February 24, 2024

महारानी अहिल्याबाई इतिहास-प्रसिद्ध सूबेदार मल्हारराव होलकर के पुत्र खंडेराव की पत्नी थीं। वे मराठा साम्राज्य की एक सामन्त थीं। जो मालवा का प्रथम मराठा सूबेदार मल्हारराव के बाद सामंत बनीं। वह होलकर राजवंश की प्रथम महारानी थीं जिसने इन्दौर पर शासन किया। मराठा साम्राज्य को उत्तर की तरफ प्रसारित करने वाले अधिकारियों में अहिल्याबाई का नाम अग्रणी है।

इनका जन्म ३१ मई १७२५ में हुआ था। अहिल्याबाई किसी बड़े भारी राज्य की रानी नहीं थीं। उनका कार्यक्षेत्र अपेक्षाकृत सीमित था। फिर भी उन्होंने जो कुछ किया और कैसे किया यह जान घोर आश्चर्य होता है।

इसकी छोटी सी बानगी…

दस-बारह वर्ष की आयु में उनका विवाह हुआ और मात्र उनतीस वर्ष की अल्प अवस्था में ही वो विधवा हो गईं। पति का स्वभाव अगर दबी जबान से कहा जाए तो चंचल और उग्र था। वह सब उन्होंने सहा। फिर जब बयालीस-तैंतालीस वर्ष की थीं, पुत्र मालेराव का देहावसान का कुठाराघात हुआ। अहिल्याबाई की आयु बासठ वर्ष के लगभग थी, दौहित्र नत्थू भी चल बसा। उसके चार वर्ष पीछे दामाद यशवंतराव फणसे न भी नहीं रहे और इनकी पुत्री मुक्ताबाई उनके साथ सती हो गई। दूर के संबंधी थे, तुकोजीराव। उनके पुत्र मल्हारराव पर उनका स्नेह था; सोचती थीं कि आगे चलकर यही शासन, व्यवस्था, न्याय औऱ प्रजाजन की डोर सँभालेगा; मगर वो भी किसी लायक नहीं था, उन्हें अंत-अंत तक इस बात का दुःख रहा।

जब चारों तरफ गड़बड़ी मची हुई थी। शासन और व्यवस्था के नाम पर घोर अत्याचार हो रहे थे। प्रजाजन-साधारण गृहस्थ, किसान मजदूर-अत्यंत हीन अवस्था में सिसक रहे थे। उनका एकमात्र सहारा धर्म, अंधविश्वासों, भय त्रासों और रूढि़यों की जकड़ में कसा जा रहा था। न्याय में न शक्ति रही थी, न विश्वास। ऐसे काल की उन विकट परिस्थितियों में अहिल्याबाई ने जो कुछ किया वह चिरस्मरणीय है।

अहिल्याबाई ने अपने राज्य की सीमाओं के बाहर भारत-भर के प्रसिद्ध तीर्थों स्थानों में मंदिर बनवाए, घाट बँधवाए, कुओं और बावड़ियों का निर्माण करवाए, नए मार्ग बनवाए और पुरानों को सुधरवाए, भूखों के लिए अन्नसत्र खोले, प्यासों के लिए प्याऊ बिठलाईं, मंदिरों में विद्वानों की नियुक्ति शास्त्रों के मनन-चिंतन और प्रवचन हेतु करवाई।

उन्होंने आत्म-प्रतिष्ठा के झूठे मोह का त्याग करके सदा न्याय करने का प्रयत्न मरते दम तक करती रहीं। ये उसी परंपरा की वाहक थीं जिसमें उनके समकालीन पूना के न्यायाधीश रामशास्त्री थे और उनके पीछे झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ने किया।

उनके जीवनकाल में ही जनता उन्हें ‘देवी’ समझने और कहने लगी थी। महारानी अहिल्याबाई के संबंध में दो प्रकार की विचारधाराएँ रही हैं…

एक में उनको देवी के अवतार की पदवी दी गई है, वहीं दूसरी में उनके अति उत्कृष्ट गुणों के साथ अंधविश्वासों और रूढ़ियों के प्रति श्रद्धा को भी प्रकट किया गया है।

हे देवी ! अश्विनी राय ‘अरूण’ तेरे जन्मदिवस पर तुझे नमन करता है। तुम अँधेरे में प्रकाश-किरण के समान थीं, जिसे अँधेरा बार-बार ग्रसने की चेष्टा करता रहा मगर तूने अपने उत्कृष्ट विचारों एवं नैतिक आचरण के चलते ही समाज की नजर में देवी का दर्जा पाया था।

धन्यवाद !

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