April 4, 2025

प्राची के वातायन पर चढ़
प्रात किरन ने गाया,
लहर-लहर ने ली अँगड़ाई
बंद कमल खिल आया,
मेरी मुस्कानों से मेरा
मुख न हुआ उजियाला,
आशा के मैं क्या तुमको राग सुनाऊँ।
क्या गाऊँ जो मैं तेरे मन को भा जाऊँ।

यह कविता सेंट्रल बुक ड़िपो, इलाहाबाद द्वारा प्रकाशित ‘प्रणय पत्रिका’ नामक कविता संग्रह से ली गई है। जिसके रचनाकार श्री हरिवंश राय बच्चन जी हैं। बच्चन जी का जन्म २७ नवम्बर, १९०७ को इलाहाबाद के रहने वाले एक कायस्थ परिवार के मुखिया श्री प्रताप नारायण श्रीवास्तव जी तथा श्रीमती सरस्वती देवी जी के यहां हुआ था। इस तरह इनका नाम हरिवंश राय श्रीवास्तव था, मगर इनको बाल्यकाल में ‘बच्चन’ कह कर पुकारा जाता था। जिसका तात्पर्य होता है ‘बच्चा’ या ‘संतान’। अतः बाद में ये इसी नाम से प्रसिद्ध हो गए। जैसा की हमारे यहां उर्दू की पढ़ाई पर विषेश तौर जोर दिया जाता था, इसलिए उन्होंने कायस्थ पाठशाला में पहले उर्दू और फिर हिन्दी की शिक्षा प्राप्त की। प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद, उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में एमए और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य के विख्यात कवि डब्लूबी यीट्स की कविताओं पर शोध कर पीएच.डी. पूरी की। वर्ष १९२६ में मात्र १९ वर्ष की आयु में उनका विवाह श्यामा हुआ, जो उस समय मात्र १४ वर्ष की थीं। परंतु वर्ष १९३६ में टीबी की वजह से श्यामा की मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु पाँच वर्ष पश्चात् यानी वर्ष १९४१ में श्रीबच्चन ने एक पंजाबन तेजी सूरी से विवाह किया जो रंगमंच तथा गायन से जुड़ी हुई थीं। इसी समय उन्होंने ‘नीड़ का निर्माण फिर’ जैसी कविताओं की रचना की। श्रीमती तेजी बच्चन से उन्हें महान तेजस्वी अभिनेता पुत्र श्री अमिताभ बच्चन प्राप्त हुए। १८ जनवरी, २००३ को वे इस संसार को छोड़कर चिरनिद्रा में लीन हो गए।

प्रमुख कृतियाँ…

१. कविता संग्रह :

तेरा हार, मधुशाला, मधुबाला, मधुकलश, आत्म परिचय, निशा निमंत्रण, एकांत संगीत, आकुल अंतर, सतरंगिनी, हलाहल, बंगाल का काल, खादी के फूल, सूत की माला, मिलन यामिनी, प्रणय पत्रिका, धार के इधर-उधर, आरती और अंगारे, बुद्ध और नाचघर, त्रिभंगिमा, चार खेमे चौंसठ खूंटे, दो चट्टानें, बहुत दिन बीते, कटती प्रतिमाओं की आवाज़, उभरते प्रतिमानों के रूप, जाल समेटा, नई से नई-पुरानी से पुरानी।

२. आत्मकथा :

क्या भूलूँ क्या याद करूँ, नीड़ का निर्माण फिर, बसेरे से दूर, दशद्वार से सोपान तक।

३. डायरी : प्रवास की डायरी।

४. अनुवाद :

हैमलेट, जनगीता, मैकबेथ, ओथेलो, उमर खय्याम की रुबाइयाँ, चौंसठ रूसी कविताएँ।

५. विविध :

बच्चन के साथ क्षण भर, खय्याम की मधुशाला, सोपान, कवियों में सौम्य संत: पंत, आज के लोकप्रिय हिन्दी कवि: सुमित्रानंदन पंत, आधुनिक कवि, नेहरू: राजनैतिक जीवनचरित, नये पुराने झरोखे, अभिनव सोपान, नागर गीता, बच्चन के लोकप्रिय गीत, डब्लू बी यीट्स एंड अकल्टिज़म, मरकत द्वीप का स्वर, भाषा अपनी भाव पराये, पंत के सौ पत्र, किंग लियर, टूटी छूटी कड़ियाँ।

पुरस्कार व सम्मान…

वर्ष १९६८ में ‘दो चट्टानें को’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

वर्ष १९६८ में ही उन्हें सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार तथा एफ्रो एशियाई सम्मेलन के कमल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

बिड़ला फाउण्डेशन ने उनकी आत्मकथा के लिए उन्हें सरस्वती सम्मान से सम्मानित किया।

वर्ष १९७६ में भारत सरकार द्वारा साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।

श्री बच्चन जी से संबंधित पुस्तकें…

श्री हरिवंश राय बच्चन जी पर अनेकों पुस्तकें लिखी गई हैं। साथ ही उनपर शोध भी हुए हैं, जिनमें आलोचना एवं रचनावली शामिल हैं। बच्चन रचनावली के नौ खण्ड हैं। इसका संपादन अजित कुमार ने किया है। अन्य पुस्तकें हैं : हरिवंशराय बच्चन (बिशन टण्डन), गुरुवर बच्चन से दूर (अजितकुमार) आदि।

