April 6, 2025

धीरूभाई अंबानी बनाम बॉम्बे डाइंग

धीरूभाई अंबानी बनाम बॉम्बे डाइंग के विवाद के बाद हम अपने आलेख को आगे बढ़ाते हैं…

धीरूभाई अंबानी अपनी वसीयत लिखकर नहीं गए थे, अतः २००२ में उनकी मृत्यु हुई तो कंपनियों के बंटवारे को लेकर दोनों भाइयों में विवाद हो गया। उस वक़्त रिलायंस इंडस्ट्रीज (आरआईएल) का सालाना टर्नओवर अस्सी हज़ार करोड़ के ऊपर था। इस अस्सी हजार करोड़ में अंबानी परिवार की हिस्सेदारी लगभग ४७ फीसदी की थी। इस कम्पनी में मुकेश अंबानी चेयरमैन थे और अनिल अंबानी वाइस चेयरमैन। लेकिन देखा जाए तो अनिल के पास कंपनी में ना के बराबर अधिकार थे। जानकारों के अनुसार उस वक़्त मुकेश ने अनिल को कंपनी बोर्ड से बाहर करने का प्लान भी बनाया था।

धीरूभाई की पत्नी कोकिलाबेन अपने पति की मृत्यु के आघात से उबर भी नहीं पायी थीं कि दोनों भाई अधिकार के लिए आपस में लड़ पड़े। कंपनी के गवर्निंग बोर्ड में मुकेश अंबानी की तूती बोलती थी और अंदरखाने की जो खबरें चल रही थीं कि उनके मुताबिक अनिल को कुछ भी मिलने वाला नहीं था। मां कोकिलाबेन दुविधा में पड़ गईं कि किसके साथ खड़ी हों। उन्होंने बंटवारे का रास्ता अपनाया। आईसीआईसीआई बैंक के सीईओ केवी कामथ, धीरूभाई के जिगरी दोस्त थे, वे और तत्कालीन पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवड़ा ने भी इसमें अहम भूमिका निभायी।

केवी कामथ ने एक रास्ता सुझाया था कि आरआईएल और आईपीसीएल का विलय करके एक नई कंपनी बनायी जाए और फिर उसे दो हिस्सों में करके दोनों भाइयों में बराबर बराबर बांट दिया जाए। लेकिन मुकेश अंबानी ने साफ मना कर दिया, लिहाज़ा आरआईएल और आईपीसीएल मुकेश के हिस्से में आईं। रिलायंस इन्फोकॉम (कम्युनिकेशन), रिलायंस कैपिटल और रिलायंस एनर्जी की कमान अनिल अंबानी को मिला।

यहीं से दोनों भाइयों के रास्ते अलग-अलग हो गए। स्टॉक मार्केट और निवेशकों में काफ़ी चिन्ता की बात थी। किसी ने इसे नुकसानदायक कहा तो किसी ने फ़ायदेमंद। इस समझौते में एक अहम शर्त थी कि दोनों भाई १० साल तक एक-दूसरे के कारोबारी क्षेत्र में नहीं उतरेंगे।

कहते हैं कि मां कोकिलाबेन ने समझौते के तहत मुकेश को इस बात के लिए राज़ी किया था कि आरआईएल अनिल अंबानी की कंपनी, रिलायंस एनर्जी, को बाज़ार भाव से कम कीमत पर गैस की आपूर्ति करेगी। लेकिन मुकेश अंबानी ने ऐसा करने से मना कर दिया और अनिल इस मामले को कोर्ट में ले गए। इन दिनों यह चर्चा गर्म थी कि पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवड़ा ने ऐसा नहीं होने दिया था। अनिल ने तब देश के तकरीबन हर बड़े अखबार में अपना पक्ष रखा। उनका कहना था कि सरकार और मुकेश अंबानी मिलकर उन्हें ख़त्म करने की कोशिश कर रहे हैं।

अनिल अंबानी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर भी बीच-बचाव करने की गुहार लगाई। लेकिन प्रधानमंत्री कार्यालय से इन्हें नाउम्मीदी ही हाथ लगी। उधर, तत्कालीन वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी दोनों भाइयों से सुलह कराने को कहा तो दोनों ने ही इसे नकार दिया। दरअसल, धीरूभाई अंबानी को बिजनेस किंग बनने में कुछ हद तक योगदान प्रणव मुखर्जी का भी था और फिर दोनों भाइयों के झगड़े से निवेशकों का भारी नुकसान भी हो रहा था।

२००८ के साल में मुकेश अंबानी ने न्यूयॉर्क टाइम्स को एक इंटरव्यू दिया जिसमें उन्होंने अनिल अंबानी पर यह इल्ज़ाम लगाया था कि बंटवारे से पहले अनिल ने कुछ जासूसों की मदद से आरआईएल की मुखबिरी करवाई थी। अब इस बात ने आग की तरह जोर पकड़ लिया। झगड़ा इतना बढ़ा गया कि अनिल अंबानी ने बड़े भाई पर दस हज़ार करोड़ का मानहानि का मुकदमा ठोक दिया।

