सच्चे मित्रों से मिलन: एक अनकहा संस्मरण

​लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’

 

सोचा, बहुत दिन हो गए सबसे मिले हुए…

​अतः अथवा अंततः?

​निकल पड़े मिलने को। कहीं दूर नहीं जाना था, मगर मन में कुछ ऐसी उलझने थीं कि मिलन की प्यास लगातार बनी रही। पहले तो मित्रों से मिलते समय किसी भी तरह की कोई औपचारिकता नहीं निभानी पड़ती थी, मगर आज के इस ‘सभ्य समाज’ को यह कतई मंजूर नहीं कि कोई बिना औपचारिक व्यवहार के मिल ले; भले ही वे खुद कितनी भी कृत्रिमता में क्यों न जी रहे हों! आज के दौर में मित्र भी पद और पैसे के आधार पर संबंधों का मोल-तोल करने लगे हैं।

​इसीलिए, हमने भी अब अपनी ओर से कोशिश की है—सभी औपचारिकताओं को निभाते हुए मिलने की। चलिए, आप भी मिल लीजिए उनसे, शायद वे आपके जीवन में कभी काम आ ही जाएँ। और यह भी तो हो सकता है कि इनमें से कुछ आपके भी पुराने मित्र निकलें!

​हमारे ये परम मित्र हैं:

श्री सतेन्द्रनाथ मजूमदार, अतुल मोहन प्रसाद, चेतन भगत, गिरिराज किशोर, फणीश्वरनाथ रेणू, अगाथा क्रिस्टी, महात्मा गाँधी, गोपाल गोडसे, धर्मवीर भारती, रघुवीर सिंह, शिवकुमार गोयल, आचार्य महाप्रज्ञ, तसलीमा नसरीन, प्रो. श्यामनन्दना शास्त्री, शेक्सपीयर, सुमित्रानंदन पंत, सुशीला नैयर, कुमारी निवेदिता, रांगेय राघव, मक्सीम गोर्की, महर्षि पतञ्जलि, स्वामी अपूर्वानन्द, महात्मा विदुर, स्वेट मार्डन, स्वामी विवेकानंद, स्वामी शारदानन्द, पुरूषोत्तम नागेश ओक, मोहन लाल भास्कर, डॉ. हेडगेवार, अशोक के. बैंकर, देवकीनंदन खत्री, स्वामी गोकूलानन्दन, जयशंकर प्रसाद, गणेश श्रीकृष्ण खापडे, एस. भट्टाचार्य, प्रेमचंद, देवदत्त शास्त्री, डॉ. सुभाष कश्यप, शिव बहादुर पाण्डे ‘प्रीतम’, रवींद्रनाथ टैगोर, आत्मदेव शशिभूषणम, लियो टॉलस्टॉय, डॉ. गिरिराजशरण अग्रवाल, डॉ. एच.एन. राय, स्वामी अभेद्यनन्द, सत्यवीर शास्त्री, डॉ. बी.आर. आंबेडकर, शरतचंद्र, जगदीश नलिन, ओशो, सेर्गेयई अलेक्सेव, कुमार पंकज, जंगबहादुर राजपुरीया, अजीत सिंह राठौर, सपना शिवानी केकरे, प्रभन्जन भारद्वाज, डॉ. मनीषा यादव, नरेन्द्र कोहली, फ़्योदोर दॉस्तोएव्स्की, आर.के. प्रभु, गोस्वामी तुलसीदास जी, महर्षि वाल्मीकि जी, महर्षि वेदव्यास जी, सुभद्रा कुमारी चौहान, महाकवि कालिदास जी, रामधारी सिंह दिनकर, मौलाना वहीदुद्दीन ख़ान और यू.आर. राव।

​इनके अलावा भी कुछ और मित्र हैं मेरे, मगर उनमें से कुछ फिलहाल थोड़े खफा हैं… और कुछ ऐसे भी हैं जो चुपचाप इस वक्त मेरे इस पत्र को पढ़ रहे हैं!

​और हाँ… इन सबके बीच मैं भी तो हूँ आपका—

अश्विनी राय ‘अरुण’

​धन्यवाद!

 

​एक विशेष नोट (२०२६ के वर्तमान परिप्रेक्ष्य में):

ऊपर मैंने जिन मित्रों के नाम लिए हैं, आप तो समझ ही गए होंगे कि उनसे मिलना मतलब उनके पास बैठना नहीं, बल्कि उनकी कालजयी रचनाओं के संसार में गोता लगाना है। यह मेरी वर्ष २०१९ की एक पोस्ट थी, जिसमें अब समय के साथ कई और अनमोल नाम जुड़ चुके हैं। आज मेरी इस ज्ञान-शाला (पुस्तकालय) में गीता प्रेस की सात्विक पुस्तकें, बचपन की यादों को समेटे राज कॉमिक्स का विशाल कलेक्शन, रामकृष्ण मिशन की महान विभूतियों का आध्यात्मिक साहित्य, और पुस्तक मेलों से चुनकर लाई गईं अनगिनत कृतियों का समावेश हो चुका है। साथ ही, मेरी अपनी भी बीसियों साझा काव्य-संग्रह और अन्य पुस्तकें अब इस ज्ञान-परिवार का अभिन्न हिस्सा हैं।

 

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