साहित्यिक विशेषताएं :

श्री हरिवंश राय बच्चन जी ने हालावाद का प्रवर्तन कर साहित्य को एक नया मोड़ दिया। शुरुवाती दिनों में वे एक कहानीकार के रूप में अपनी प्रतिष्ठा प्राप्त की। लेकिन बाद में उन्होंने अन्य सभी विधाओं मैं लिखा। इनके साहित्य की प्रमुख विशेषताएं हैं…

१. सौंदर्य प्रेमी बच्चन :

श्री हरिवंश राय बच्चन जी ने अपनी रचनाओं में प्रेम और सौंदर्य का ऐसा अनूठा संगम किया है। इसीलिए उन्हें हालावाद के प्रवर्तक कवि माना जाता है। उन्होंने साहित्य में प्रेम और मस्ती भरकर प्रेम और सौंदर्य को जीवन का अभिन्न अंग मानकर उसका चित्रण किया है। उनके अनुसार,

इस पार प्रिए मधु है तुम हो
उस पार न जाने क्या होगा

बच्चन जी ने अपने काव्य में ही नहीं अपितु साहित्य में भी प्रेम और सौंदर्य का सुंदर प्रयोग किया है। अगर उनका वश चले तो वे इस संवेदनहीन दुनिया को भी प्रेम रस में डुबो दें। वह प्रेम के संदेश कहते हैं,

मैं दीवानों का वेश लिए फिरता हूं,
मैं मादकता निषेश लिए फिरता हूं।
जिसको सुनकर जग झूमें, झुके, लहराए,
मैं मस्ती का संदेश लिए फिरता हूं।।

२. मानवतावादी बच्चन :

श्री बच्चन, सिर्फ प्रेम और मस्ती में डूबे कवि नहीं थे वरन उनके साहित्य में ऐसी विराट भावना के भी दर्शन होते हैं, जिसे मानवता कहते हैं। साहित्य रचना में उन्होंने मानव के प्रति प्रेम की भावना को प्रमुखता से अभिव्यक्त किया है।

३. व्यक्तिवादी बच्चन :

उनके साहित्य में व्यक्तिगत भावना सर्वत्र झलकती है। उनकी रचना में सामाजिक भावना साफ झलकती है। एक कवि के नजरिए से अगर आप देखें तो उसके सुख-दुख का चित्रण, समाज का ही चित्रण होता है। बच्चन जी ने व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर ही जीवन और संसार को समझा और परखा है। उनके अनुसार,

मैं जग जीवन का भार लिए फिरता हूं,
फिर भी जीवन में प्यार लिए फिरता हूं।
कर दिया किसी ने झंकृत जिनको छूकर,
मैं सांसो के दो तार लिए फिरता हूं।

४. रहस्यवादी बच्चन :

प्रेम और सौंदर्य के वाहक और हालावाद के प्रयोगधर्मी, श्री बच्चन जी रहस्यवादी भी थे। उन्होंने जीवन को एक प्रकार का मधुकलश और दुनिया को मधुशाला की श्रेणी में रखा है। वहीं उन्होंने कल्पना को साकी तथा कविता को एक प्याला की उपमा दी है। यहां हम उनमें छायावादी कवियों की भांति उनके काव्य में भी रहस्यवाद को भी देखते हैं।

५. सामाजिक बच्चन :

वैसे तो सभी कवि सामाजिक नहीं होते, उनकी चेतना कहीं दूर सूरज से नज़रें मिलाने में रहती हैं। वहीं बच्चन जी सामाजिकता से ओतप्रोत कवि हैं। उनके काव्य में समाज की यथार्थ अभिव्यक्ति हुई है।

अपनी बात…

श्री हरिवंश राय बच्चन जी की काव्य भाषा खड़ी बोली में है। साथ ही संस्कृत की तत्सम शब्दावली का उन्होंने अधिकता से प्रयोग किया है। उन्होंने तद्भव शब्दावली से उर्दू, फारसी, अंग्रेजी आदि भाषाओं के शब्दों का भी प्रयोग करने में संकोच नहीं किया है। उनके प्रांजल शैली के प्रयोग के कारण ही इनके साहित्य लोकप्रिय हुए हैं। साथ ही उन्होंने गीति शैली का भी प्रयोग किया है। जैसा कि हमने ऊपर बच्चन जी के साहित्य में प्रेम, सौंदर्य और मस्ती के संगम की बात की है। उन्होंने उनमें शब्दालंकार तथा अर्थालंकार दोनों का सफल प्रयोग किया है। अलंकारों के प्रयोग से इनके साहित्य में और ज्यादा निखार आया है। इनके साहित्य में अनुप्रास, यमक, श्लेष, पद मैत्री, स्वर मैत्री, पुनरुक्ति प्रकाश, उपमा, रूपक, मानवीकरणआदि अलंकारों का सुंदर प्रयोग किया गया है।

हो जाय न पथ में रात कहीं,
मंजिल भी तो है दूर नहीं
यह सोच थका दिन का पंथी भी
धीरे धीरे चलता है
दिन जल्दी जल्दी ढलता है।

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