April 6, 2025

न हाथ एक शस्त्र हो,
न हाथ एक अस्त्र हो,
न अन्न वीर वस्त्र हो,
हटो नहीं, डरो नहीं, बढ़े चलो, बढ़े चलो ।

रहे समक्ष हिम-शिखर,
तुम्हारा प्रण उठे निखर,
भले ही जाए जन बिखर,
रुको नहीं, झुको नहीं, बढ़े चलो, बढ़े चलो ।

घटा घिरी अटूट हो,
अधर में कालकूट हो,
वही सुधा का घूंट हो,
जिये चलो, मरे चलो, बढ़े चलो, बढ़े चलो ।

गगन उगलता आग हो,
छिड़ा मरण का राग हो,
लहू का अपने फाग हो,
अड़ो वहीं, गड़ो वहीं, बढ़े चलो, बढ़े चलो ।

चलो नई मिसाल हो,
जलो नई मिसाल हो,
बढो़ नया कमाल हो,
झुको नही, रूको नही, बढ़े चलो, बढ़े चलो ।

अशेष रक्त तोल दो,
स्वतंत्रता का मोल दो,
कड़ी युगों की खोल दो,
डरो नही, मरो नहीं, बढ़े चलो, बढ़े चलो ।

आइए आज हम बात करते हैं, स्वतंत्रता आंदोलन युग के एक ऐसे विराट कवि के बारे में जिन्होंने जनता में राष्ट्रीय चेतना जागृति करने, उनमें देश-भक्ति की भावना भरने और नवयुवकों को देश के लिए बड़े से बड़े बलिदान के लिए प्रेरित करने में अपनी सारी शक्ति लगा दी। वैसे तो आप जान ही गए होंगे कि हम बात कर रहे हैं, वर्ष १९६९ में पद्मश्री उपाधि से सम्मानित राष्ट्रकवि पं. सोहनलाल द्विवेदी जी के बारे में, जो पूर्णत: राष्ट्र को समर्पित कवि थे। अब विस्तार पूर्वक…

परिचय…

सोहन लाल द्विवेदी जी का जन्म २२ फरवरी, १९०६ को उत्तरप्रदेश के फतेहपुर अंतर्गत बिन्दकी नामक गाँव में हुआ था। द्विवेदी जी ने हिन्दी में एम.ए. किया तथा संस्कृत का भी स्वअध्ययन किया। द्विवेदी जी कालांतर में हिन्दी के राष्ट्रीय कवि के रूप में प्रतिष्ठित हुए। राष्ट्रीयता से संबन्धित कविताएँ लिखने वालों में आपका स्थान मूर्धन्य है। आपने गांधीवाद के भावतत्व को वाणी देने का सार्थक प्रयास किया है तथा अहिंसात्मक क्रान्ति के विद्रोह व सुधारवाद को अत्यन्त सरल सबल और सफल ढंग से काव्य बनाकर ‘जन साहित्य’ बनाने के लिए उसे मर्मस्पर्शी और मनोरम बना दिया है।

चल पड़े जिधर दो डग, मग में
चल पड़े कोटि पग उसी ओर;
गड़ गई जिधर भी एक दृष्टि
गड़ गए कोटि दृग उसी ओर,

जिसके शिर पर निज हाथ धरा
उसके शिर- रक्षक कोटि हाथ
जिस पर निज मस्तक झुका दिया
झुक गए उसी पर कोटि माथ;

राष्ट्रकवि…

गाँधीवाद से प्रेरित उनकी यशस्वी रचनाएँ हिन्दी साहित्य की अनमोल निधि है। राष्ट्र धर्म उनके काव्य का मूल मंत्र है। राष्ट्र प्रेम से प्रेरित अपने ओजस्वी गीतों द्वारा जन-मानस में राष्ट्रीय चेतना जगाने में उन्हें जो लोकप्रियता मिली, उसी ने उन्हें जन सामान्य में ‘राष्ट्रकवि’ के रूप में प्रतिष्ठित किया।

यह भारतवर्ष हमारा है!
हमको प्राणों से प्यारा है!!
है यहाँ हिमालय खड़ा हुआ,
संतरी सरीखा अड़ा हुआ,
गंगा की निर्मल धारा है!
यह भारतवर्ष हमारा है!
क्या ही पहाड़ियाँ हैं न्यारी?
जिनमें सुंदर झरने जारी!
शोभा में सबसे न्यारा है!
यह भारतवर्ष हमारा है!

