द्वंद्व के बीच खड़ा एक कलाकार: गिरीश कर्नाड के सृजन और विवादों की अनकही कथा
”किसी के चले जाने के बाद जब समाज मौन हो जाता है, तब इतिहास अपनी कलम उठाता है। यह कहानी हिंदी और कन्नड़ जगत के उस शिखर पुरुष की है, जिसके एक हाथ में कला का सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार था, तो दूसरे हाथ में तीखे विवादों की ढाल।”
आमतौर पर यह परिपाटी रही है कि किसी के चले जाने के बाद सिर्फ उसकी अच्छाइयों और उपलब्धियों को ही गिनाया जाता है। लेकिन एक सजग लेखक अपने अंतर्मन को कैसे बहकाए? वह मन जो सत्य और तथ्यों को लेकर अपनी तरह से जिद्दी है।
साल २०११ से लेकर २०१९ (उनके देहांत) के कालखंड में जब-जब समाचार चैनलों और अखबारों की सुर्खियों में गिरीश कर्नाड का नाम चमका, तो एक अजीब सा विरोधाभास खड़ा हुआ। एक तरफ देश उन्हें पद्मश्री, पद्मभूषण, साहित्य अकादमी और देश के सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान ‘ज्ञानपीठ’ से नवाज रहा था, तो दूसरी तरफ उनके कुछ सामाजिक और राजनीतिक बयानों से देश का एक बड़ा वर्ग उद्वेलित था। आइए, उनके रचनात्मक वैभव और उनके जीवन के उन कड़वे विवादों, दोनों पक्षों को बिना किसी लाग-लपेट के इतिहास के झरोखे से देखते हैं।
सृजन का शिखर: नाटककार, अभिनेता और निर्देशक कर्नाड
गिरीश कर्नाड का जन्म १९ मई १९३८ को महाराष्ट्र के माथेरान में हुआ था। उनकी उच्च शिक्षा धारवाड़ और कर्नाटक विश्वविद्यालय से हुई, जिसके बाद वे प्रसिद्ध ‘रोड्स स्कॉलरशिप’ पाकर ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी (ब्रिटेन) गए, जहाँ उन्होंने दर्शनशास्त्र, राजनीतिशास्त्र और अर्थशास्त्र में उच्च डिग्री ली।
भारत लौटकर उन्होंने फिल्मों और नाटकों की दुनिया में कदम रखा। उन्होंने इतिहास और पौराणिक कथाओं को समकालीन राजनीति से जोड़कर ऐसे नाटक लिखे, जिन्होंने भारतीय रंगमंच की दिशा बदल दी:
ययाति (१९६१) और तुगलक (१९६४): इन नाटकों ने उन्हें रातों-रात भारतीय रंगमंच का सुल्तान बना दिया। ‘तुगलक’ में उन्होंने मोहम्मद बिन तुगलक के माध्यम से उस दौर के राजनीतिक मोहभंग को दिखाया।
हयवदन (१९७१) और नागमंडल: इन कृतियों में उन्होंने भारतीय लोककथाओं और मिथकों का ऐसा अनूठा प्रयोग किया कि पूरी दुनिया उनके लेखन की मुरीद हो गई।
सिनेमाई सफर: समांतर सिनेमा (Parallel Cinema) में उन्होंने श्याम बेनेगल के साथ मिलकर ‘निशांत’ और ‘मंथन’ जैसी बेहतरीन फिल्में दीं। कन्नड़ सिनेमा में ‘संस्कार’ और ‘वंशवृक्ष’ जैसी फिल्मों के जरिए उन्होंने रूढ़िवादिता पर कड़े प्रहार किए। व्यावसायिक सिनेमा में भी वे ‘पुकार’ और ‘एक था टाइगर’ जैसी फिल्मों में संजीदा किरदारों और विलेन के रूप में नज़र आए।
विवादों का बवंडर: जब कला के मंच से बाहर आए कर्नाड
मानते हैं कि वह एक महान कलाकार थे, उन्होंने एक से बढ़कर एक फिल्मों और नाटकों में काम किया था। सकारात्मक चरित्र भी किए तो कभी विलेन बनकर भी स्क्रीन पर आए। लेकिन रंगमंच के पर्दे और वास्तविक जीवन के मंच के बीच का फर्क तब धुंधला होने लगा, जब उनके सामाजिक क्रियाकलाप और उग्र वैचारिक गतिविधियां देश के सामने आईं। यहीं से उनके जीवन का वो दूसरा पक्ष शुरू होता है, जिसे मुख्यधारा का मीडिया अक्सर दबा जाता है:
