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​’जूता सिलाई से चंडी पाठ तक’: भारत रत्न नानाजी देशमुख और राष्ट्र-निर्माण की अनकही गाथा

 

​”अश्विनी राय ‘अरुण’ का उस महामानव को बारम्बार नमन, जिन्होंने डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम जैसी महान आत्मा को सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से गढ़ने में गुरु की भूमिका निभाई!”

​आज जब हम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) द्वारा संचालित ‘सरस्वती शिशु मंदिर’ और ‘सरस्वती विद्या मंदिर’ के विशाल शैक्षिक साम्राज्य को देखते हैं, तो हमारा मन श्रद्धा से भर जाता है। आज के इस भौतिकवादी परिवेश में विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास, शिक्षा, संस्कार और देशभक्ति के लिए इनसे बेहतर दूसरा कोई विकल्प नहीं दिखता। लेकिन क्या आप जानते हैं कि देश के इस सबसे बड़े और अभिनव शिक्षा तंत्र की पहली नींव कहाँ और किसने रखी थी?

​आइए, इतिहास के दो ऐसे सिरों को जोड़ते हैं, जिन्हें एक साथ देखने पर राष्ट्र-निर्माण की एक विस्मृत और चमत्कारी हकीकत हमारे सामने खुलकर आती है।

 

​इतिहास का पहला सिरा: जब ‘जूता सिलाई से चंडी पाठ’ तक की नौबत आई

​यह उस समय की बात है जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने समाज में सुदृढ़ राष्ट्रवादी सामग्री और विचारों के प्रसार के लिए ‘राष्ट्रधर्म’ एवं ‘पाञ्चजन्य’ नामक दो साप्ताहिक पत्रिकाओं और ‘स्वदेश’ नामक हिंदी समाचार पत्र को निकालने का फैसला किया।

​लेखन और संपादन की जिम्मेदारी परम श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी को सौंपी गई और मार्गदर्शक के रूप में पंडित दीनदयाल उपाध्याय को नियुक्त किया गया। मगर सबसे बड़ी चिंता यह थी कि पैसे का अभाव, छपाई, कागज का इंतजाम और समाज के अंतिम व्यक्ति तक इसका वितरण कौन संभालेगा? यानी व्यावहारिक धरातल पर ‘जूता सिलाई से लेकर चंडी पाठ तक’ की पूरी जिम्मेदारी कौन निर्वहन करेगा? बड़ी माथापच्ची के बाद सबने मिलकर एक कुशल और फौलादी संगठनकर्ता को मुख्य प्रबंध निदेशक (MD) का जिम्मा सौंपा। वे और कोई नहीं, नानाजी देशमुख थे।

 

​इतिहास का दूसरा सिरा: गोरखपुर में शिशु मंदिर की नींव

​अब इस दूसरे सिरे को देखिए। यह वही नानाजी थे, जिन्होंने बालपन से ही बच्चों में संस्कार और देशभक्ति कूट-कूट कर भरने के लिए सर्वप्रथम गोरखपुर की धरती पर ‘सरस्वती शिशु मंदिर’ नामक पाठशाला की स्थापना की थी।

​जब १९४८ में गांधी जी की हत्या का झूठा दोष मढ़कर संघ पर प्रतिबंध लगाया गया, तब इन पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन पूरी तरह ठप होने की कगार पर था। लेकिन नानाजी का उत्साह कम नहीं हुआ। वे भूमिगत (Underground) हो गए और वेश बदलकर, पुलिस की आँखों में धूल झोंककर इन राष्ट्रवादी पत्रिकाओं का प्रकाशन और वितरण जारी रखा।

 

​अभावों से तपा जीवन: सब्जी बेचने से बिरला इंस्टीट्यूट तक

​आखिर कौन थे ये नानाजी? चंडिकादास अमृतराव नानाजी देशमुख का जन्म ११ अक्टूबर १९१६ को महाराष्ट्र के हिंगोली जिले के कदोली कस्बे में हुआ था। उनका शुरुआती जीवन भयानक अभावों और संघर्षों में बीता। बचपन में ही माता-पिता का साया सिर से उठ गया। मामा ने लालन-पालन तो किया, लेकिन स्कूल की फीस और किताबें खरीदने तक के पैसे नहीं होते थे।

​किंतु, ज्ञान प्राप्त करने की उनकी उत्कट अभिलाषा इतनी तीव्र थी कि उन्होंने सब्जी बेचकर पढ़ाई के लिए पैसे जुटाए। इसके बाद उन्होंने मंदिरों में रहकर, कष्ट सहकर पिलानी के प्रतिष्ठित ‘बिरला इंस्टीट्यूट’ से अपनी उच्च शिक्षा पूरी की।

 

