सत्येंद्रनाथ टैगोर: भारतीय सिविल सेवा के प्रथम ‘भारतीय’ स्तंभ
भारतीय इतिहास में ब्रिटिश शासन के दौरान प्रशासनिक सेवाओं के ऊँचे पदों पर केवल गोरों का वर्चस्व था। उस दौर में किसी भारतीय का ‘कलेक्टर’ या ‘मैजिस्ट्रेट’ बनना एक असंभव स्वप्न जैसा था। इस असंभव को संभव कर दिखाया महान कवि रवींद्रनाथ टैगोर के बड़े भाई सत्येंद्रनाथ टैगोर ने। १ जून, १८४२ को कोलकाता के प्रतिष्ठित ठाकुर बाड़ी (टैगोर परिवार) में जन्में सत्येंद्रनाथ ने गुलामी के दौर में भारतीयों के स्वाभिमान को एक नई ऊंचाई दी।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और प्रशासनिक सुधार
१९वीं शताब्दी के शुरुआती वर्षों में भारतीयों को उच्च प्रशासनिक पदों से दूर रखा जाता था।
प्रयोग की शुरुआत (१८३२): पहली बार भारतीयों के लिए ‘मुंसिफ’ और ‘सदर अमीन’ जैसे पद सृजित किए गए। इस सफल प्रयोग के बाद अंग्रेजों का विश्वास बढ़ा।
१८३३ का चार्टर एक्ट: इस अधिनियम के माध्यम से डिप्टी मजिस्ट्रेट और डिप्टी कलेक्टर जैसे पदों के द्वार भारतीयों के लिए खोले गए।
१८६१ का इंडियन सिविल सर्विस एक्ट: इस कानून के तहत भारतीय सिविल सेवा का विधिवत गठन हुआ, जिसने आगे चलकर आधुनिक प्रशासनिक सेवा की आधारशिला रखी।
सत्येंद्रनाथ की ऐतिहासिक सफलता
जून १८६३ में सत्येंद्रनाथ टैगोर ने वह कर दिखाया जिसकी मिसाल आज भी दी जाती है। उन्होंने अत्यंत कठिन मानी जाने वाली ‘इंडियन सिविल सर्विस’ (ICS) की परीक्षा उत्तीर्ण की। वे इस पद पर चयनित होने वाले प्रथम भारतीय बने। अपनी सफलता के बाद वे प्रशिक्षण के लिए लंदन गए और नवंबर १८६४ में वापस लौटकर देश की सेवा में समर्पित हो गए।
प्रशासनिक करियर और उपलब्धियाँ
१८६५ में उन्होंने अहमदाबाद के सहायक मैजिस्ट्रेट और कलेक्टर के रूप में अपनी सेवाएँ शुरू कीं।
कार्य की प्रकृति: उस दौर में अधिकारियों का मुख्य दायित्व राजस्व (टैक्स) की उगाही और कानून-व्यवस्था बनाए रखना होता था।
दीर्घ सेवा: वे लगभग ३० वर्षों तक प्रशासनिक सेवा में रहे और विभिन्न पदों पर कार्य करते हुए अंततः महाराष्ट्र के सतारा में ‘जज’ के पद से सेवानिवृत्त हुए।
बहुमुखी व्यक्तित्व: केवल एक अधिकारी नहीं
सत्येंद्रनाथ केवल एक कठोर अधिकारी नहीं थे, बल्कि वे अपने अनुज रवींद्रनाथ की तरह ही कला और साहित्य प्रेमी भी थे।
साहित्यकार और भाषाविद: वे एक प्रखर लेखक, गीतकार और कई भाषाओं के ज्ञाता थे।
स्त्री शिक्षा के पक्षधर: उन्होंने समाज सुधार, विशेषकर स्त्री शिक्षा और महिलाओं की आज़ादी के लिए महत्वपूर्ण कार्य किए। उन्होंने ‘ब्रह्म समाज’ के प्रचार-प्रसार में भी बड़ी भूमिका निभाई।
अश्विनी राय ‘अरुण’ की भावांजलि
”आज १ जून को महान मनीषी श्री सत्येंद्रनाथ टैगोर जी के जन्मदिवस पर उन्हें मेरा कोटि-कोटि नमन। आपने उस कालखंड में भारतीयों के लिए बंद दरवाज़े खोले, जब मेधा को गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा गया था। आप केवल पहले अधिकारी नहीं थे, बल्कि करोड़ों भारतीयों की प्रशासनिक महत्वाकांक्षाओं के पहले प्रेरणास्रोत थे।”