फांसी की सज़ा का विरोध: यह इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि जब संसद हमले के दोषी आतंकवादी अफ़ज़ल गुरु की फांसी की सज़ा तय हुई, तब गिरीश कर्नाड ने अरुंधति रॉय और अन्य वामपंथी विचारकों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर उस सज़ा के खिलाफ मुखर विरोध दर्ज कराया था। देश की सुरक्षा से जुड़े इस संवेदनशील मुद्दे पर उनके इस रुख ने आम भारतीयों के दिलों को गहरी ठेस पहुँचाई थी।
बंगलुरु एयरपोर्ट और टीपु सुल्तान विवाद: कर्नाटक की जनता के बीच एक बड़ा बवंडर तब खड़ा हुआ, जब गिरीश कर्नाड ने कर्नाटक के महान योद्धा और अत्यधिक सम्मानित शासक रहे केम्पेगौड़ा के नाम पर बने बंगलुरु इंटरनेशनल एयरपोर्ट का नाम बदलकर ‘टीपू सुल्तान एयरपोर्ट’ करने की मांग का अभियान चलाया। उनके अनुसार, केम्पेगौड़ा, छत्रपति शिवाजी महाराज और महाराणा प्रताप से भी बड़ा योद्धा टीपू था। इस विवादास्पद मांग के खिलाफ कर्नाटक की जनता सड़कों पर उतर आई, हज़ारों की संख्या में उनके पुतले फूंके गए और उग्र प्रदर्शन हुए। चौतरफा घिरने के बाद अंततः कर्नाड को सार्वजनिक रूप से हाथ जोड़कर माफी मांगनी पड़ी थी।
जेएनयू नारेबाजी और विरोध प्रदर्शन: जेएनयू (JNU) में हुई देश विरोधी नारेबाजी के मामले में जब कन्हैया कुमार और अन्य आरोपियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू हुई, तब गिरीश कर्नाड कानून के इस कदम के खिलाफ बेंगलुरु में धरने और प्रदर्शनों पर उतर आए। उनके इस कदम को राष्ट्रवादियों ने बेहद आपत्तिजनक माना।
खान-पान और धार्मिक आस्था पर प्रहार: कर्नाड अपनी वैचारिक उग्रता में गौमांस भक्षण (Beef Eating) के इतने बड़े समर्थक बन गए थे कि वे सार्वजनिक मंचों से इसकी वकालत करते थे और ऐसी दावतों में मुख्य अतिथि तक बनकर जाते थे, जिससे बहुसंख्यक समाज की धार्मिक भावनाएं आहत हुईं।
असली जीवन का विलेन बनाम परदे का विलेन
यही वह मोड़ है जहाँ एक कलाकार की सामाजिक भूमिका संदिग्ध हो जाती है। फिल्मों के परदे पर विलेन बनने से सिर्फ तालियां, पैसा और अभिनय का पुरस्कार मिलता है, मगर जब कोई वास्तविक जीवन के मंच पर देश की सांस्कृतिक चेतना, सुरक्षा और नायकों के खिलाफ खड़ा दिखाई देता है, तो समाज के बड़े हिस्से से उसे सिर्फ भर्त्सना और विरोध ही हासिल होता है।
इस विरोधाभास के बीच, जब उनका जीवन सफर थमा, तो देश के सामने एक बड़ा यक्ष प्रश्न खड़ा था—उनकी कला की सराहना कैसे की जाए, जब उनके कर्म देश के बहुसंख्यक मानस को लहूलुहान कर रहे थे?
निष्कर्ष: इतिहास की अदालत और आत्मा की मुक्ति
एक लेखक के रूप में विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’ का मानना है कि चाहे वैचारिक मतभेद कितने ही गहरे क्यों न हों, और उनके जीवन के ये काले पन्ने कितने ही विवादास्पद क्यों न रहे हों, जो हुआ सो हुआ। भारतीय संस्कृति का मूल संस्कार यही है कि जीवन यात्रा की समाप्ति पर हम केवल न्याय की कामना करते हैं। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे और उन्हें मुक्ति दे। सही और गलत का अंतिम फैसला अब समय और इतिहास के पाठकों के विवेक पर छोड़ देना ही उचित है।
धन्यवाद!
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