पहले भारतीय आईसीएस: सत्येंद्रनाथ टैगोर और प्रशासनिक पुनर्जागरण की गौरवगाथा
”जब योग्यता की कसौटी पर गोरों का घमंड टूटने लगा, तब लंदन की धरती पर एक भारतीय ने इतिहास रच दिया। यह कहानी है भारत के पहले सिविल सर्वेंट और राष्ट्र-चेतना के संवाहक सत्येंद्रनाथ टैगोर की।”
एक दौर वह था जब भारत की माटी पर ही भारतीयों को हेय दृष्टि से देखा जाता था और उन्हें मुंसिफ जैसे शुरुआती और छोटे पदों तक पर भी नियुक्त करने से परहेज किया जाता था। लेकिन वक्त बदला और ब्रिटिश हुकूमत को भारतीयों की मेधा के आगे झुकना पड़ा। साल १८३२ में पहली बार भारतीयों के लिए मुंसिफ और सदर अमीन के पद सृजित किए गए और इन पदों पर भारतीयों की नियुक्तियां शुरू हुईं। ऐसा जान पड़ता है कि यह औपनिवेशिक सरकार के लिए एक प्रयोगात्मक प्रक्रिया थी, जिसमें भारतीय अपनी योग्यता के बल पर पूरी तरह सफल रहे।
इसी सफलता का परिणाम था कि साल १८३३ में डिप्टी मजिस्ट्रेट और डिप्टी कलेक्टर जैसे ऊंचे पदों पर भी भारतीयों के चयन की आधिकारिक इजाजत दे दी गई। इसके बाद आया वह ऐतिहासिक मोड़, जब पहली बार ‘इंडियन सिविल सर्विस’ (ICS) के बंद दरवाज़े भारतीयों के लिए खुले।
इस अत्यंत कठिन परीक्षा को पास करने वाले पहले गौरवशाली भारतीय बने—सत्येंद्रनाथ टैगोर। ‘इंडियन सिविल सर्विसेज एक्ट १८६१’ के तहत भारतीय सिविल सेवा का पुनर्गठन किया गया था, और जून १८६३ में पहली बार इस परीक्षा में सत्येंद्रनाथ टैगोर का ऐतिहासिक चयन हुआ। इसके बाद वे अपनी प्रशासनिक ट्रेनिंग के लिए लंदन चले गए और नवंबर १८६४ में अपनी शिक्षा मुकम्मल कर भारत वापस लौटे।
कोलकाता की माटी, बहुमुखी प्रतिभा और गुरुदेव का साया
सत्येंद्रनाथ टैगोर जी का जन्म १ जून १८४२ को कला और संस्कृति की राजधानी कोलकाता (तब कलकत्ता) के अत्यंत संभ्रांत और प्रबुद्ध ठाकुर परिवार में हुआ था। सत्येंद्रनाथ केवल एक प्रशासनिक अधिकारी ही नहीं थे, बल्कि वे एक प्रसिद्ध लेखक, अद्वितीय बहुभाषाविद और संवेदनशील गीतकार भी थे। उनका एक महान परिचय यह भी है कि वे विश्वकवि गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर के बड़े भाई थे। उनके परिवार के इसी साहित्यिक और राष्ट्रवादी संस्कारों ने उन्हें जीवन में एक व्यापक दृष्टि प्रदान की थी।
३० वर्षों का प्रशासनिक सफर: अहमदाबाद से सतारा तक
ट्रेनिंग पूरी कर भारत लौटने के बाद, सत्येंद्रनाथ ने साल १८६५ में गुजरात के अहमदाबाद में सहायक मजिस्ट्रेट और कलेक्टर के पद से अपने सेवाकाल की शुरुआत की। वे इस सर्वोच्च सिविल सेवा में लगभग ३० सालों तक देश के विभिन्न हिस्सों में कार्यरत रहे। उन दिनों प्रशासनिक अधिकारियों का मुख्य काम ब्रिटिश सरकार के लिए टैक्स (राजस्व) की उगाही करना और कानून व्यवस्था संभालना होता था, लेकिन सत्येंद्रनाथ ने हमेशा न्याय और भारतीय जनता के हितों को सर्वोपरि रखा। अपने सेवाकाल के अंतिम पड़ाव में उन्होंने न्यायिक सेवा को चुना और साल १८९७ में वे महाराष्ट्र के सतारा में ‘जज’ के सर्वोच्च पद से सेवानिवृत्त (रिटायर) हुए।
निष्कर्ष: आने वाली पीढ़ियों के मार्गदर्शक
सत्येंद्रनाथ टैगोर का सिविल सेवा में जाना महज़ एक व्यक्ति की नौकरी का मामला नहीं था। यह उस कालखंड में भारतीय अस्मिता और बौद्धिक क्षमता का वैश्विक शंखनाद था। उन्होंने यह साबित कर दिखाया कि यदि समान अवसर मिलें, तो भारतीय किसी भी वैश्विक मंच पर सर्वश्रेष्ठ बनकर उभर सकते हैं। उनके इसी कदम ने बाद में सुभाष चंद्र बोस और अरविंदो घोष जैसे राष्ट्रनायकों को भी सिविल सेवा की ओर बढ़ने और बाद में उसे लात मारकर देश सेवा में कूदने की प्रेरणा दी।
धन्यवाद!
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