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मासूमियत के रक्षक: नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी और ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ की महागाथा

 

​जब किसी मासूम के हाथ से कलम छीनकर उसे कोयले की खदानों, कांच की भट्टियों या ढाबों पर झोंक दिया जाता है, तो केवल एक बचपन नहीं मरता, बल्कि इंसानियत का भविष्य भी दम तोड़ देता है। लेकिन इस अंधेरे के खिलाफ देश की माटी से एक ऐसी आवाज़ उठी, जिसने दुनिया के १४४ देशों की सरकारों को बाल श्रम के खिलाफ कड़े कानून बनाने पर मजबूर कर दिया। यह कहानी है बच्चों के मसीहा और नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित श्री कैलाश सत्यार्थी की।

 

​प्रारंभिक जीवन और एक बड़ा संकल्प: इंजीनियरिंग से बंधुआ मुक्ति तक

​कैलाश सत्यार्थी जी का जन्म ११ जनवरी १९५४ को मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक शहर विदिशा में हुआ था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद विद्युत इंजीनियरिंग (Electrical Engineering) की पढ़ाई की और बतौर इंजीनियर अपने करियर की शुरुआत भी की। लेकिन उनके भीतर की करुणा उन्हें चैन से बैठने नहीं दे रही थी। महज़ २६ वर्ष की आयु में, जब लोग अपने सुनहरे भविष्य के सपने देखते हैं, उन्होंने अपनी सुरक्षित नौकरी को लात मार दी और उन बच्चों की आवाज़ बनने का फैसला किया जिनकी सिसकियाँ फैक्ट्रियों के शोर में दब जाती थीं।

 

​’बचपन बचाओ आंदोलन’ और वैश्विक महाअभियान

​साल १९८० में कैलाश सत्यार्थी जी ने ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ (BBA) की नींव रखी। इसके बाद से उनका यह आंदोलन केवल भारत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि एक वैश्विक क्रांति बन गया।

​८३,००० से अधिक बच्चों की मुक्ति: वे और उनकी टीम अब तक विश्व भर के १४४ देशों में सक्रिय रहकर ८३,००० से अधिक बच्चों को बाल श्रम, तस्करी और आधुनिक दासता के दलदल से सुरक्षित निकाल चुके हैं।

​अंतरराष्ट्रीय श्रम संघ (ILO) पर प्रभाव: श्री सत्यार्थी के अथक प्रयासों और दबाव के कारण ही वर्ष १९९९ में अंतरराष्ट्रीय श्रम संघ द्वारा ‘बाल श्रम की निकृष्टतम श्रेणियों’ पर ऐतिहासिक संधि सं॰ १८२ (Convention No. 182) को अंगीकृत किया गया। यह संधि आज दुनिया भर की सरकारों के लिए बाल श्रम उन्मूलन के क्षेत्र में सबसे बड़ा मार्गनिर्देशक स्तंभ है।

​वैश्विक नेतृत्व: वर्तमान में वे ‘ग्लोबल मार्च अगेंस्ट चाइल्ड लेबर’ (बाल श्रम के ख़िलाफ़ वैश्विक अभियान) के अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में दुनिया भर में अपनी सेवाएँ दे रहे हैं।

 

​सम्मान और वैश्विक पुरस्कारों का कारवां

​कैलाश सत्यार्थी जी के इस युगांतकारी मानवीय कार्य को दुनिया के कोने-कोने से सराहना मिली। उनके हिस्से आए राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों की सूची मानवता के प्रति उनके समर्पण की गवाही देती है:

१९९३, अशोक फेलो (Ashoka Fellow), अमेरिका

१९९४, दी अचेनर अंतर्राष्ट्रीय शांति पुरस्कार, जर्मनी

१९९५, ट्रम्पेटर पुरस्कार (Trumpeter Award), अमेरिका

१९९५,रॉबर्ट एफ॰ कैनेडी, मानवाधिकार पुरस्कार, अमेरिका

१९९८, गोल्डन फ्लैग पुरस्कार, नीदरलैंड्स

२००२ वालेनबर्ग मेडलमिशिगन विश्वविद्यालय, अमेरिका

२००६ फ्रीडम पुरस्कार, अमेरिका

२००७, इतालवी सीनेट का प्रतिष्ठित पदक, इटली

२००७, आधुनिक दासता को समाप्त करने के लिए ‘working लिबरेशन हीरो’ स्टेट विभाग, अमेरिका

२००८ अल्फोंसो कोमिन अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार, अंतर्राष्ट्रीय संस्था

२००९, लोकतंत्र के रक्षक (Defender of Democracy) पुरस्कार, अंतर्राष्ट्रीय संस्था

२०१४, नोबेल शांति पुरस्कार (मलाला युसूफजई के साथ संयुक्त रूप से) नोबेल फाउंडेशन, नॉर्वे

२०१५, हार्वर्ड विश्वविद्यालय का “ह्युमेनीटेरियन पुरस्कार” (यह सम्मान पाने वाले पहले भारतीय) हार्वर्ड यूनिवर्सिटी, अमेरिका

 

वर्ष २०१४ का नोबेल शांति पुरस्कार: इतिहास का वो स्वर्णिम क्षण

कैलाश सत्यार्थी जी के जीवन का सबसे ऐतिहासिक क्षण वर्ष २०१४ में आया, जब उन्हें दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित ‘नोबेल शांति पुरस्कार’ से नवाजा गया। यह पुरस्कार उन्हें पाकिस्तान की नारी शिक्षा कार्यकर्ता मलाला युसुफ़ज़ई के साथ सम्मिलित (संयुक्त) रूप से प्रदान किया गया था। इस पुरस्कार ने यह साबित कर दिया कि बच्चों की आज़ादी और उनकी शिक्षा की कोई सरहद नहीं होती; चाहे भारत का बच्चा हो या पाकिस्तान का, हर मासूम को खिलने का पूरा अधिकार है।

 

निष्कर्ष: हर बच्चे का अधिकार है बचपन

कैलाश सत्यार्थी जी का जीवन हमें सिखाता है कि अगर इरादे फौलादी हों, तो अकेले शुरू किया गया कारवां भी पूरी दुनिया को बदलने की ताकत रखता है। विदिशा से शुरू हुई यह यात्रा आज दुनिया के करोड़ों बच्चों के चेहरों पर मुस्कान बनकर चमक रही है।

धन्यवाद!

 

 

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