

ज्ञानियों के अनुसार परम्परा का शाब्दिक अर्थ है, ‘बिना व्यवधान के शृंखला रूप में जारी रहना’। परम्परा-प्रणाली में किसी विषय या उपविषय का ज्ञान बिना किसी परिवर्तन के एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ियों में संचारित होता रहता है। उदाहरण के लिए, भागवत पुराण में वेदों का वर्गीकरण और परम्परा द्वारा इसके हस्तान्तरण का वर्णन है। यहां ज्ञान के विषय आध्यात्मिक, कलात्मक (संगीत, नृत्य), अथवा शैक्षणिक कुछ भी हो सकते हैं। उसी तरह भारत की संस्कृति बहुआयामी है जिसमें यहाँ का महान इतिहास, भौगोलिक स्वरूप और पुरातन सिन्धु घाटी की सभ्यता, जो आगे चलकर वैदिक युग में विकसित हुई, इसके साथ ही पड़ोसी देशों के रीति रिवाज़, परम्परा और विचारों का भी इसमें समावेश है। पिछली पाँच सहस्राब्दियों से अधिक समय से भारत के रीति-रिवाज़, भाषाएँ, प्रथाएँ और परंपराएँ इसके एक-दूसरे से परस्पर संबंधों में महान विविधताओं का एक अद्वितीय उदाहरण देती हैं। भारत कई धार्मिक प्रणालियों, जैसे कि हिन्दू धर्म, जैन धर्म, बौद्ध धर्म और सिख धर्म जैसे धर्मों का जनक है। इस मिश्रण से भारत में उत्पन्न हुए विभिन्न धर्म और परम्पराओं ने विश्व के अलग-अलग हिस्सों को भी बहुत प्रभावित किया है, अब भी कर रहा।

उपरोक्त परिभाषाओं से यह स्पष्ट है कि परम्परा सामाजिक विरासत का वह अभौतिक अंग है जो हमारे व्यवहार के स्वीकार्य मानको की द्योतक है, और जो निरन्तर पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती रहती है।

अश्विनी राय ‘अरूण’

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