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हरिपद रामकृष्ण पिल्लई: कथकली के ओजस्वी स्वर और परंपरा के संवाहक

​लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’

 

​भारतीय शास्त्रीय नृत्य के इतिहास में केरल की ‘कथकली’ अपनी विशिष्ट वेशभूषा और भाव-भंगिमाओं के लिए विश्वविख्यात है। इस कला को अपने पसीने और साधना से सींचने वाले महान कलाकारों में हरिपद रामकृष्ण पिल्लई का नाम अत्यंत श्रद्धा के साथ लिया जाता है। १७ अप्रैल, १९२६ को केरल के हरिपद (अल्लेप्पी) में एक कलाकार परिवार में जन्मे रामकृष्ण जी ने कथकली को केवल नृत्य नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक तपस्या के रूप में जीया।

 

​संस्कारों की थाती और प्रारंभिक शिक्षा

​रामकृष्ण पिल्लई का बचपन थलाथोट्टा शिव मंदिर के पवित्र प्रांगण में अपने पिता शंकर पिल्लई और माता देवकी अम्मा के संरक्षण में बीता। कला उनके रक्त में थी। उन्होंने कथकली की प्रारंभिक शिक्षा उस समय के दिग्गज आचार्यों—ठाकाझी रमनपिल्लई, चेन्निथला कोचुपिलई पणिक्कर और कुरीची कुंजन के मार्गदर्शन में प्राप्त की।

 

​गुरु चेंगन्नूर का प्रिय शिष्य और ‘छल्ली आट्टम’ की दक्षता

​उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर महान गुरु चेंगन्नूर ने उन्हें अपना शिष्य बनाया। रामकृष्ण जी की विशेषज्ञता ‘छल्ली आट्टम’ (कथकली का एक विशिष्ट लघु नृत्य खंड) में अतुलनीय थी। गुरु चेंगन्नूर उन्हें अपनी लगभग सभी प्रमुख प्रस्तुतियों में प्रमुख भूमिकाओं के लिए साथ रखते थे, जो किसी भी कलाकार के लिए सबसे बड़ा सम्मान है।

 

​संस्थान की स्थापना और कला का प्रसार

​रामकृष्ण पिल्लई केवल स्वयं प्रदर्शन करने तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने भावी पीढ़ियों को तैयार करने का बीड़ा उठाया। उन्होंने दक्षिण केरल के छात्रों को प्रशिक्षित करने के लिए हरिपद में ‘कथकली ट्रूप एंड इंस्टीट्यूट’ की शुरुआत की। आज भी उनके द्वारा रोपित यह बीज कई कलाकारों के रूप में फल-फूल रहा है।

 

​लोकप्रिय संस्कृति में सम्मान

​उनकी ख्याति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि प्रसिद्ध मलयालम फिल्मकार और गीतकार श्रीकुमार थंपी ने अपने एक लोकप्रिय गीत ‘उथारा स्वयंवरम’ में हरिपद रामकृष्ण पिल्लई के नाम का सादर उल्लेख किया है। यह किसी शास्त्रीय कलाकार के प्रति जनमानस और सिनेमाई जगत की अनूठी श्रद्धांजलि है।

 

​अश्विनी राय ‘अरुण’ का विचार

​मेरी दृष्टि में हरिपद रामकृष्ण पिल्लई वह कलाकार थे जिन्होंने शास्त्रीय मर्यादाओं को अक्षुण्ण रखते हुए उसे आधुनिक समय तक पहुँचाया। शिव मंदिर की शांत छाया से शुरू हुआ उनका सफर अंतरराष्ट्रीय ख्याति तक पहुँचा, लेकिन वे सदैव अपनी जड़ों से जुड़े रहे। उनका जीवन सिखाता है कि कला जब साधना बन जाती है, तो वह कालजयी हो जाती है।

​शास्त्रीय नृत्य के उस देदीप्यमान नक्षत्र को शत-शत नमन!

 

 

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