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मुक्तिबोध: बाज़ार, वादों और अंतहीन प्रतीक्षा का आख्यान
लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’
उस दिन मैं पूरे शांत चित्त से टीवी के सामने बैठा। सोचा, अपनी पसंद का कोई धारावाहिक देख लूँ। मन में न कोई उलझन थी और न ही किसी बात की चिंता—(हाँ, उन पारिवारिक झंझटों को छोड़कर, जो हर इंसान को जन्म के साथ ही मुफ़्त में ‘गिफ़्ट’ की तरह मिलती हैं)। हाथ में रिमोट थामे कई चैनल बदले और अंततः एक जगह टिक गया।
अभी धारावाहिक की कहानी शुरू भी नहीं हुई थी कि विज्ञापनों का तांडव शुरू हो गया। परदे पर ‘आईपीएल’ (IPL) का महा-बाज़ार सज चुका था और बड़े-बड़े फ़िल्मी सितारे कतारबद्ध होकर आईपीएल बेचने में लगे थे। जैसे-तैसे विज्ञापन थमा और धारावाहिक फिर से शुरू हुआ, पर ठीक दस मिनट बाद वे महानायक और सुपर स्टार फिर से मूंगफली के दानों की तरह परदे पर बिखरे दिखे—वही आईपीएल बेचने के लिए! मैंने आजिज आकर कहा, “भाई! बंद करो यह धारावाहिक का ढोंग। अब हम सीधे आईपीएल ही देखेंगे। जब देश की इतनी बड़ी-बड़ी तोपें रात-दिन इसे बेचने में लगी हैं, तो ख़रीदना तो पड़ेगा ही!”
मार्च का महीना आया और देश में आईपीएल का आगाज़ हुआ। हमने भी अपनी नागरिक ज़िम्मेदारियों और सारे कामकाज को ताक पर रखकर मैच देखना शुरू कर दिया। अभी एकाध मैच का ही आनंद लिया था कि परदे पर देश के भूतपूर्व, वर्तमान और भविष्य के ‘भाग्य विधाता’ (राजनैतिक दल) एक साथ अवतरित हुए। वे सब कोरस में कहने लगे, “भैया! सच्चे देशभक्त बनो और हमारे पाले में आ जाओ। हम तुम्हें सीधे स्वर्ग या जन्नत—जो तुम्हारी इच्छा हो—का टिकट दिलवा देंगे।” मैं अवाक होकर उनका मुँह ताक रहा था, मानो पूछ रहा हूँ कि ‘हुजूर, पर यह होगा कैसे?’ उन्होंने तुरंत समाधान दिया और बोले, “११ अप्रैल से १९ मई के बीच पोलिंग बूथ पर आ जाना और हमारे नाम का बटन दबा देना, तुम्हारी किस्मत रातों-रात बदल जाएगी।”
मैंने फिर माथा पीटा और कहा, “बंद करो यह खेल! अब आईपीएल नहीं, सिर्फ़ वोट की तैयारी होगी। आख़िर इस बार हमें इस मायाजाल से ‘मुक्ति’ जो मिलने वाली है।” खैर, वक्त का पहिया घूमा, चुनाव का मौसम आया और चला गया। हमने भी एक सच्चे नागरिक की तरह उंगली पर स्याही लगवा ली। अब उस बटन को दबाने से हमें मुक्ति मिली या नहीं, यह तो विधाता जानें; और यह भी रहस्य ही है कि वह ‘मुक्ति’ आख़िर किस सदी में मिलेगी। खैर, हम इस असमंजस से उबर भी नहीं पाए थे कि देश के सांस्कृतिक क्षितिज पर ‘क्रिकेट विश्व कप’ का महा-उत्सव आ धमका।
अब तो टीवी, मोबाइल और अख़बारों की सुर्ख़ियों में चारों तरफ़ ‘मुक्ति’ के नए-नए डिजिटल मार्ग दिखाई देने लगे। विज्ञापनों का शोर ऐसा था, मानो धरती के पलटने का समय आ गया हो। बार-बार चेतावनी दी जाने लगी कि जितनी जल्दी हो सके अपनी सीट बुक कर लो, साक्षात ईश्वर विमान लेकर आने ही वाले हैं। हमने भी आव देखा न ताव, तुरंत टीवी का रीचार्ज कराया, चैनल चालू किए और मैच-दर-मैच देखने में जुट गए। अभी मन खेल की तरफ़ थोड़ा एकाग्र हुआ ही था कि एक महा-मुक़ाबले से ठीक पहले सल्लू भाई ‘भारत’ बनकर अपनी फ़िल्म बेचने आ गए। मन की एकाग्रता भंग हुई ही थी कि पीछे-पीछे तापसी पन्नू भी अपनी फ़िल्म का सौदा करने हाज़िर हो गईं। मन फिर व्यग्र हो उठा कि अचानक इन सबके बीच से हमारे कूल-कप्तान धोनी साहब अवतरित हुए। उन्होंने मन को शांत करते हुए एक नया मंत्र दिया और बोले, “ज़रा धीरज धरो! अब कबड्डी लीग आने वाली है, उसका इंतज़ार करो।”
विज्ञापनों, वादों और लीगों के इस चक्रव्यूह में हमारी प्रतीक्षा आज भी जारी है। पर अब मन में कोई मलाल नहीं है; आख़िर हमारे आदि-मुनियों ने भी तो मोक्ष और मुक्ति के लिए हज़ारों वर्ष तक घोर तपस्या और प्रतीक्षा की थी। हम तो कलयुग के अदने से संसारी हैं, कुछ बरस तो इंतज़ार कर ही सकते हैं!
धन्यवाद!