इसके साथ ही शुरू हुआ नौटंकी ऐसा दौर जब दोनों भाई एक-दूसरे से बुरी तरह होड़ करने लगे थे। और यह होड़ मिडिल क्लास मानसिकता की तरह अपनी संपत्ति के प्रदर्शन तक भी पहुंच गई। इससे यह साफ झलक रहा था कि उच्च मानसिकता वाले घराने में जन्म लेने की मानसिकता और नया अमीर होने की मानसिकता एक समान नहीं हो सकती। मुकेश अंबानी ने अपनी पत्नी के लिए पांच करोड़ डॉलर का एक हवाई जहाज़ खरीदा और जिसका ख़ूब प्रचार भी कराया। कुछ दिनों बाद खबर आई कि अनिल ने भी अपनी पत्नी टीना अंबानी को आठ करोड़ डॉलर का एक यॉट यानी समुद्री नाव गिफ्ट किया है। इन्हीं दिनों में मुकेश अंबानी ने अपने नए निवास ‘एंटीलिया’ का निर्माण भी शुरू करवा दिया।

इस सबके बीच दोनों भाई स्टॉक मार्केट में आये दिन ख़बर बनाने लगे। रिलायंस कम्युनिकेशंस की माली हालत बेहद ख़राब थी और कंपनी के पास नेटवर्क का विस्तार करने के पैसे भी नहीं थे, एयरटेल और अन्य कंपनियां उससे कहीं आगे निकल चुकी थीं। लेकिन हैरानी की बात थी कि रिलायंस कम्युनिकेशंस का शेयर दिनों-दिन बढ़ता जा रहा था। कंपनी का मार्केट कैपिटलाइजेशन एक लाख ६५ हज़ार करोड़ रुपये तक पहुंच गया था। उन दिनों यानी वर्ष २००८ में एक शेयर का भाव ७०० रुपये के आसपास घूम रहा था। दूसरी ओर अनिल गैस क़रार वाले मुद्दे को भी बॉम्बे हाईकोर्ट में जीत गए।

लगातार हर मोर्चे पर हारने वाले मुकेश ने गैस क़रार वाले मसले को सुप्रीम कोर्ट ले गए, जहां उन्हें राहत मिली और अनिल अंबानी यह केस हार गए। बाद में उन्होंने मानहानि का मुकद्दमा भी वापस ले लिया।

दांव पेंच…

बात वर्ष २००८ के आसपास की है, अनिल अंबानी रिलायंस कम्युनिकेशंस के साथ दक्षिण अफ्रीका की टेलिकॉम कंपनी ‘एमटीएन’ के साथ विलय करना चाहते थे, जो नहीं हो सका। अगर ऐसा हो जाता तो नतीजे में बनने वाली कंपनी दुनिया की सबसे बड़ी टेलिकॉम कंपनियों में शुमार हो जाती। जानकारों के अनुसार एमटीएन में दक्षिण अफ़्रीकी सरकार के कुछ बड़े लोगों की भागीदारी थी। डील तकरीबन फाइनल स्टेज में थी और अनिल अंबानी भी निश्चिंत थे कि तभी नजाने ऐसा क्या हुआ एमटीएन ने एकाएक करार करने से मना कर दिया। पक्की तौर पर तो नहीं कह सकता लेकिन कहने वालों के अनुसार मुकेश अंबानी ने ही रिलायंस कम्युनिकेशंस के अंदरूनी हालात से एमटीएन को अवगत कराया था।

अब देखिए इसके पीछे की सच्चाई, दरअसल बात यह थी कि उस वक़्त टेलिकॉम में विलय को लेकर कोई पक्की नीति तो नहीं थी और दोनों भाइयों के बीच हुए करार के तहत रिलायंस कम्युनिकेशंस को बेचने की सूरत में इसे ख़रीदने का पहला अधिकार मुकेश अंबानी का था। और जोकि पहले से ही टेलिकॉम सेक्टर मुकेश का ड्रीम प्रोजक्ट था, (और जिओ के रूप में आज देखा भी जा रहा है।) जब रिलायंस इन्फ़ोकॉम की शुरुआत हुई थी तो अनिल अंबानी को उद्घाटन के मौके पर बुलाया भी नहीं गया था।

