मुंशी प्रेमचंद का ‘गोदान’: कृषक जीवन का महाकाव्य या सामाजिक विद्वेष की सुनियोजित पटकथा?
‘गोदान’ को केवल होरी की बेबसी की कहानी के रूप में परोसा गया, लेकिन इसके पीछे का वैचारिक ताना-बाना अत्यंत कुटिल है। प्रेमचंद यहाँ केवल एक किसान की त्रासदी नहीं दिखा रहे, बल्कि सनातन समाज की हर व्यवस्था, परंपरा और संबंध को ‘आसुरी’ और ‘अपराधी’ सिद्ध करने का प्रायोजित कुचक्र रच रहे हैं।
१. होरी: किसान या आत्मसम्मान-हीन बलि का बकरा?
प्रेमचंद ने होरी का चरित्र इस तरह गढ़ा है कि वह दया का पात्र तो लगता है, लेकिन उसका कोई आत्मसम्मान या धर्म-विवेक नहीं है।
पोस्टमार्टम: होरी की पूरी त्रासदी का आधार क्या है? उसकी गाय प्राप्त करने की सनक और उसके बाद की अंधाधुंध लाचारी। प्रेमचंद पूरे उपन्यास में होरी को इतना कायर, दब्बू और दिशाहीन दिखाते हैं कि भारतीय किसान की स्वाभाविक वीरता, पुरुषार्थ और श्रम-गौरव का पूरी तरह लोप हो जाता है। किसान को एक ऐसे ‘मूक पशु’ की तरह प्रस्तुत किया गया है जो केवल पिटने, ठगे जाने और अंत में मरने के लिए ही बना है।
२. मातादीन-सिलिया प्रसंग: नफरत और घृणा का ‘चरम प्रतिरोध’
प्रेमचंद का सबसे नग्न और विभत्स एजेंडा ‘मातादीन और सिलिया’ के प्रसंग में दिखाई देता है।
प्रेमचंद का प्रायोजित प्लॉट: ब्राह्मण पंडित दातादीन का बेटा मातादीन, चमारिन सिलिया से संबंध रखता है। प्रेमचंद को यहाँ वर्ग और जातिगत नफरत का ऐसा तड़का लगाना था जो सनातन समाज के ताने-बाने को हमेशा के लिए ज़हरीला कर दे।
प्रतिरोध का प्रगतिशील सिद्धांत: जब सिलिया के घरवाले मातादीन को सबक सिखाने आते हैं, तो वे क्या करते हैं? वे मातादीन के मुँह में मरे हुए जानवर की हड्डी चांप देते हैं और उसका धर्म भ्रष्ट कर देते हैं!
पोस्टमार्टम: प्रेमचंद इस कृत्य को एक ‘वैचारिक न्याय’ और ‘सामाजिक प्रतिरोध’ का रूप देकर पेश करते हैं। क्या यही प्रगतिशील दृष्टि थी? किसी के मुँह में हड्डी ठूँसना सुधार है या समाज में कभी न मिटने वाली नफ़रत का ज़हर घोलना? प्रेमचंद यहाँ यह स्थापित कर रहे थे कि प्रतिरोध का रास्ता केवल घृणा, अपवित्रता और प्रतिशोध से होकर ही जाता है।
३. शोषकों की एकतरफा सूची (Demonization of Social Classes)
‘ठाकुर का कुआँ’ की ही तरह, ‘गोदान’ में भी उच्च जातियों, महाजनों और धर्म-ध्वजधारियों का चरित्र-चित्रण १००% नकारात्मक (Black) है:
पंडित दातादीन: अति-लोभी, निर्दयी, परजीवी और अधर्मी।
राय साहब (ज़मीनदार): ढोंगी, अवसरवादी और शोषक।
नोखेराम और पटवारी: छल और प्रपंच की प्रतिमूर्ति।
पोस्टमार्टम: क्या ग्रामीण भारत में कोई भी ब्राह्मण, ज़मीनदार या महाजन सहृदय, धर्मपरायण या दयालु नहीं था? प्रेमचंद ने जानबूझकर समाज के एक पूरे वर्ग को ‘राक्षस’ बना दिया ताकि पाठक के मन में उनके प्रति केवल घृणा उपजे। यह यथार्थवाद नहीं, बल्कि एकतरफा कैरेक्टर असैसिनेशन (Character Assassination) है।
४. शहरी पात्र और ‘साम्यवाद’ की ज़बरदस्ती एंट्री
गोदान में केवल गाँव की कहानी नहीं है, उसमें शहर का एक समानांतर प्लॉट चलता है—प्रोफेसर मेहता, मालती, मिर्ज़ा और ओंकारनाथ का।
पोस्टमार्टम: शहर के इन पात्रों का गाँव की त्रासदी से कोई सीधा लेना-देना नहीं है। इन्हें केवल इसलिए घुसाया गया है ताकि प्रेमचंद अपने ‘मार्क्सवादी/साम्यवादी भाषण’ और नारी-मुक्ति के पश्चिमी एजेंडे को प्रोफेसर मेहता के मुँह से बुलवा सकें। मालती का चरित्र गढ़कर उन्होंने भारतीय पारिवारिक मूल्यों और विवाह संस्था पर प्रहार किया।
५. अंत का संदेश: निराशा, मृत्यु और व्यवस्था से घृणा
उपन्यास का अंत होरी की मृत्यु और धनिया द्वारा अपनी आखिरी जमापूँजी (बीस आने) का ‘गोदान’ करने के साथ होता है।
पोस्टमार्टम: प्रेमचंद कहानी को किसी समाधान, आशा या आत्म-बल की ओर नहीं ले जाते। अंत इतना त्रासद और वीभत्स बनाया जाता है कि पाठक के मन में पूरी सामाजिक व्यवस्था, धर्म और परंपरा के प्रति केवल अविश्वास, आक्रोश और कुँठा बचे।
निष्कर्ष (The Bottom Line)
‘गोदान’ कोई स्वाभाविक उपन्यास नहीं, बल्कि प्रगतिशील लेखक संघ (PWA) के उस ‘मैनिफेस्टो’ का क्रियान्वयन है जिसका उद्देश्य था:
भारतीय किसान को असहाय और लाचार सिद्ध करना।
समाज को जातियों के नाम पर बाँटना और उनके बीच हिंसक नफ़रत को सही ठहराना (जैसे मातादीन के मुँह में हड्डी ठूँसना)।
धर्म और परंपरा को शोषण का पर्याय बनाकर जनता को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से काटना।
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