विद्यार्थी जीवन…

अपने विद्यार्थी जीवन से ही वे राष्ट्र प्रेम से ओतप्रोत थे। वर्ष १९३० में काशी विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में महात्मा गाँधी पधारे तो युवा कवि सोहन लाल ने खादी गीत से उनका अभिनंदन किया उनके गीत की इन पंक्तियों से उपस्थित जनसमूह रोमांचित हो उठा…

खादी के धागे-धागे में अपनेपन का अभिमान भरा।
माता का इनमें मान भरा,
अन्यायी का अपमान भरा।
खादी के रेशे-रेशे में,
अपने भाई का प्यार भरा।
माँ बहनों का सत्कार भरा,
बच्चों का मधुर दुलार भरा।
खादी में कितने दलितों के दग्ध की दाह छिपी।
कितनों की कसक कराह छिपी, कितनों की आहत आह छिपी।

यह खादी गीत जनता में इतना लोकप्रिय हुआ कि कुछ ही दिनों के देश भर में इसकी धूम मच गई। द्विवेदी जी गाँधीजी को अपनी प्रेरक-विभूति मानते थे। वर्ष १९४४ में गाँधीजी हीरक जयंती के अवसर पर उनके अभिनंदन हेतु जो गौरव ग्रन्थ प्रकाशित हुआ, उसके सम्पादन का श्रेय भी सोहन लाल द्विवेदी जी को ही प्राप्त है। यह उनकी एक चरम उपलब्धि थी। द्विवेदी जी ने अपनी राष्ट्रीय कविताओं में स्वतंत्रता आंदोलन के कर्णधार ‘युगावतार गाँधी’ जी की समग्र भावना से वंदना की है। उन्होंने अपनी प्रथम रचना भैरवी गाँधी जी को ही समर्पित की थी। उन्होंने गाँधी को महामानव का स्थान देकर उनके संदेश को अपने काव्य का मूल विषय बनाया और उसे जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास किया। खादी, अहिंसा और सत्याग्रह उनके काव्य का प्रेरक स्वर रहा। सोहन लाल द्विवेदी को ‘युगकवि’ कहा जाए तो अत्युक्ति न होगी।

वंदना के इन स्वरों में एक स्वर मेरा मिला लो।
राग में जब मत्त झूलो
तो कभी माँ को न भूलो,
अर्चना के रत्नकण में एक कण मेरा मिला लो।
जब हृदय का तार बोले,
शृंखला के बंद खोले;
हों जहाँ बलि शीश अगणित, एक शिर मेरा मिला लो।

प्रमुख कृतियां…

सोहन लाल द्विवेदी जी की रचनाएँ ओजपूर्ण एवं राष्ट्रीयता की परिचायक है। गांधीवाद को अभिव्यक्ति देने के लिए उन्होंने युगावतार, गांधी, खादी गीत, गाँवों में किसान, दांडीयात्रा, त्रिपुरी कांग्रेस, बढ़ो अभय जय जय जय, राष्ट्रीय निशान आदि शीर्ष से लोकप्रिय रचनाओं का सृजन किया है, इसके अतिरिक्त उन्होंने भारत देश, ध्वज, राष्ट्र प्रेम और राष्ट्र नेताओं के विषय की उत्तम कोटि की कविताएँ लिखी है। उन्होंने कई प्रयाण गीत लिखे हैं, जो प्रासयुक्त होने के कारण सामूहिक रूप से गाए जाते हैं।

१. भैरवी
२. पूजागीत सेवाग्राम
३. प्रभाती
४. युगाधार
५. कुणाल
६. चेतना
७. बाँसुरी
८.दूधबतासा।

अंत में…

राष्ट्रकवि सोहनलाल द्विवेदी जी का १ मार्च, १९८८ को स्वर्गवास हो गया।

प्रबल झंझावत में तू
बन अचल हिमवान रे मन।

हो बनी गम्भीर रजनी,
सूझती हो न अवनी,
ढल न अस्ताचल अतल में
बन सुवर्ण विहान रे मन।

उठ रही हो सिन्धु लहरी
हो न मिलती थाह गहरी
नील नीरधि का अकेला
बन सुभग जलयान रे मन।

कमल कलियाँ संकुचित हो,
रश्मियाँ भी बिछलती हो,
तू तुषार गुहा गहन में
बन मधुप की तान रे मन।

नोट : कई लोग नीचे दी गई रचना को हरिवंशराय बच्चन जी द्वारा रचित मानते हैं। लेकिन श्री अमिताभ बच्चन जी ने अपनी एक फेसबुक पोस्ट में स्पष्ट किया है कि यह रचना सोहनलाल द्विवेदी जी की है, उस पोस्ट की सच्चाई जो भी हो, इस पर हम दावा नहीं करते।

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

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