मैं समय हूँ: गंगापुत्र राही मासूम रज़ा और ‘महाभारत’ के संवादों की अमर दास्तान
”चोपड़ा साहिब… मैं महाभारत लिखूँगा। मैं गंगा का पुत्र हूँ। मुझसे ज़्यादा भारत की सभ्यता और संस्कृति के बारे में कौन जानता है!”
साल १९९० के दौरान ‘इंडिया टुडे’ पत्रिका को दिए एक ऐतिहासिक साक्षात्कार में जब उनसे हिंदू कट्टरपंथियों के विरोध के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने बड़े गहरे दर्द के साथ कहा था, ‘मुझे बहुत दुख हुआ… मैं हैरान था कि एक मुसलमान द्वारा पटकथा लेखन को लेकर इतना हंगामा क्यों किया जा रहा है, क्या मैं एक भारतीय नहीं हूँ?’
यह मार्मिक और कड़कड़ाती हुंकार थी आधुनिक भारतीय साहित्य के उस अनमोल रत्न की, जिसे दुनिया डॉ. राही मासूम रज़ा के नाम से जानती है। राही साहब शब्दों के वो जादूगर थे जिन्होंने धर्म और जाति की हर संकीर्ण दीवार को अपनी राष्ट्रीय और धर्मनिरपेक्ष सोच से हमेशा के लिए ढहा दिया।
गंगौली की माटी से गाजीपुर के गंगा किनारे तक का सफर
राही मासूम रज़ा का जन्म १ सितंबर १९२५ को उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के ऐतिहासिक गंगौली गाँव में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा गंगा के आंचल में बसे गाजीपुर शहर के एक सीधे-सादे मोहल्ले में हुई। गंगा की लहरों को निहारते हुए उनके भीतर भारतीय संस्कृति के प्रति अगाध प्रेम जागा। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) से उर्दू साहित्य में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की और वहीं अध्यापन भी किया। वे उर्दू और हिंदी दोनों भाषाओं के उतने ही बड़े विद्वान थे, जितने बड़े इस देश के राष्ट्रभक्त।
पेट की आग और मुंबई का साहित्यिक ठिकाना
जीवन के संघर्ष और पेट की आग उन्हें साल १९६८ में मायानगरी बम्बई (अब मुंबई) ले आई। मुंबई आकर वे अपनी साहित्यिक अभिलाषाओं को पंख देने के साथ-साथ फिल्मों के लिए भी लिखने लगे, जो धीरे-धीरे उनकी जीविका का मुख्य साधन बन गया। राही साहब एक बेहद स्पष्टतावादी और बेबाक व्यक्ति थे। अपने धर्मनिरपेक्ष, राष्ट्रवादी और मानवीय दृष्टिकोण के कारण वे फिल्म जगत और साहित्यिक गलियारों में अत्यन्त लोकप्रिय हो गए।
मुंबई में रहते हुए उन्होंने कई कालजयी कृतियों की रचना की, जिन्होंने हिंदी साहित्य का मस्तक ऊंचा किया:
आधा गाँव: यह उनका वो महा-उपन्यास है जो देश के विभाजन की त्रासदी और ग्रामीण अंचल के दर्द को हूबहू बयां करता है।
प्रमुख उपन्यास: ‘दिल एक सादा कागज़’, ‘ओस की बूँद’, और ‘हिम्मत जौनपुरी’ जैसे उपन्यासों के ज़रिए उन्होंने समाज के अंतर्द्वंद्व को कागज़ पर उकेरा।
शहीद हमीद की जीवनी: १९६५ के भारत-पाक युद्ध में अदम्य साहस दिखाते हुए वीरगति को प्राप्त हुए परमवीर चक्र विजेता वीर अब्दुल हमीद की जीवनी उन्होंने ‘छोटे आदमी की बड़ी कहानी’ नाम से लिखी।
इन गद्य कृतियों से पहले वे उर्दू में एक महाकाव्य ‘१८५७’ लिख चुके थे, जो बाद में हिंदी में ‘क्रांति कथा’ नाम से प्रकाशित हुआ। इसके अलावा उन्होंने अनगिनत खूबसूरत उर्दू नज़्में और गज़लें भी लिखीं।
‘महाभारत’ और ‘समय’ की वो अमर पुकार
राही साहब और बी.आर. चोपड़ा की ‘महाभारत’ से जुड़ा किस्सा तो भारतीय टेलीविजन के इतिहास का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट है। शुरुआत में जब प्रसिद्ध निर्माता बी.आर. चोपड़ा साहब ने राही साहब से इस महाकाव्य के टेलीविजन रूपांतरण के लिए संवाद लिखने की गुज़ारिश की, तो राही साहब ने समय की कमी का हवाला देते हुए इसे विनम्रता से ठुकरा दिया था।
लेकिन कहानी में मोड़ तब आया, जब समाज के कुछ तथाकथित ‘स्वयंभू संरक्षकों’ ने चोपड़ा साहब को खत लिखकर आपत्ति जताई कि—”क्या एक पौराणिक हिंदू महाकाव्य को लिखने के लिए आपको कोई हिंदू लेखक नहीं मिला? आप एक मुसलमान से महाभारत लिखवाएंगे?”
जब बी.आर. चोपड़ा ने यह बात राही साहब को बताई, तो इस धर्मनिरपेक्ष कवि का जमीर जाग उठा। उन्होंने चुनौती को स्वीकार करते हुए सीधे चोपड़ा साहब से कहा, “चोपड़ा साहिब, अब तो महाभारत मैं ही लिखूँगा। मैं गंगा का पुत्र हूँ और गंगा से बढ़कर इस भारत की संस्कृति को कौन समझ सकता है!”
संवाद जो इतिहास बन गए
राही साहब न केवल इस भव्य टीवी सीरियल से जुड़े, बल्कि उन्होंने महाभारत के ऐसे कालजयी और ओजस्वी संवाद लिखे जो आज भी भारत के घर-घर में गूंजते हैं। उन्होंने ‘महाभारत’ की शुरुआत किसी इंसानी पात्र से नहीं, बल्कि ‘समय’ (कालचक्र) के रूप में की। जब स्क्रीन पर चक्र घूमता था और पृष्ठभूमि से गंभीर आवाज़ आती थी—”मैं समय हूँ…”—तो दर्शक अपनी सुध-बुध खो बैठते थे। उनके लिखे संवादों में गीता का ज्ञान भी था और इंसानी रिश्तों की जटिलता भी।
निष्कर्ष: सदा अमर रहेगा यह गंगापुत्र
डॉ. राही मासूम रज़ा १५ मार्च १९९२ को इस नश्वर संसार को छोड़कर चले गए, लेकिन वे अपनी लेखनी, अपने उपन्यासों और ‘महाभारत’ के अमर संवादों के रूप में आज भी देश के हर कोने में जीवित हैं। राही साहब का जीवन और उनका साहित्य इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि कला का कोई मज़हब नहीं होता, और एक सच्चा भारतीय वही है जिसके दिल में देश की मिट्टी और संस्कृति के लिए अटूट सम्मान हो।
धन्यवाद!