​उत्तर प्रदेश में जनसंघ का उदय और लोहिया-दीनदयाल का मिलन

​कालांतर में वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्णकालिक प्रचारक बने। सरसंघचालक श्री गुरुजी (एम.एस. गोलवलकर) ने उनकी निष्ठा को भांपकर उन्हें गोरखपुर भेजा और बाद में वे उत्तर प्रदेश के ‘प्रांत प्रचारक’ बने।

​जब संघ से प्रतिबंध हटा, तो राजनीतिक विकल्प के रूप में ‘भारतीय जनसंघ’ की स्थापना हुई। गुरुजी के आदेश पर नानाजी ने उत्तर प्रदेश जनसंघ के महासचिव का प्रभार लिया। नानाजी के तूफानी दौरों और जमीनी सांगठनिक कौशल का ही परिणाम था कि १९५७ तक यूपी के हर जिले में जनसंघ की इकाइयाँ खड़ी हो गईं। अंततः:

​पंडित दीनदयाल उपाध्याय की वैचारिक दृष्टि,

​अटल बिहारी वाजपेयी का जादुई वक्तृत्व, और

​नानाजी देशमुख का अचूक सांगठनिक ढांचा…

​इन तीनों के त्रिकोण ने भारतीय जनसंघ को उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति बना दिया। इसी दौरान नानाजी ने एक ऐतिहासिक प्रयोग किया। उन्होंने प्रख्यात समाजवादी नेता डॉ. राममनोहर लोहिया को जनसंघ के कार्यकर्ता सम्मेलन में आमंत्रित किया। यहीं लोहिया जी और दीनदयाल जी की ऐतिहासिक मुलाकात हुई, जिसने समाजवादियों और जनसंघ को करीब लाकर तत्कालीन कांग्रेस के कुशासन की जड़ें हिला दीं।

 

​भूदान आंदोलन, जेपी की रक्षा और ‘संपूर्ण क्रांति’

​नानाजी का मन केवल राजनीति में नहीं रमता था। वे संत विनोबा भावे के ‘भूदान आंदोलन’ में सक्रिय रूप से शामिल हुए और दो महीने तक उनके साथ पदयात्रा की।

​जब सत्तर के दशक में जयप्रकाश नारायण (जेपी) ने ‘संपूर्ण क्रांति’ का आह्वान किया, तो नानाजी उनके सबसे बड़े सेनापति बनकर उभरे। पटना के गांधी मैदान में जब पुलिस ने जेपी पर लाठियां बरसाईं, तो नानाजी ने ढाल बनकर जेपी को अपने घेरे में ले लिया। इस दुस्साहसिक कार्य में नानाजी की हड्डियां टूट गईं और उनका एक हाथ फ्रैक्चर हो गया, लेकिन उन्होंने जेपी की जान बचा ली। जयप्रकाश नारायण और मोरारजी देसाई ने उनके इस अदम्य साहस की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी।

 

​सत्ता का त्याग और दीनदयाल शोध संस्थान की स्थापना

​आपातकाल के बाद जब ऐतिहासिक चुनाव हुए, तो नानाजी उत्तर प्रदेश की बलरामपुर लोकसभा सीट से भारी बहुमत से सांसद चुने गए। कांग्रेस को उखाड़कर केंद्र में पहली गैर-कांग्रेसी ‘जनता पार्टी’ की सरकार बनी। मोरारजी देसाई ने उन्हें अपने मंत्रिमंडल में उद्योग मंत्री बनने का न्योता दिया।

​लेकिन यहाँ नानाजी ने जो किया, वह आज के युग में अकल्पनीय है। उन्होंने मंत्री पद को ठुकराते हुए कहा:

​”साठ (६०) साल से अधिक आयु वाले सांसदों और राजनेताओं को राजनीति से दूर रहकर संगठन और समाज कार्य करना चाहिए।”

​यही वह दर्शन है जिसे आज आधुनिक भारतीय राजनीति में ‘मोदी वाणी’ या मार्गदर्शक मंडल के रूप में देखा जाता है। राजनीति से संन्यास लेकर उन्होंने पंडित दीनदयाल उपाध्याय के ‘एकात्म मानववाद’ (Integral Humanism) के दर्शन को धरातल पर उतारने के लिए ‘दीनदयाल शोध संस्थान’ (DRI) की स्थापना की और चित्रकूट के सैकड़ों गाँवों को आत्मनिर्भर और विवाद-मुक्त बनाकर दुनिया के सामने ग्रामोदय का एक अनुपम मॉडल पेश किया।

 

​निष्कर्ष: एक युगपुरुष को कोटि-कोटि नमन

​राष्ट्र के प्रति उनके इसी निस्वार्थ और युगांतकारी अवदान के लिए उन्हें मरणोपरांत देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से विभूषित किया गया। सब्जी बेचने वाले एक बालक से लेकर भारत रत्न बनने तक की यह गाथा हमें सिखाती है कि राष्ट्र सेवा के लिए पद नहीं, बल्कि अडिग संकल्प की आवश्यकता होती है।

​धन्यवाद!

 

 

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