साल २०१० के मई महीने की बात है, एक दिन ख़बर आई कि दोनों भाइयों के बीच दस साल के लिए एक-दूसरे के कारोबारी क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा न करने वाला क़रार, जिसे उनकी मां ने करवाया था एकाएक टूट गया। कॉर्पोरेट जगत ने तो इसे दोनों भाइयों के लिए अच्छा माना। इसे सुलह की पहली पहल माना गया। लेकिन सच्चाई यह थी कि यह सुलह से ज़्यादा अनिल अंबानी की मजबूरी थी। टेलिकॉम में वे कुछ ख़ास नहीं कर पा रहे थे और उन पर क़र्ज़ बढता ही जा रहा था। चर्चाएं होने लगी थीं कि अनिल टेलिकॉम क्षेत्र से निकलना चाहते हैं। उधर, मुकेश अंबानी नए क्षेत्रों में हाथ आज़माना चाहते थे। जैसा ऊपर जिक्र कहा गया है, टेलिकॉम मुकेश का ड्रीम प्रोजक्ट था। वे हर हालत में इसमें आना चाहते थे। उन्होंने ऐसा किया भी। मुकेश अंबानी के टेलिकॉम में आने के बाद से अन्य टेलिकॉम कंपनियों के पसीने छूट गए, सबसे खराब हालत तो रिलायंस कम्युनिकेशंस की हुई। कंपनी पर ताला लग गया। इसका भूक्तभोगी स्वयं मै भी हूं, क्यूंकि मैं बक्सर जिले का डिस्ट्रीब्यूटर था और इसमें कितने पैसे मेरे डूब गए इसे जाने दीजिए। पूरे भारत के डिस्ट्रीब्यूटर्स के पांच हजार करोड़ रुपए डूब गए।

अब बात को समेटते हैं…

झगड़े की वजह से हुए बंटवारे को तकरीबन बारह वर्ष हो गए। इस दौरान मुकेश अंबानी एशिया के सबसे रईस व्यक्ति और विश्व के सर्वश्रेष्ठ पांच में भी पहुंच गए हैं। वहीं अनिल अंबानी आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। आज मुकेश अंबानी के लिए दुनिया भर में कहीं से भी सबसे सस्ती दर पर निवेश उपलब्ध है। कुछ दिनों पहले उन्होंने डॉलर बांड बेचकर बेहद कम ब्याज पर पैसा उठाया है। दूसरी तरफ, अनिल को ब्याज चुकाने के लाले पड़ गए हैं।

अगर सही बात माने तो और जो मुझे लगता है, इन सबके पीछे दोनों भाइयों का मूल स्वभाव है तो है ही जहां मुकेश परदे के पीछे रहकर काम करते हैं तो वहीं अनिल सुर्खियों में रहना पसंद करते रहे हैं। जानकारों की माने तो अनिल की समाजवादी पार्टी से नज़दीकी मुकेश को कभी भी पसंद नहीं थी। मुकेश किसी भी प्रोजेक्ट के पीछे अपना सब कुछ झोंक देते हैं, छोटी से छोटी बात पर उनकी नज़र रहती है। अनिल फाइनेंस के क्षेत्र में दिग्गज माने जाते हैं। बताया जाता है कि शुरुआत से ही इन दोनों भाइयों के मिजाज का फर्क साफ देखा जा सकता था। मुकेश अंबानी के बारे में कहा जाता है कि उन पर अपने पिता की तरह काम का भूत सवार रहता है, और जिद भी उन्हीं की तरह है। जिन्हें व्यावसाय के आगे मां और भाई भी कभी नजर नहीं आए। दूसरी तरफ, अनिल में एक किस्म की आभिजात्यता, अक्खड़पन, दिखावा और अति उत्साही स्वभाव नजर आता है।

सही मायनों में कोकिलाबेन आज दोराहे पर खड़ी नज़र आ रही हैं। एक तरफ जहां मुकेश को लेकर उन्हें संतुष्टि है तो दूसरी तरफ अनिल को लेकर चिंता। जहां एक तरफ मुकेश के हाथों में कोई पारस पत्थर लग गया है जबकि दूसरी ओर अनिल के सामने भविष्य का संकट खड़ा हो गया है। कोकिलाबेन मां हैं तो मंदिर में दोनों के लिए दुआ मांगती हैं। दोनों के उत्सव में शरीक होती हैं। आज धीरुभाई के रूप में वही तो हैं जो दोनों के बीच एक आख़िरी कड़ी हैं, जो जंग खाए जुड़ी हैं।

भविष्य पर एक नज़र…

फिलहाल मुकेश अंबानी ने छोटे भाई को जेल जाने से तो बचा लिया है। इसके साथ ही दोनों के बीच की दरार भी कुछ हद तक भरती दिखी है। लेकिन अनिल अंबानी ने अति उत्साह में जो कई मोर्चे खोल रखे थे, मुश्किलें उन सभी मोर्चों पर आज खड़ी हैं। देखना दिलचस्प होगा कि मुकेश अंबानी आगे किसी ऐसे मौके पर क्या करते हैं?? अनिल अंबानी को मैराथन दौड़ने का शौक है, लेकिन कारोबार की मैराथन में फिलहाल तो मुकेश अंबानी उनसे मीलों आगे जा चुके हैं।

वैसे अब बाकी आगे के लेख में भविष्य पर नजर।

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