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​लोकमाता अहिल्याबाई होलकर: त्याग, न्याय और पुनरुद्धार की साक्षात् देवी 

 

​भारतीय इतिहास के पन्नों पर अपनी न्यायप्रियता और लोक-कल्याण के लिए स्वर्ण अक्षरों में अंकित महारानी अहिल्याबाई होलकर एक ऐसी शासिका थीं, जिन्होंने सत्ता को उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि सेवा का माध्यम माना। मालवा के प्रथम मराठा सूबेदार मल्हारराव होलकर की पुत्रवधू और खंडेराव होलकर की पत्नी अहिल्याबाई ने इन्दौर पर शासन करते हुए मर्यादा और धर्म के नए कीर्तिमान स्थापित किए।

 

​जन्म और व्यक्तिगत दुखों का पहाड़

​अहिल्याबाई का जन्म ३१ मई, १७२५ को हुआ था। उनका जीवन व्यक्तिगत त्रासदी का एक ऐसा सिलसिला था जिसे सहना किसी साधारण स्त्री के वश की बात नहीं थी।

​अल्पायु में वैधव्य: मात्र २९ वर्ष की आयु में उन्होंने अपने चंचल और उग्र स्वभाव वाले पति को खो दिया।

​पुत्र शोक: बयालीस वर्ष की आयु में पुत्र मालेराव का देहावसान हुआ।

​वंश नाश की पीड़ा: जीवन के अंतिम पड़ाव पर उन्होंने अपने दौहित्र (नाती), दामाद और पुत्री मुक्ताबाई (जो सती हो गई थीं) को खोते हुए देखा।

​अयोग्य उत्तराधिकारी: जिसे उन्होंने स्नेह से पालकर शासन की डोर सौंपने का सोचा (तुकोजीराव के पुत्र मल्हारराव), वह भी अयोग्य निकला। इस अकेलेपन और दुख ने उन्हें तोड़ने के बजाय और अधिक लोक-कल्याण की ओर मोड़ दिया।

 

​न्याय और सुशासन की मिसाल

​जब चारों ओर अराजकता का माहौल था, किसान-मजदूर शोषण के शिकार थे और न्याय व्यवस्था पंगु हो चुकी थी, तब अहिल्याबाई ने शासन की बागडोर संभाली। उन्होंने ‘महेश्वर’ को अपनी राजधानी बनाया और उसे कला व संस्कृति का केंद्र बनाया।

​सामाजिक सुधार: उन्होंने अंधविश्वासों और रूढ़ियों की जकड़न को ढीला किया।

​न्यायप्रियता: वे उसी परंपरा की वाहक थीं जिसके लिए पूना के न्यायाधीश रामशास्त्री जाने जाते थे। न्याय करते समय उन्होंने कभी मोह या पक्षपात नहीं किया।

 

​सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और निर्माण कार्य

​अहिल्याबाई होलकर ने अपने राज्य की सीमाओं से परे जाकर संपूर्ण भारत के लिए कार्य किया। आज हम भारत के प्रसिद्ध तीर्थों में जो भव्यता देखते हैं, उसका बड़ा श्रेय उन्हें ही जाता है:

​मंदिर और घाट: काशी विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार हो या गया, सोमनाथ, अयोध्या और बद्रीनाथ में मंदिर व घाटों का निर्माण, उन्होंने भारत की आध्यात्मिक चेतना को जीवंत किया।

​लोक हित: नए मार्ग, कुएँ, बावड़ियाँ, प्याऊ और भूखों के लिए अन्नसत्र (सदावर्त) खोलकर उन्होंने यह सिद्ध किया कि राजा प्रजा का सेवक होता है।

​विद्वानों का सम्मान: मंदिरों में विद्वानों की नियुक्ति कर उन्होंने शास्त्रों के मनन और प्रवचन की परंपरा को जीवित रखा।

 

​अवतार या आदर्श मानवी?

​उनके जीवनकाल में ही जनता उन्हें ‘देवी’ कहने लगी थी। उनके व्यक्तित्व को लेकर दो विचारधाराएँ मिलती हैं—एक जो उन्हें ईश्वर का साक्षात् अवतार मानती है, और दूसरी जो उनके मानवीय गुणों, कर्मठता और कठिन परिस्थितियों में भी धर्म के प्रति उनकी अडिग श्रद्धा का सम्मान करती है।

 

​अश्विनी राय ‘अरुण’ की भावांजलि

​”हे देवी! तेरे जन्मदिवस पर तुझे नमन है। तू उस अंधेरे में प्रकाश-किरण के समान थी, जिसे काल के अंधेरे ने बार-बार ग्रसने की चेष्टा की, मगर तूने अपने उत्कृष्ट विचारों, संकल्पशक्ति और नैतिक आचरण से समाज की नज़रों में ‘लोकमाता’ का सर्वोच्च दर्जा प्राप्त किया।”

 

रानी अहिल्याबाई

 

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